UP Board Master आलोक-वृत्त गुलाब खण्डेलवाल

UP Board Master आलोक-वृत्त गुलाब खण्डेलवाल

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी खण्डकाव्यआलोक-वृत्त गुलाब खण्डेलवाल
Chapter 4
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

(इलाहाबाद, अलीगढ़, सहारनपुर, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, मिर्जापुर, सीतापुर जिलों के लिए)

प्रश्न-उत्तर

प्रश्न-पत्र में पठित खण्डकाव्य से चरित्र-चित्रण, खण्डकाव्य के तत्त्वों व तथ्यों पर आधारित दो लघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक का उत्तर लिखना होगा, इसके लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. आलोक-वृत्त का कथासार अपने शब्दों में लिखिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।

अथवा आलोक-तृत्त खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ के आधार पर वर्ष 1942 की जनक्रान्ति का सोदाहरण वर्णन कीजिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की रचना कविवर गुलाब खण्डेलवाल द्वारा की गई है। इस खण्डकाव्य की कथा युगपुरुष महात्मा गाँधी के जीवन पर आधारित है। कवि ने गांधीजी जैसे महानायक के गुणों को आधार मानकर इस खण्डकाव्य की रचना की है। कथावस्तु विस्तृत है। गाँधीजी इस खण्डकाव्य के
मुख्य पात्र हैं, गौण पात्रों का चित्रण कवि ने नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकट करने के लिए किया है। खण्डकाव्य में गाँधीजी प्रकाशस्वरूप हैं, क्योंकि उन्होंने अपने सद्गुणों एवं सद्विचारों से भारतीय संस्कृति की चेतना को प्रकाशित किया है। कवि ने गाँधीजी के माध्यम से सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि भावनाओं को पाठकों के मन में जागृत करने का प्रयास किया है। यह खण्डकाव्य गाँधीजी के जीवन, उनके चरित्र, सिद्धान्तों गुणों एवं दर्शन को पूर्णरूपेण परिभाषित करता हुआ एक साहित्यिक एवं दार्शनिक खण्डकाव्य है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु को
कवि ने आठ सों में विभाजित किया है। संक्षेपत: इनकी कथावस्तु निम्न प्रकार है।

प्रथम सर्ग : भारत का स्वर्णिम अतीत

1869 ई. में महात्मा गाँधी का जन्म पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था। गाँधीजी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि समस्त दानवी एवं पाश्विक शक्तियाँ भी उनके सामने टिक न सकीं। ब्रिटिश शासन भयभीत हो गया। गाँधीजी ने अपने साहस और शक्ति से शासन के क्रूर अत्याचारों और दमनात्मक कार्यों से पीड़ित जनता को शक्ति प्रदान की। गाँधीजी के रूप में भारतीय जनता को नया जीवनस्रोत मिला।

द्वितीय सर्ग : गाँधीजी का प्रारम्भिक जीवन

युवा होने पर गाँधीजी का विवाह कस्तूरबा के साथ हो गया। कुछ समय बाद ही उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। उनकी मृत्यु के समय गाँधीजी अपने पिता के पास नहीं थे। फिर उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए वे इंग्लैण्ड चले गए। गाँधीजी की माताजी को यह डर सता रहा था कि । उनका पुत्र विदेश में जाकर मॉस-मदिरा का सेवन न करने लगे। अत: विदेश जाने से पहले उन्होंने अपने पुत्र से वचन लिया-
“मघ माँस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर, माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल-तिलक लगाकर।”
अत्यधिक कष्ट हुआ। अपनी शिक्षा समाप्त कर जब गाँधीजी स्वदेश लौटे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी माताजी उन्हें छोड़कर स्वर्ग सिधार गई हैं। यह सुनकर उन्हें ।

तृतीय सर्ग : गाँधीजी का अफ्रीका प्रवास

अथवा आलोक-वृत्त खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ के तृतीय सर्ग में वर्णित गाँधीजी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर दक्षिण अफ्रीका में एक बार गाँधीजी रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। एक गोरे ने उन्हें अपमानित करके गाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस नीति को देखकर वह बहुत दु:खी हए। वह शान्त भाव से एकान्त में बैठे ठिठुरते रहे। वे वहाँ बैठे-बैठे भारतीयों की दुर्दशा पर चिन्तन करने लगे। उन्होंने अपनी
जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर बैठकर मानवता के उद्धार का संकल्प लिया। सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया और संघर्ष में विजय प्राप्त की।

चतुर्थ सर्ग : गाँधीजी का भारत आगमन

अथवा आलोक-वृत्त के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा संक्षेप में
लिखिए।

उत्तर गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आ जाते हैं। भारत आकर उन्होंने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, सरोजिनी नायडू, सुभाषचन्द्र बोस, मदनमोहन मालवीय आदि अनेक प्रमुख देशप्रेमी उनके अनुयायी बन गए।
गाँधीजी के आह्वान पर देश के महान नेता एकजट होकर सत्याग्रह की तैयारी में जट गए। गाँधीजी ने चम्पारण में नील की खेती को लेकर आन्दोलन प्रारम्भ किया, जिसमें वे सफल रहे। उनके भाषण सुनकर विदेशी सरकार विषम स्थिति में। पड़ जाती थी। इस आन्दोलन में सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व अच्छी तरह निखरकर सामने आया।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग (असहयोग आन्दोलन) की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।

