भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – परिचय – प्रेम-माधुरी – यमुना-छवि

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – परिचय – प्रेम-माधुरी – यमुना-छवि
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – प्रेम-माधुरी // यमुना-छवि
Chapter 1
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – संक्षिप्त परिचय – UP Board syllabus
नामभारतेन्दु हरिश्चन्द्र
जन्म1850 ई.
जन्म स्थान काशी
पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र
शिक्षास्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला आदि
भाषाओं का ज्ञान
प्रमुख लेखन विधाएँकविता, नाटक, एकांकी, निबन्ध, उपन्यास,
पत्रकारिता आदि
रचनाएँकाव्य-संग्रह प्रेम-माधुरी, प्रेम तरंग, दान लीला
आदि। नाटक भारत दुर्दशा, अन्धेर, नगरी,
सत्य हरिश्चन्द्र, श्री चन्द्रावली आदि।
उपन्यासपूर्ण प्रकाश, चन्द्रप्रभा।
सम्पादनकवि-वचन-सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन तथा
हरिश्चन्द्र चन्द्रिका
साहित्य में स्थान भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने हिन्दी साहित्य के
विकास में जो भूमिका निर्वहन की, उसके
लिए हिन्दी-साहित्य जगत् सदैव इनका ऋणी रहेगा।
मृत्यु1885 ई.

प्रश्न-पत्र में हिन्दी पाठ्यपुस्तक से पाठों के कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछा जाता
है। इस प्रश्न में किन्हीं तीन कवियों के नाम दिए जाएंगे, जिनमें से किसी एक कवि के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के ।
लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 1850 ई. में कार सम्पन्न परिवार में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के वंशज भारतेन्दुक पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र था, जो ‘गिरिधरदास के नाम से कविता लिखते थे। घरेलू परिस्थितियों एवं समस्याओं के कारण भारतेन्द की शिक्षा व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाई। इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी आदि /भाषाओं की शिक्षा ली। इन्होंने कविताएँ लिखने के साथ-साथ ‘कवि-वचन-सुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया। बाद में, ‘हरिश्चन्द्र मैग्जीन’ तथा ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ का भी सफल सम्पादन किया। ये साहित्य के क्षेत्र में कवि, नाटककार, इतिहासकार, समालोचक, पत्र-सम्पादक आदि थे, तो समाज एवं राजनीति के क्षेत्र में एक राष्ट्रनेता एवं सच्चे पथ-प्रदर्शक थे। जब राजा शिवप्रसाद को अपनी चाटुकारिता के बदले विदेशी सरकार द्वारा सितारे-हिन्द की पदवी दी गई, तो देश के सुप्रसिद्ध विद्वज्जनों ने इन्हें 1880 ई. में भारतेन्द’ विशेषण से विभूषित किया। क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण अल्पाय में ही 1885 ई. में भारत का यह इन्दु (चन्द्रमा) अस्त हो गया। गद्यकार के रूप में भारतेन्द जी को हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है। इन्होंने साहित्य को सर्वांगपर्ण बनाया। काव्य के क्षेत्र में इनकी कृतियों को इनके युग का दर्पण माना जाता है।

कृतियाँ
बहगणी प्रतिभा से सम्पन्न भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं

काव्य संग्रह प्रेम-माधुरी, प्रेम तरंग, प्रेम सरोवर, प्रेम मालिका, प्रेम प्रलाप, तन्मय लीला, कृष्ण चरित, दान-लीला, भारत वीरत्व, विजयिनी, विजय पताका आदि।

नाटक वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, सत्य हरिश्चन्द्र, श्रीचन्द्रावली, भारत दुर्दशा, नीलदेवी और अन्धेर नगरी आदि।

उपन्यास पूर्ण प्रकाश और चन्द्रप्रभा।
इतिहास और पुरातत्त्व सम्बन्धी कृतियाँ कश्मीर कुसुम, महाराष्ट्र देश का इतिहास, रामायण का समय, अग्रवालों की उत्पत्ति, बूंदी का राजवंश और चरितावली।
उर्दू-साहित्य स्यापा, नए जमाने की मुकरी।

काव्यगत विशेषताएँ

भाव पक्ष
भारतेन्दु ने मुख्यत: राष्ट्रीयता, समाज सुधार, भक्ति भावना, शृंगार एवं प्रकृति चित्रण को अपने काव्य का विषय बनाया। ये रीतिकाल एवं आधुनिक काल के सन्धि सूत्र के समान थे। तत्कालीन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनकी रचनाओं में क्रान्ति की धधक नहीं है, लेकिन स्वाभिमानी राष्ट्रीयता के तत्त्व अवश्य भरपूर हैं।

