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UP board syllabus

UP board Syllabus आन का मान हरिकृष्ण प्रेमी

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी नाटक-आन का मान – हरिकृष्ण प्रेमी
Chapter 2
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

(वाराणसी, लखनऊ, इटावा, बरेली, फर्रुखाबाद, एटा, शाहजहाँपुर, उन्नाव, हमीरपुर जिलों के लिए निर्धारित)

प्रश्न-पत्र में पठित नाटक से चरित्र-चित्रण, नाटक के तत्वों व तथ्यों पर आधारित दो प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किसी एक का उत्तर लिखना होगा, इसके लिए 4 अंक निर्धारित है।

नाटक का सार

साहित्यकार हरिकृष्ण ‘प्रेमी द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान‘ मगलकालीन भारत के इतिहास पर आधारित है, जिसमें राजपूत सरदार। दुर्गादास की स्वाभाविक वीरता, कर्त्तव्यपरायणता आदि को चित्रित कर उसके व्यक्तित्व की महानता दर्शाई गई है। इस नाटक के माध्यम से नाटककार ने मानवीय गुणों को रेखांकित किया है।
नाटक का मूल स्वर है-विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद। विश्वव्यापी मानव-प्रेम की भावना नाटक में निहित है। विश्वशान्ति और।
अन्तर्राष्ट्रीय समन्वय की दिशा में अग्रसर होने के सन्देश नाटक में विद्यमान है। इस नाटक में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय नव-निर्माण के
लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। भारत का दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ चिरकाल से जातीयता और साम्प्रदायिकता पोषित रही है। जब तक सभी वर्ग और स्तर के लोग एक होकर प्रयत्न नहीं करेंगे, राष्ट्रीय निर्माण का संकल्प पूरा नहीं होगा। हमें समझना होगा कि हमारा देश जाति, भाषा, प्रान्त आदि की दृष्टि से अनेकता का संगम है। यह देश अत्यन्त प्राचीन है, जहाँ अनेक सभ्यताओं और संस्कृतियों के मानने वाले लोग चिरकाल से निवास कर रहे हैं। जो निरन्तर झगड़ते रहे हैं। इस विचारधारा को दृष्टि में रखते हुए नाटककार ने इस नाटक में हिन्दू-मुस्लिम एकता यानि साम्प्रदायिक सौहार्द के सन्देश को प्रसारित करने की सफल कोशिश की है।
वीर दुर्गादास जहाँ भारतीय हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं इनके समानान्तर मुगल सत्ता को रखा गया है। इस नाटक का मूल उद्देश्य भारतीय युवकों एवं नागरिकों में स्वदेश के प्रति गहन अपनत्व की भावना का प्रसार करना, राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सहिष्णुता, विश्वबन्धुत्व, सत्यता, नैतिकता जैसे मानवीय भावों का चित्रण कर समाज में उनकी स्थापना की प्रेरणा देना है। नारी के सम्मान की रक्षा, मित्र के प्रति अपनी वचनबद्धता का निर्वाह, कर्त्तव्य भावना को सर्वोपरि महत्त्व देना, राजपूत जाति के प्रति गौरव की भावना का प्रदर्शन करना आदि उदाहरण ‘आन का मान’ नाटक की सार्थकता को सिद्ध करते हैं।

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. ‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
अथवा ‘आन का मान’ नाटक का संक्षिप्त सारांश लिखिए।

उत्तर मुगलकालीन भारत के इतिहास पर आधारित एवं हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा लिखित नाटक ‘आन का मान’ में राजपूत सरदार वीर दुर्गादास राठौर की स्वाभाविक वीरता, कर्तव्यपरायणता, राष्ट्रीयता, मानवता आदि गुणों को चित्रित कर उसके व्यक्तित्व की महानता दर्शाई गई है। यह । नाटक तीन अंकों में विभाजित है। तीनों अंकों के अध्ययन के लिए उत्तर 2, 3 व 4 देखें।

प्रश्न 2. “आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक का सारांश लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के किसी एक अंक की कथावस्तु लिखिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ का आरम्भ रेगिस्तान के एक रेतीले मैदान से होता है। इस समय भारत की राजनीतिक सत्ता मुख्यतः मुगल शासक औरंगजेब के हाथों में थी और जोधपुर में महाराज जसवन्त सिंह का राज्य था। वीर दुर्गादास राठौर महाराज जसवन्त सिंह का ही कर्त्तव्यनिष्ठ सेवक है और महाराज की मृत्यु हो जाने के बाद वह उनके अवयस्क पुत्र अजीत सिंह के संरक्षक की भूमिका निभाता है। अपने पिता औरंगजेब की अनेक नीतियों का विरोध करते हुए उसका पुत्र अकबर द्वितीय औरंगजेब से अलग हो जाता है और उसकी मित्रता दुर्गादास राठौर से हो जाती है। औरंगजेब की एक चाल से अकबर द्वितीय को ईरान जाना पड़ा। अपनी मित्रता निभाते हुए अकबर द्वितीय की सन्तानों-सफीयत एवं बुलन्द अख्तर के पालन-पोषण का दायित्व दुर्गादास ने अपने ऊपर ले लिया। समय के
साथ-साथ सभी युवा होते हैं और राजकुमार अजीत सिंह सफीयतुन्निसा पर आसक्त हो जाता है। सफीयत के टालने के बावजूद अजीत सिंह में उसके प्रति प्रेम की भावना अत्यधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण दुर्गादास नाराज हो जाते हैं।
दुर्गादास द्वारा राजपूती आन एवं मान का ध्यान दिलाने पर अजीत सिंह अपनी गलती मानकर क्षमा माँग लेता है। युद्ध की तैयारी प्रारम्भ होती है। औरंगजेब के सन्धि प्रस्ताव को लेकर ईश्वरदास आता है। मुगल सूबेदार शुजाअत खाँ द्वारा सादे वेश में प्रवेश करने के बावजूद अजीत सिंह उस पर प्रहार करता है, परन्तु राजपूती लेता है। परम्परा का निर्वाह करते हुए नि:शस्त्र व्यक्ति पर प्रहार होने से दुर्गादास बचा लेता है