उत्तर गाँधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेज़ों की दमन नीति भी बढ़ती गई। गाँधीजी के ओजस्वी भाषण ने भारतीयों में नई स्फूर्ति भर दी, लेकिन अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने यत्र-तत्र साम्प्रदायिक दंगे करवा दिए। गाँधीजी को बन्दी बना लिया गया। जेल में गाँधीजी अस्वस्थ हो गए। अत: उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से आकर गाँधीजी हरिजनोद्धार, हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब मुक्ति, खादी प्रचार आदि के रचनात्मक कार्यों में लग गए।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गाँधीजी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा-

“आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन यह, पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।”

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग (नमक सत्याग्रह) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर अंग्रेज़ों के द्वारा लगाए गए नमक कानून को तोड़ने के लिए गाँधीजी ने समुद्र तट पर बसे ‘डाण्डी’ नामक स्थान तक की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया। तत्पश्चात् अंग्रेज़ शासकों ने ‘गोलमेज सम्मेलन’ बुलाया, जिसमें गाँधीजी को बुलाया गया। इस कॉन्फ्रेन्स के साथ-साथ कवि ने वर्ष 1937 के ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ की स्थापना सम्बन्धी कार्यकलापों का सुन्दर वर्णन किया है।

सप्तम सर्ग : वर्ष 1942 की जनक्रान्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज़ सरकार भारतीयों का सहयोग तो चाहती थी, परन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद वर्ष 1942 में गाँधीजी ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ छेड़ दिया। सम्पूर्ण देश में विद्रोह की ज्वाला धधक उठी-

“थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे।
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुस्थल में थी ज्वाला घर-घर।”

कवि ने इस आन्दोलन का बड़ा ही ओजस्वी भाषा में वर्णन किया है। ‘बम्बई अधिवेशन’ के बाद गाँधीजी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिए गए। इस पर सम्पूर्ण भारत में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। कवि ने पूज्य बापू एवं कस्तूरबा के मध्य हुए वार्तालाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है।

अष्टम सर्ग: भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

देशवासियों के अथक प्रयासों और बलिदानों के फलस्वरूप भारत स्वतन्त्र हो गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही देश में साम्प्रदायिक झगड़े आरम्भ हो गए। हिंसा की अग्नि चारों ओर भड़क उठी। इन सब को देखकर बापू अत्यन्त व्यथित हो गए।
वे कह उठे-

“प्रभो! इस देश को सत्यथ दिखाओ.
लगी जो आग भारत में, बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दूँ ,
लपट में रोब की निज शीश धर दूं।”

प्रश्न 2. कथानक की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।

अथवा खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के जीवन को चित्रित किया गया है।
इसका कथावस्तु सम्बन्धी विवेचन इस प्रकार है।

(i) कथानक की व्यापकता ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य का कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है। इसमें महात्मा गाँधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से प्रकाशित व्यक्तित्व को चित्रित किया गया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सदगणों एवं सदविचारों से प्रकाशित किया है। उन्होंने सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का प्रकाश फैलाया है। अत: इस जीवन-वृत्त को आलोक-वृत्त कहा जा सकता है। यह कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है, पर साथ-ही-साथ इसमें पं. मोतीलाल नेहरू, पं. मदनमोहन मालवीय, महात्मा गाँधी की माता, उनकी पत्नी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि के जीवन की झाँकियाँ भी सम्मिलित हैं।

(ii) कथा का संगठन ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य का आरम्भ भारत के गौरवमय अतीत से होता है। कथा का प्रारम्भ 1857 ई. के बाद की दयनीय स्थिति के वर्णन से प्रारम्भ हुआ है तथा गाँधीजी की जन्म की घटना को भी इसमें दिखाया गया है। इसके साथ ही इसमें गाँधीजी के समय तत्कालीन । भारत की दुर्दशा का भी वर्णन किया गया है। शिक्षा ग्रहण करने गाँधीजी का इंग्लैण्ड जाना, वहाँ बैरिस्टर बनना, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतार दर्शाया गया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् । सम्पूर्ण देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के कारण गाँधीजी का दु:खी होना
और ईश्वर से प्रार्थना करने के साथ ही इस खण्डकाव्य की समाप्ति होती जाती है।

(ii) संवाद योजना कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गई है। यह खण्डकाव्य प्रमुख रूप से । वर्णनात्मक ही है, पर फिर भी विभिन्न स्थानों पर गाँधीजी के संक्षिप्त संवाद प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग किया गया है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा।

(iv) पात्र एवं चरित्र-चित्रण प्रस्तुत खण्डकाव्य में मुख्य चरित्र महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व है। उनका चरित्र एक धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें कुछ दुर्बलताएँ भी हैं, परन्तु अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सरलता और लगन के बल पर वे अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे अपने प्रेम से शत्रुओं के हृदय को भी जीत लेते हैं। उनका अहिंसा का सिद्धान्त मानव हृदय की एकता और सभी के प्रति समानता के भाव पर आधारित है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गाँधीजी को चरित्रनायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी प्रदान की गई है। कुछ अन्य महापुरुषों की झलकियों को भी पात्र रूप में समायोजित किया गया है, लेकिन वे केवल महात्मा गाँधी के चरित्र पर
प्रकाश डालने हेतु कथा में संगठित किए गए हैं।