प्रश्न 3. ‘आन का मान’ नाटक के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के द्वितीय अंक का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के मार्मिक स्थलों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थलों से सम्बन्धित दूसरे अंक भाम नदी के तट पर स्थित ब्रह्मपुरी से प्रारम्भ होती है। ब्रह्मपरी का नाम औरंगजेब ने इस्लामपरी रख दिया है।
औरंगजेब की दो पुत्रियों मेहरुन्निसा एवं जीनतुन्निसा में से मेहरुन्निसा हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का विरोध करती है, जबकि जीनतुन्निसा अपने पिता की नीतियों की समर्थक है। अपनी दोनों पुत्रियों की बात सुनने के बाद औरंगजेब मेहरुन्निसा द्वारा रेखांकित किए गए अत्याचारों को अपनी भूल मानकर पश्चाताप करता है। वह अपने बेटों विशेषकर अकबर द्वितीय के प्रति की जाने वाली कठोरता के लिए भी दु:खी होता है। उसके अन्दर अकबर द्वितीय की सन्तानों यानि अपने पौत्र-पौत्री क्रमश: बुलन्द एवं सफीयत के प्रति स्नेह और बढ़ जाता है।
औरंगजेब अपनी वसीयत में अपने पुत्रों को जनता से उदार व्यवहार के लिए। परामर्श देता है। वह अपनी मत्य के बाट अनि
लिए कहता है। वसीयत लिखे जाने के समय ही ईश्वरदास वीर दुर्गादास राठौर को बन्दी बनाकर लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री अर्थात् बुलन्द एवं सफीयत को। पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करना चाहता है, लेकिन दुर्गादास इसके लिए
राजी नहीं होता।

प्रश्न 4. “आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की कथा सफीयत के गान के साथ प्रारम्भ होती है और उसी समय अजीत सिंह वहाँ पहुँच जाता है। वह सफीयत को अपना जीवनसाथी बनाने का इच्छुक है, लेकिन सफीयत स्वयं को विधवा कहकर अजीत सिंह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती। अजीत सिंह द्वारा अनेक तर्क देने के बावजूद सफीयत अजीत सिंह को लोकहित हेतु स्वहित को त्यागने का सुझाव देती है। वह वहाँ से जाना चाहती है, लेकिन प्रेम के उद्वेग में बहता अजीत सिंह उसे अपने पास बैठा लेता है। बुलन्द अख्तर के आने से सफीयत सकुचा जाती है तथा अपने भाई से अजीत सिंह के प्रेम एवं विवाह की इच्छा की बात बताती है। बुलन्द इसका विरोध करता है और फिर वहाँ से चला जाता है। इसी समय दुर्गादास का प्रवेश होता है और वह इन सब बातों को सुनकर औरंगजेब के सन्देह को उचित मानता है। दुर्गादास के विरोध की भी परवाह न करते हुए अजीत सिंह सफीयत को साथ चलने के लिए कहता है। यह देखकर सफीयत के सम्मान की रक्षा हेतु दुर्गादास तैयार हो जाता है, तभी मेवाड़ से अजीत सिंह का टीका (विवाह का प्रस्ताव) आता है, जिसे वह दुर्गादास की चाल समझता है।
दुर्गादास पालकी मँगवाकर सफीयत को बैठाकर चलने के लिए तैयार होता है, तो अजीत सिंह पालकी रोकने की कोशिश करते हुए दुर्गादास को चेतावनी देता है-
“दुर्गादास जी! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूँगा।”
दुर्गादास सधे हुए शब्दों में कहता है-“आप ही रहेंगे महाराज! दुर्गादास तो सेवकमात्र है-उसने चाकरी निभा दी।”
ऐसा कहकर दुर्गादास जन्मभूमि को अन्तिम बार प्रणाम करता है और यहीं पर नाटक की कथा समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 5. ‘आन का मान’ नाटक की ऐतिहासिकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ वस्तुतः एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें कल्पना का उचित समन्वय किया गया है। नाटक का समय, इसके पात्र एवं घटनाएँ आदि मध्यकालीन या मुगलकालीन भारत से सम्बद्ध हैं। औरंगजेब, अकबर द्वितीय, मेहरुन्निसा, जीनतुन्निसा, बुलन्द अख्तर, सफीयतुन्निसा, शुजाअत खाँ, दुर्गादास, अजीत सिंह, मुकुन्दीदास आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक पात्र हैं। जोधपुर के महाराज जसवन्त सिंह का अफगानिस्तान यात्रा से लौटते हुए कालगति को प्राप्त हो जाना, रास्ते में उनकी दोनों रानियों द्वारा दो पुत्रों को जन्म देना, औरंगजेब द्वारा महाराज के परिवार को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डालना, दुर्गादास के नेतृत्व में अजीत सिंह का निकल भागना, प्रतिशोध में
औरंगजेब द्वारा जोधपुर पर आक्रमण करना, अकबर द्वितीय का ईरान भाग जाना, उसके पुत्र एवं पुत्री की देखभाल दुर्गादास द्वारा करना आदि महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों; जैसे-औरंगजेब की
धर्मान्धता, उसकी राज्य विस्तार नीति, साम्प्रदायिक वैमनस्य, व्यापार एवं कला का ह्रास आदि को सफलतापूर्वक नाटक में दर्शाया गया है। नाटक में कई जगहों पर नाटककार ने कल्पना का समुचित समन्वय किया है, जिससे नाटक में रोचकता एवं
प्रासंगिकता का उचित समावेश हो गया है। अन्तत: कहा जा सकता है कि यह नाटक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से एक सफल एवं तत्कालीन परिस्थितियों को सार्थक ढंग से प्रस्तुत करने में समर्थ नाटक है।

प्रश्न 6. नाट्य तत्त्वों के आधार पर ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर नाटक के तत्त्वों के आधार पर श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

(i) कथानक इस नाटक का कथानक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस ऐतिहासिक कहानी में वास्तविकता और काल्पनिकता का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। नाटक में एकसूत्रता, सजीवता, घटना-प्रवाह आदि का निर्वाह किया गया है। कथानक की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल कृति के अन्तर्गत
आता है। नाटक के कथानक में औरंगजेब के समय का वर्णन है। उसके अत्याचारों का ही नाटक में वर्णन किया गया है। उसके पुत्र अकबर द्वितीय की दुर्गादास मदद करते हैं तथा उसे बादशाह घोषित कर देते हैं। औरंगजेब द्वारा उत्पन्न की गई सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों वश अकबर द्वितीय ईरान चला जाता है और उसके पुत्र तथा पुत्री दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं।
इस नाटक के कथानक का मुख्य स्वर राजपूती आन और दुर्गादास का शौर्य है।

(ii) अभिनेयता रंगमंच की दृष्टि से यह नाटक सफल कृति है। कुशल रंगकर्मी द्वारा रेत के मैदान, बिखरी चाँदनी, प्रवाहित नदी आदि का प्रवाह, चित्रों, प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। औरंगजेब के कक्ष की सज्जा ऐतिहासिक सत्य के अनुरूप है। प्रथम अंक तथा तृतीय अंक का
मंच एक ही है। इस नाटक का कथानक गतिशील और कम पात्र है। नाटक को प्रस्तुत करने में केवल तीन बार पर्दा गिराना पड़ता है।

(iii) पात्र तथा चरित्र-चित्रण इस नाटक में पात्रों की कुल संख्या ग्यारह है, जिनमें तीन स्त्री पात्र हैं। नाटक का नायक दर्गादास है। कथानक के विकास में पात्र पूर्णरूप से सहायक हुए हैं। दुर्गादास के चरित्र को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना नाटककार का प्रधान उद्देश्य रहा है। दुर्गादास इस नाटक का मुख्य पात्र है, जबकि अन्य पात्र गौण हैं। दर्गादास के बाद सफीयतन्निसा के चरित्र को विशेष रूप से उभारा गया है सफीयत को इस नाटक में समझदार मुस्लिम
युवती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। औरंगजेब को धर्मान्ध और अत्याचारी शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अजीत मारवाड़ का शासक है तथा उसे सामान्य युवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(iv) संवाद योजना नाटक के संवाद लघु, वीरता और ओज से परिपूर्ण तीक्ष्ण तथा कहीं-कहीं मधुरता से युक्त हैं। इस नाटक के अधिकांश संवाद गतिमान एवं हृदय को छूने वाले हैं। संवाद योजना ने नाटक की कथा को गति प्रदान
की है; जैसे-
जीनतुन्निसा-तू चौंकी क्यों? मेहरुन्निसा-मैं समझी जिन्दा पीर आ गए। जीनतुन्निसा-हँसी उड़ाती है अब्बाजान की। उनके सामने तो भीगी बिल्ली बन जाती है। मेहरुन्निसा-बनना ही पड़ता है। उनकी आँखें सिंह की भाँति चमकती हैं-खाने को दौड़ती हैं।

(v) भाषा-शैली इस नाटक की भाषा सरल, सुबोध, प्रवाहपूर्ण तथा प्रसाद गुण युक्त है। माधुर्य और ओजगुण भाषा के सौन्दर्य को बढ़ाने में सफल हैं। वाक्य छोटे हैं। आवश्यकता अनुसार बड़े वाक्यों का भी प्रयोग किया गया है। नाटक के मुस्लिम पात्रों को भी शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करते हुए दिखाया गया है। उर्द के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है तथा नाटक में मुहावरे, लोकोक्तियाँ, सूक्तियों तथा गीतों का सटीक प्रयोग किया गया है। जैसे-‘सिर पर कफन बाँधे फिरना’, ‘बद अच्छा बदनाम बुरा’, ‘दूध का जला छाछ को फूंक मारकर पीता है’ आदि।
नाटक के संवाद तथा वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

(vi) देशकाल तथा वातावरण नाटककार ने इस नाटक की रचना में देश, काव्य और वातावरण का पूर्ण ध्यान रखा है। नाटक में मध्यकालीन मुस्लिम तथा हिन्दू संस्कृति दोनों का समन्वय दर्शाया गया है। नाटक के पात्र ऐसे राजघरानों से सम्बन्धित हैं, जिनमें आपस में संघर्ष चलता रहता था। पात्रों की वेशभूषा, रहन-सहन आदि समय के अनुसार ही है। औरंगजेब सादगी पसन्द बादशाह था। अत: उसके राजभवन का प्रदर्शन सामान्य रूप में ही दर्शाया गया है।