(v) उद्देश्य इस कथा के संगठन का उद्देश्य राष्ट्रीयता, सत्य, अहिंसा, मानवीयता आदि सद्गुणों के प्रति भावनात्मक संवेग उत्पन्न करके समाज में उनका महत्त्व स्थापित करना है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोक-वृत्त में गाँधीजी जैसे महानायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य की रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया। गया है।

प्रश्न 3. ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

उत्तर कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की ।
भाषा-शैली इस प्रकार है
(i) भाषा-शैली ‘आलोक-वृत्त’ की भाषा अत्यन्त सुन्दर और मन को छूने। वाली है। भाषा विचारों और भावों के अनुरूप है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक ओजगुण का निर्वाह हुआ है, परन्तु जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है। प्रसाद गण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है।
‘आलोक-वृत्त की शैली प्रमुख रूप से वर्णनात्मक है। साथ ही
संवादात्मक भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही है। कथावस्तु के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए कवि ने इस शैली को अपनाया है, किन्तु इस वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर उन्होंने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।

(ii) अलंकार-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है। कहीं पर भी वे सप्रयास लाए हुए प्रतीत नहीं होते। अलंकारों ने कहीं पर भी भाषा को बोझिल नहीं किया है।

(iii) छन्द-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हआ है। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गई है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है। इस प्रकार यह द्रष्टव्य है कि ‘आलोक-वत्त’ में गाँधी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयन कर उसे इस
प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपयुक्त बन गई है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को। प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है, तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः इस काव्य-ग्रन्थ को एक सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 4. आलोक-वृत्त खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण (चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए) कीजिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा आलोक-वृत्त के नायक का चरित्रांकन कीजिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में गाँधीजी का व्यक्तित्व सर्वोपरि है।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए।

अथवा “आलोक-वृत्त’ में गांधीजी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में प्रस्फुटित हुआ है।” इस कथन के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी हैं। कवि ने इन्हें एक लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया है। इनका जीवन एवं इनके कार्य हमारे लिए सदैव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं ।

(i) देशप्रेमी गाँधीजी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता है-उनका देशप्रेमी होना। गाँधीजी अपने देश से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दिया। वे अनेक बार कारागार में गए। अंग्रेज़ों के अपमान और अत्याचार सहे।

(ii) सत्य और अहिंसा के उपासक गाँधीजी देश की स्वतन्त्रता सत्य और अहिंसा के बल पर प्राप्त करना चाहते थे। वे अहिंसा को महान शक्तिशाली अस्त्र मानते रहे। उन्होंने अपने जीवन में हिंसा न करने का दृढ़ निश्चय किया। कोई विरला व्यक्ति ही इस प्रकार अहिंसा का पूर्ण रूप से पालन कर सकता है।

(iii) ईश्वर के प्रति आस्थावान गाँधीजी पुरुषार्थी तो हैं, पर ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्थावान भी हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में जो कुछ भी किया, ईश्वर को साक्षी मानकर ही किया। उनका मानना था कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम की इच्छा नहीं करनी चाहिए। परिणाम ईश्वर पर ही छोड़ देने चाहिए।

(iv) मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठावान गाँधीजी ने अपने जीवन में मानवीय मल्यों एवं सदाचरण को सदैव बनाए रखा। वे मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते थे। वे समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उनके अनुसार जाति, धर्म, वर्ण एवं रूप के आधार पर भेदभाव करना अनुचित है। वे कहते थे कि ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं।’

(v) स्वतन्त्रता प्रेमी गाँधीजी के जीवन का मुख्य उद्देश्य देश को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारत माता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। वे देशवासियों को गुलामी की जंजीरों को काटने के लिए प्रेरित करते हैं।

(vi) हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक उन्होंने सदैव हिन्दू और मुसलमानों को एक साथ रहने की प्रेरणा दी। वे ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी देखना चाहते थे। वे जीवन भर जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए प्रयास करते रहे और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा देते रहे।

(vii) स्वदेशी वस्तु एवं खादी को महत्त्व गाँधीजी ने स्वदेशी वस्तओं को अपनाने की प्रेरणा दी और उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। जन-जन में खादी का प्रचार किया और उसे अपनाने की प्रेरणा दी।

(viii) आत्मविश्वासी गाँधीजी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। अपने जीवन में उन्होंने ‘जो भी किया, पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी रहे।

(xi) सत्याग्रही गाँधीजी ने सत्य की शक्ति पर पूर्ण भरोसा किया। अपने सत्याग्रह के बल पर ही अपने देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवाया और भारत को आज़ादी दिलवाई।
अत: कहा जा सकता है कि गाँधीजी एक श्रेष्ठ मानव हैं। उनके निर्मल चरित्र पर। उँगली उठाने का साहस किसी में नहीं है।

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