(vii) उदेश्य इस नाटक के माध्यम से प्रेमी जी ने आदर्श मानवीय मूल्यों की स्थापना का सुन्दर प्रयास किया है। नाटक का लक्ष्य, सत्यता, विश्वबन्धुत्व, राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सहिष्णुता और कर्त्तव्यपरायणता जैसे उदात्त गुणों का चित्रण करना है। नाटक के लक्ष्य की पूर्ति दुर्गादास के चरित्र से होती है। दुर्गादास कर्त्तव्यपरायण और देशप्रेमी है तथा साथ ही विश्वबन्धुत्व में भी यकीन रखता है। दुर्गादास को आदर्श मूल्यों को स्थापित करने वाला उदात्त नायक कहा जा सकता है। वह ऐसा नायक है, जो कर्म की सफलता में ही फल के आनन्द का अनुभव करता है। नाटक के अन्य पात्र भी नाटककार के सन्देश को प्रचारित और प्रसारित
करने में सहयोग देते हैं।

प्रश्न 7. ‘आन का मान नाटक के देशकाल चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक के नाटककार श्री हरिकृष्ण प्रेमी’ ने इसमें देशकाल एवं वातावरण का पर्याप्त ध्यान रखा है। नाटक में मध्यकालीन मुस्लिम संस्कृति तथा हिन्दू संस्कृति का उचित समन्वय हुआ है। नाटक के पात्र ऐसे राजघरानों से सम्बन्धित हैं, जिनमें परस्पर संघर्ष चलता रहता था। युद्ध जैसे तत्कालीन वातावरण, राजनीतिक षड्यन्त्रों के बीच जीवन के उज्ज्वल पक्षों का रेखांकन, अपनी राष्ट्रीयता (जातीयता) की विशेषताओं को सुरक्षित
एवं संरक्षित रखते हुए गैर-जातीय समुदाय की भावनाओं को भी आदर प्रदान करना, मानवीय मूल्यों को ठेस न पहुँचने देना, तत्कालीन समाज में चलने वाले निरन्तर दाँव-पेंच, प्रेम सम्बन्धों में भी औदात्य की रक्षा करना आदि ऐसे पक्ष हैं, जो तत्कालीन समाज में भी मौजूद थे और प्रत्येक समाज में मौजूद रहते हैं,
कभी कम या कभी अधिक तीव्रता के साथ। नाटककार ने इन जीवन्त एवं सार्थक मानवीय भावनाओं को उचित महत्त्व प्रदान किया है, जिससे नाटक की प्रासंगिकता बढ़ गई है। राजपूती आन, बान एवं शान का प्रदर्शन करने के लिए देशकाल एवं वातावरण का चित्रण करने तथा ऐतिहासिकता की रक्षा करने में नाटककार पूरी तरह समर्थ साबित हुआ है।

प्रश्न 8. “आन का मान’ नाटक की संवाद-योजना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर किसी भी नाटक का कथानक संवादों के आधार पर ही अग्रसर होता है। प्रस्तुत नाटक के संवाद छोटे-छोटे, तीखे, गतिमय एवं प्रभावशाली हैं, परन्तु कहीं-कहीं संवाद लम्बे भी हो गए हैं। नाटककार ने संवाद-योजना में विदग्धता एवं मार्मिक स्थलों की जानकारी का भलीभाँति परिचय दिया है। संवाद-योजना
ने नाटक की कथा को एक गति प्रदान की है। अजीत-“दुर्गादास जी! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहँगा।” दुर्गादास–“आप ही रहेंगे महाराज! दुर्गादास तो सेवकमात्र है-उसने चाकरी
निभा दी।” या जीनतुन्निसा–“तू चौंकी क्यों?”
मेहरुन्निसा- “मैं समझी ज़िन्दा पीर आ गए।”
नाटक में औरंगजेब जैसे कट्टर मुस्लिम शासक के संवाद को भी परिमार्जित हिन्दी में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया गया है। अधिकांश संवाद मर्मस्पर्शी एवं चेतनशील हैं। संवादों के द्वारा वातावरण एवं परिस्थितियों को जीवन्त करने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 9. ‘आन का मान’ नाटक की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

उत्तर भाषा श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ की भाषा सरल, सुबोध, सहज, प्रवाहपूर्ण एवं प्रांजल है। परिस्थितियों एवं आवश्यकता के अनुसार, वाक्य कहीं छोटे, तो कहीं बड़े बन पड़े हैं। सम्पूर्ण नाटक में परिमार्जित हिन्दी शब्दों का ही प्रयोग किया गया है। मुस्लिम पात्र विशेषकर औरंगजेब जैसा कट्टर मस्लिम शासक भी परिमार्जित हिन्दी का ही प्रयोग करता है। इससे नाटककार की क्षमता का भी प्रदर्शन होता है, हालाँकि
कहीं-कहीं इससे स्वाभाविकता में बाधा पहुँचती है। ऐसा लगता है जैसे मुस्लिम पात्र को बलपूर्वक भाषा ओढ़ाई गई हो।
इसके बावजूद, नाटक में उर्दू शब्दों के प्रयोग में कोई कोताही (असावधानी) नहीं बरती गई है। नाटककार ने खुलकर सहज ढंग से बोलचाल के उर्दू शब्दों का प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त, नाटक की भाषा की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता सूक्तियों एवं मुहावरों का यथास्थान उचित प्रयोग है। भाषा प्रसाद गुणयुक्त है, लेकिन ओज एवं माधुर्य गुणों से युक्त भाषा का भी उचित स्थान
पर प्रयोग किया गया है। मुहावरों एवं लोकोक्तियों के प्रयोग सम्बन्धी कुछ उदाहरणों में-विपत्तियाँ मनुष्य को बलवान बना देती हैं, दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है, सिर पर कफ़न बाँधे फिरना; बद अच्छा, बदनाम बुरा आदि द्रष्टव्य हैं। प्रस्तुत नाटक में तीन गीतों की भी योजना है, जो प्रसंग के अनुसार अत्यन्त सार्थक एवं प्रभावी बन पड़े हैं। शैली इस नाटक में नाटककार ने वर्णनात्मक और संवाद शैली का प्रयोग किया है, जिसके कारण शैली की दृष्टि से इस रचना को सफल रचना माना जा सकता है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-“इसलिए कि औरंगजेब हत्यारा होते हुए भी हिसाबी है। वह व्यापारी की भाँति गणित लगाता है। दुर्गादास जानता है कि
जहाँपनाह मुझे मारकर भी अपना मनोरथ पूरा नहीं कर सकते।

प्रश्न 10 आन का मान’ नाटक की अभिनेयता (रंगमंचीयता) पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अभिनेयता या रंगमंचीयता की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक ‘आन का मान’, पूर्णत: सफल रचना है। इस नाटक में तीन अंक हैं। प्रथम अंक में मरुभूमि के रेतीले मैदान का दृश्य है। रात के प्रथम पहर का समय है तथा मंच पर चाँदनी बिखरी हुई है। दसरे अंक में दक्षिण में भीम नदी के तट पर ब्रह्मपुरी नामक कस्बे में औरंगजेब
के राजमहल का एक कक्ष दर्शाया गया है। कुशल रंगकर्मी रेतीले मैदान, फैली हई चाँदनी, बहती हुई नदी आदि का प्रवाह चित्रों, प्रकाश एवं ध्वनि के माध्यम से प्रस्तत कर सकते हैं। औरंगजेब के कक्ष की साधारण सजावट ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप है। तीसरे अंक में प्रथम अंक का ही सेट है यानि प्रथम अंक एवं तृतीय अंक का सेट एक ही है। नाटक के प्रस्तुतीकरण में केवल दो ही सेट
तैयार करने पड़ते हैं। इसी तरह, नाटक के प्रस्तुतीकरण में केवल तीन बार पर्दा । गिराने की आवश्यकता है। नाटक में नाटककार ने वेशभूषा की दृष्टि से भी। समुचित रूप से निर्देशन दिया है। अभिनय को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ नाटकीय संकेत भी दिए गए हैं। इस प्रकार, कहा जा सकता है कि गतिशील कथानक, कम पात्र, सरल भाषा, कम अंक एवं सेट तथा मंच-विधान की दृष्टि से ‘आन का मान’ एक उत्कृष्ट एवं सफल नाटक है। श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक में पात्रों की कल संख्या 11 है, जिसमें 3 स्त्री पात्र हैं। नाटक का प्रमुख पात्र वीर दर्गादास राठौर है। नाटक का सारा घटनाक्रम उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। दुर्गादास के अतिरिक्त औरंगजेब का चरित्र भी महत्त्वपूर्ण चरित्रों में शामिल है।

प्रश्न 11. आन का मान’ नाटक के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के उददेश्य बताइए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण प्रेमी’ जी ने प्रस्तुत ऐतिहासिक नाटक के माध्यम से मानवीय गुणों को रेखांकित किया है तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता यानि साम्प्रदायिक सौहार्द के सन्देश को प्रसारित करने की सफल कोशिश की है। वीर दुर्गादास जहाँ भारतीय हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं इनके समानान्तर मुगल सत्ता को रखा गया है। सदाचार, सद्भाव, स्वाभिमान, शौर्य, राष्ट्रीयता की भावना, साम्प्रदायिक एकता, जनतन्त्र का समर्थन, अत्याचार का विरोध आदि गुणों से युक्त दुर्गादास का चरित्रांकन किया गया है। वास्तव में, नाटककार का उद्देश्य है- आधुनिक भारत के युवकों को आदर्श स्थिति से अवगत कराना तथा उनमें उच्च मानवीय भावनाओं को सम्प्रेषित करना।
साम्प्रदायिक एकता सम्बन्धी उद्देश्य भी नाटक के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। राष्ट्र का उद्बोधन एवं लोगों में जागरण की चेतना का प्रसार इस नाटक का मूल सन्देश है। इस नाटक के द्वारा राष्ट्रीय निर्माण एवं राष्ट्रीय एकता के लक्ष्यों को प्राप्त करने की सार्थक कोशिश की गई है। नाटककार ने सफीयत नामक पात्र के माध्यम से प्रेम के उदात्त लक्षणों से लोगों को परिचित कराया है। जब वह कहती है “प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है”-तो यह आज के नवयुवकों को दिया जाने वाला वह सन्देश है, जो भौतिकता या बाह्य स्वरूप से
अधिक आन्तरिक भावनाओं को महत्त्व देता है। भारतीय युवकों एवं नागरिकों में स्वदेश के प्रति गहन अपनत्व की भावना का प्रसार करना नाटककार का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसके साथ ही, नाटक के द्वारा मानवतावाद एवं विश्वबन्धुत्व का भी सन्देश दिया गया है। इस प्रकार, पुरानी मध्ययुगीन या मुगलकालीन कहानी या कथानक को माध्यम बनाकर नाटककार ने आधुनिक मानवीय सन्देशों को सहजता के साथ सम्प्रेषित करने में सफलता प्राप्त की है।

प्रश्न 12. ‘आन का मान’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक में मान, मर्यादा और देशभक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। सप्रमाण उत्तर दीजिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ में अनेक स्थलों पर राजपूतों द्वारा अपनी आन यानि शपथ पर परम्परा का निर्वाह प्रदर्शित हुआ है। वीर दुर्गादास राठौर द्वारा राजपूतों को संगठित करके राजपूती आ। एवं सम्मान की रक्षा हेतु प्रयासरत रहना, इसी का सूचक है। अपने स्वामी जसवन्त सिंह के पत्र अजीत सिंह को राजपूती आन के रक्षार्थ दुर्गादास द्वारा तैयार करना, अजीत सिंह में राजपूताना परम्पराओं पर आधारित गुणों का विकास करना, अन्तिम समय तक औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय के साथ मित्रता का निर्वाह करना आदि शीर्षक की प्रासंगिकता एवं सार्थकता को सिद्ध करते हैं। अजीत सिंह का विरोध करके दुर्गादास
सफीयतुन्निसा की इज्जत की रक्षा करना अपना राजपूताना धर्म समझता है। अपनी आन को बनाए रखने के लिए वह अपने पुत्र समान अजीत सिंह के अपमान को सह लेता है। वह अजीत सिंह का दरबार छोड़ देता है, लेकिन अपने मित्र को दिए गए
वचनों को नहीं। वह औरंगजेब के खिलाफ है, लेकिन औरंगजेब की पौत्री सफीयत के सम्मान की रक्षा के लिए वह अपनी जन्मभूमि का भी त्याग कर देता है। इस तरह, कहा जा सकता है कि ‘आन का मान’ नाटक में राजपूती आन के अनुरूप नारी-सम्मान की रक्षा, कर्त्तव्यपालन, मातृभूमि के प्रति गौरव का भाव, अपने मित्र के प्रति वचनबद्धता का निर्वाह आदि उदाहरण सिद्ध करते हैं कि नाटक में मान, मर्यादा और देशभक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

एवं चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

13 आन का मान’ नाटक के कथानक के आधार पर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के उस पात्र का चरित्र चित्रण कीजिए जिसने आपको प्रभावित किया हो।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

अथवा ‘आन का मान’ के आधार पर वीर दुर्गादास की चारित्रिक
विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के आधार पर वीर दुर्गादास का
चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा ‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा वीर दुर्गादास के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक का नायक वीर दुर्गादास राठौर है। वह मानवीय गुणों से युक्त वीर पुरुष है। उसके चरित्र ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया। दुर्गादास की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) राजपूती शान दुर्गादास पूरे नाटक में राजपूती शान के साथ मौजूद है। वह न तो किसी से डरता है और न ही किसी के सामने झुकता है। वह निर्भीक होकर अपनी परम्परा के अनुरूप राजपूती शान के साथ लोगों से अन्त:क्रिया करता है, चाहे वह कोई सम्राट हो या कोई अत्यन्त सामान्य व्यक्ति।

(ii) स्वामिभक्त राजपूती शान के अनुरूप वह अत्यन्त निर्भीक है, लेकिन इस निर्भीकता के साथ-साथ वह अपने स्वामी के प्रति अत्यन्त उत्तरदायी है। वह अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह निभाता है और अपने स्वामी के प्रति एकनिष्ठ समर्पित भाव रखता है।

(iii) निर्भीकता स्वामी के प्रति अपनी एकनिष्ठा रखते हुए भी वह स्वामी से भयभीत नहीं रहता। वह उचित को उचित एवं अनुचित को अनुचित ही बताता है। वह भारत के तत्कालीन सम्राट औरंगजेब की बातों को भी नहीं मानता, क्योंकि वे उसे उचित प्रतीत नहीं होती हैं।

(iv) मानवतावादी दृष्टिकोण दुर्गादास का चरित्र मानवीय गुणों से परिपूर्ण है। वह मानवता के विरुद्ध किसी भी सिद्धान्त को आदर्श नहीं मानता। अकबर द्वितीय के मुसलमान होने के बावजूद उसे न केवल वह अपना मित्र बनाता है, बल्कि उसकी बेटी सफीयत के सम्मान की रक्षा के लिए वह अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता। उसके मानवतावादी दृष्टिकोण में ही हिन्दू-मुस्लिम समन्वय की भावना भी निहित है।

(v) राष्ट्रीयता की भावना दुर्गादास में राष्ट्रीयता की भावना कूट- कूटकर भरी हुई है। वह एक आदर्श भारतीय समाज का निर्माण करना चाहता है, जिसमें भाईचारा एवं प्रेम का अत्यधिक महत्त्व हो। वह कहता है-“आज का सबसे बड़ा पाप है आपस की फूट……क्योंकि हमारे जीवन में नैतिकता नहीं है, ईमानदारी नहीं है, सच्ची वीरता नहीं है, मानवता नहीं है।”

(vi) कर्त्तव्यपरायणता अपने कर्त्तव्य के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहने । वाला दर्गादास अपने कर्तव्यों का पालन अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी। करता है।

(vii) सच्ची मित्रता दुर्गादास में सच्ची मित्रता को निभाने तथा ईमानदारी एवं सच्चाई के साथ मित्रता की रक्षा हेतु अपने दायित्व को पूरा करने की भावना भरी हुई है। दुर्गादास का अपने मित्र अकबर द्वितीय के प्रति किया

जाने वाला व्यवहार इसका प्रमाण है। वह सफीयत एवं बुलन्द अख्तर को अपने मित्र की पवित्र धरोहर मानता है।
इस तरह, दुर्गादास की चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि वह एक ओर तलवार का धनी था, तो दूसरी ओर उच्च स्तर का मनुष्य भी।

प्रश्न 14.’आन का मान’ नाटक के आधार पर मेहरुन्निसा का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ में ‘मेहरुन्निसा’ औरंगजेब की दूसरी पुत्री है।
मेहरुन्निसा की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

(i) गम्भीर व्यक्तित्व मेहरुन्निसा की आयु चौंतीस-पैंतीस वर्ष है। वह
अत्यन्त गम्भीर व्यक्तित्व वाली स्त्री पात्र है, जो अपने पिता औरंगजेब की क्रूर राजनात के प्रति विचार-विमर्श करती रहती है।

(ii) अत्याचार व हिंसा की विरोधी मेहरुन्निसा औरंगजेब द्वारा की गई अपने सगे सम्बन्धियों व अन्य लोगों की हत्या व अत्याचार की विरोधी है।

(iii) व्यावहारिक बुद्धि मेहरुन्निसा कहती है कि “स्त्री होने का अर्थ अन्धी होना नहीं है। वह जीनत को बताती है कि सम्राट को अपने एक पुत्र और एक पुत्री के अतिरिक्त शेष सारी सन्तानों का गला घोट देना चाहिए।”

(iv) तार्किक व विवेकी मेहरुन्निसा तर्कशील व विवेकी है। साम्राज्य के प्रति उसकी मानसिकता भिन्न है, जो औरंगजेब की शासन-प्रणाली से उत्पन्न हई है। उसका मानना है कि “सम्राट यह न करे कि मस्जिदें बनवाए और मन्दिरों को तुड़वाए या मन्दिरों को बनवाए और मस्जिदों को तड़वाए। उच्च पदों पर धर्म के आधार पर नहीं, योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ करें।। सभी धर्मों के अनुयायियों पर समान कर लगाए जाएँ और समान सुविधाएँ
उन्हें दी जाएँ।”

(v) ममत्व तथा स्त्रीत्व भाव से ओत-प्रोत मेहरुन्निसा स्त्री होने के
साथ-साथ माँ भी है वह कहती है “पुत्रियाँ भले ही जी लें, लेकिन पुत्रों को मरना ही पड़ता है। उनके बड़े होकर मरने से उनकी पत्नियाँ बे-सहारा हो जाती हैं, अपमान सहती हैं, उनके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। उन्हें क्यों दण्ड दिया जाएँ?”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मेहरुन्निसा बद्धिजीवी. तार्किक व विवेकशील है। उसके हृदय में अपने पिता के प्रति क्रोध और घृणा है। जिस कारण वह अन्त तक औरंगजेब को क्षमा नहीं कर पाती।

प्रश्न 15.’आन का मान’ नाटक के आधार पर ‘अजीत सिंह’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक में अजीत सिंह स्वर्गीय जसवन्त सिंह का पुत्र है, जिसका पालन-पोषण दर्गादास ने किया था। अजीत सिंह बीस-वर्षीय नवयुवक है। तथा सफीयतुन्निसा के प्रति प्रेम-भाव रखता है। अजीत सिंह की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

(i) उत्तेजित स्वभाव अजीत सिंह बीस वर्ष का नवयुवक है, जो
सफीयतुन्निसा के प्रति आकर्षित है। सफीयत के उपहास करने पर शीघ्र ही अजीत सिंह उत्तेजित होकर कहता है। “राठौर का मस्तक शक्ति के आगे नहीं झुकता।”

(ii) सफीयतुन्निसा के प्रति आसक्त अजीत सिंह सफीयत के गीत को सुनकर अत्यन्त भाव-विभोर हो जाता है, क्योंकि वह सफीयत के प्रति आसक्त है। वह कहता है, “घबराओं नहीं शहज़ादी, राजपूत अतिथि का मान-सम्मान करना जानता है। मारवाड़ का बच्चा-बच्चा आपके सम्मान के लिए अपने प्राण न्योछावर करने को प्रस्तुत है।”

(iii) संगीत प्रेमी अजीत सिंह संगीत प्रेमी है। वह कहता है कि “संगीत में। बहुत आकर्षण होता है विषधर काले नाग को नचाता है भोला-भाला हिरन उस पर मोहित हो अपने प्राण तक गँवा देता है।”

(iv) भावुक व्यक्तित्व अजीत सिंह बाल्यावस्था में ही अनाथ हो जाता है, जिस कारण वह स्वयं को अभागा समझता है। “घोड़ों की पीठ ही। उसके लिए माँ की गोद रही है, तलवार की झंकार ही उसकी माँ की गाई हई लोरी बनी है।” इस स्वभाव से उसकी भावुक प्रवृत्ति का प्रतिपादन हुआ है।

(v) प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित अजीत सिंह मारवाड़ का राजा बनने वाला है, परन्तु एक मुगल कन्या (सफीयतुन्निसा) से प्रेम करने का साहस कर बैठता है। वह अपने प्रेम के लिए मारवाड़ की राजगद्दी तक को छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है।

(vi) कृतघ्न एवं स्वकेन्द्रित अजीत सिंह सफीयत से विवाह करना चाहता था, परन्तु दुर्गादास इसका विरोध करता है। प्रेम के वशीभूत अजीत सिंह अपने पालनहार दुर्गादास का भी अपमान करता है। वह अपने देश, प्रजा व मान की चिन्ता न करके केवल स्वयं के बारे में ही सोचता है। वह दुर्गादास से कहता है कि “मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूँगा।”
अन्तत: कहा जा सकता है कि अजीत सिंह शीघ्र उत्तेजित हो उठने वाला अस्थिर चित्त का हठी व्यक्ति है। वह सफीयतुन्निसा से अपनी सम्पूर्ण भावनाओं के साथ स्नेह करता है। इसी स्नेह के उन्माद में वह अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 16. “आन का मान’ नाटक के किसी नारी पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की प्रमुख नारी पात्र है-‘सफीयतुन्निसा’। वह औरंगजेब के पुत्र अकबर (द्वितीय) की पुत्री है। सफीयतुन्निसा की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं ।

(i) अत्यन्त रूपवती सफीयतुन्निसा की आयु सत्रह वर्ष है। वह अत्यन्त रूपवती है। वह इतनी सुन्दर है कि नाटक के सभी पात्र उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हैं।

(ii) संगीत में रुचि वह एक उच्चकोटि की संगीत साधिका है। उसे
संगीत में अत्यधिक रुचि है। उसका मधुर स्वर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

(iii) वाक्पटु वह अत्यन्त वाक्पटु है। वह विभिन्न परिस्थितियों में अपनी वाक्पटुता का प्रदर्शन करती है। उसके व्यंग्यपूर्ण कथन तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उसके कथन मर्मभेदी भी हैं।

(iv) शान्तिप्रिय एवं हिंसा-विरोधी सफीयतुन्निसा शान्तिप्रिय है। वह
चाहती है कि देश में सर्वत्र शान्तिपूर्ण वातावरण हो, सभी देशवासी
सुखी और समृद्ध हों। देश में हिंसापूर्ण कार्यों का वह प्रबल विरोध
करती है।

(v) देशप्रेमी वह अपने देश से अत्यन्त प्रेम करती है। वह त्याग और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत है। देश के लिए अपना सर्वस्व ‘न्योछावर करने के लिए वह उद्यत नज़र आती है।।

(vi) आदर्श प्रेमिका सफीयतुन्निसा जोधपुर के युवा शासक अजीत सिंह से प्रेम करती है। वह प्रत्येक परिस्थिति में अपना सन्तुलन बनाए रखती है। अजीत सिंह के बार-बार प्रेम निवेदन करने पर भी वह विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। वह अजीत सिंह को भी धीरज बँधाती है और उसे लोकहित के लिए आत्महित का त्याग करने का परामर्श देती है। वह कहती है “महाराज! प्रेम
केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है। इस प्रकार सफीयतुन्निसा एक आदर्श नारी-पात्र है। वह अजीत सिंह से प्रेम करती है, परन्तु राज्य व अजीत सिंह के कल्याण के लिए विवाह के लिए तत्पर दिखाई नहीं देती।

प्रश्न 17. ‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण संक्षेप में कीजिए।

अथवा ‘आन का मान’ के आधार पर औरंगजेब की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ‘आन का मान’ नाटक में औरंगजेब के चरित्र को एक खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। धार्मिक दृष्टि से कट्टर मुस्लिम मुगल शासक औरंगजेब इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मों के प्रति अत्यन्त संकीर्ण दृष्टिकोण रखता है। औरंगजेब की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

(i) कट्टरता एवं संकीर्णता औरंगजेब धर्मान्धता के वशीभूत होकर मात्र इस्लाम धर्म को ही मानव के लिए श्रेयस्कर समझता है। अन्य सभी धर्म उसकी दृष्टि में हेय हैं। वह अपनी संकीर्ण धार्मिक विचारधारा से कभी मुक्त नहीं हो पाता है।

(ii) निर्दयी एवं नृशंस सत्ता के लोभ में अन्धा औरंगजेब सत्ता प्राप्ति के लिए अपने बड़े भाइयों की हत्या तक कर देता है तथा अपने पिता, पुत्र एवं पुत्री को कैद में डाल देता है।

(iii) सादा जीवन यह औरंगजेब के चरित्र का एक उज्ज्वल पक्ष है। सत्ता में रहने के बावजूद वह सुरा-सुन्दरी से दूर रहता है तथा अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए भी वह अपनी मेहनत से कमाई करता है। विलासितापूर्ण जीवन से वह कोसों दूर है।
तथा सरकारी खजाने पर व्यक्तिगत अधिकार नहीं समझता।

(iv) आत्मग्लानि समय बीतने पर वृद्धावस्था में वह अपने नृशंस कृत्यों एवं अत्याचारों के प्रति ग्लानि महसूस करता है। अपने द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से वह स्वयं ही दु:खी होता है। वह स्वयं कहता है-“हाथ थक गए हैं बेटी! सिर काटते-काटते।”

(v) सन्तान के प्रति असीम स्नेह वृद्धावस्था में वह भावनात्मक रूप से अत्यन्त कमज़ोर हो जाता है। अपने जीवन में तलवार के बल पर सभी जगह शासन एवं अत्याचार करने वाला औरंगजेब वृद्धावस्था में अपनी सन्तानों के प्रति स्नेह से विह्वल हो जाता है। वह अपने पुत्र अकबर द्वितीय को गले लगाना चाहता है। अपनी वसीयत में वह अपने पुत्रों से क्षमा करने के लिए लिखता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक कठोर, अन्यायी, क्रूर, नृशंस, कट्टर-धार्मिक एवं हिन्दू धर्म विरोधी शासक औरंगजेब के चरित्र में वृद्धावस्था में परिवर्तन आता है। वह अब एक दयाल एवं स्नेही व्यक्ति के रूप में सामने आता है। नाटककार ने उसके क्रूर स्वभाव के साथ-साथ वृद्धावस्था में परिवर्तित उसके दयाल एवं स्नेही व्यक्तित्व को भी सफलतापूर्वक चित्रित किया है।

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