कला पक्ष

  1. भाषा भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी गद्य के प्रवर्तक थे, जिन्होंने खड़ी बोली को आधार बनाया, लेकिन पद्य के सम्बन्ध में ये शिष्ट, सरल एवं माधुर्य गुण से परिपूर्ण ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में इन्होंने ब्रजभाषा के परिमार्जन का कार्य किया। कुछ अप्रचलित शब्दों को बाहर करने के अलावा भाषा के रूढिमक्त रूप को अपनाया। भाषा के निखार के लिए लोकोक्तियों एवं मुहावरों को भी अपनाया। भारतेन्दु ने पद्य की कुछ रचनाएँ खड़ीबोली में भी की।
  2. शैली भारतेन्दु जी की शैली इनके भावों के अनुकूल है। इन्होंने इसमें नवीन प्रयोग करके अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने अपने काव्य में चार प्रकार की शैलियों को अपनाया
    (i) भावात्मक शैली-प्रेम एवं भक्ति के पदों में ।
    (ii) रीतिकालीन अलंकार शैली-श्रृंगार के पदों में
    (iii) उदबोधन शैली-देश-प्रेम की कविताओं में
    (iv) व्यंग्यात्मक शैली-समाज सुधार सम्बन्धी कविताओं में
    इन सभी रचनाओं में इन्होंने काव्य-स्वरूप के अन्तर्गत मुक्तक शैली का प्रयोग किया।
  3. अलंकार एवं छन्द भारतेन्दु जी के काव्य में अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। इन्होंने अपने काव्य में अलंकारों को साधन के रूप में ही अपनाया है, साध्य-रूप में नहीं। भारतेन्दु जी ने मुख्यतः अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं सन्देह अलंकारों को अपने काव्य में अधिक महत्त्व दिया। कवित्त, सवैया, लावनी, चौपाई, दोहा, छप्पय, गज़ल, कुण्डलिया आदि छन्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
भारतेन्दु जी में वह प्रतिभा थी, जिसके बल पर ये अपने युग को सच्चा एवं सफल नेतृत्व प्रदान कर सके। इनकी काव्य कृतियों को इनके युग का दर्पण कहा जाता है। भारतेन्दु जी की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन युग को हिन्दी साहित्य में ‘भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या प्रेम-माधुरी

  • 1 मारग प्रेम को को समुझै ‘हरिचन्द’ यथारथ होत यथा है।
    लाभ कछु न पुकारन में बदनाम ही होन की सारी कथा है।।
    जानत है जिय मैरौ भली बिधि औरू उपाइ सबै बिरथा है।
    बावरे हैं ब्रज के सिगरे मोहिं नाहक पूछत कौन बिथा है।।

शब्दार्थ को-कौन यथारथ-यथार्थ, वास्तविक; जिय-हृदय; बिरथी-व्यर्थ; सिगरे-सब; बिथा-व्यथा, पीड़ा।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम-माधुरी’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।

प्रसंग प्रस्तुत सवैया में ब्रजबाला प्रेम-मार्ग पर चलने से होने वाली निन्दा एवं कष्टों का वर्णन कर रही है।

व्याख्या नायिका अपनी सखी से कहती है कि प्रेम मार्ग को समझना अत्यन्त कठिन है। यह मार्ग जीवन के कटु यथार्थ की तरह ही कठोर एवं कष्टकर है। वह अपनी सखी से अपनी स्थिति का वर्णन करते हुए कहती है कि इस कठिन मार्ग पर चलते हुए उसे जो कष्ट हुए हैं उसे दूसरों को सुनाने से कोई लाभ नहीं है। दूसरों को इस प्रेम-कथा को सुनाने से उसे बदनामी के अतिरिक्त कुछ भी मिलने वाला नहीं है। वह कहती है कि उसे यह अच्छी तरह से पता है कि प्रम-व्यथा से मक्ति पाने के सभी उपाय व्यर्थ है, इसलिए इसे चुपचाप सहते। जाना ही अच्छा है। उसे ऐसा लगता है जैसे ब्रज के सारे लोग पागल हो गए हैं, सस व्यर्थ ही बार-बार उसकी प्रेम-पीड़ा के बारे में पूछते है कि उसे कष्ट क्या है? उसके अनुसार प्रेम-पीड़ा किसी दूसरे के सामने प्रकट करने की चीज नहीं है, कन ब्रजवासियों द्वारा बार-बार उसके कष्ट का कारण पूछने पर उसका दुःख हो जाता है और इसे सहना अत्यन्त कठिन है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(1) प्रेम पीड़ा को दूसरों के सामने प्रकट न करने के भाव की अभिव्यक्ति
(ii) रस विप्रलम्भ शृंगार
कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
छन्द सवैया अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य
शब्द शक्ति लक्षणा

  • 2 रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
    जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछु न कहैं तो सनेह नसाइए।।
    जो ‘हरिचन्द’ कहैं तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए।
    तासों पयान समै तुम्हरे हम का कहैं आपै हमें समझाइए।।

शब्दार्थ नसै-नष्ट होना; बिन जीहैं-बिना जीवित रहे; पतिआडए-विश्वास करना; पयान समै-प्रस्थान के समय।

सन्दर्भ पूर्ववत्
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में नायिका के द्वारा परदेश जा रहे अपने पति से चतुरतापूर्वक कहे गए कथन का वर्णन है।

व्याख्या कवि ने नायिका के उस मनोभाव का चित्रण किया है, जो वह परदेश जाने वाले अपने पति के सामने प्रकट कर रही है। नायिका अपने प्रियतम से कहती है कि यदि जाते समय वह उन्हें रोकती है तो टोक लगेगा, जो यात्रा के समय अमंगल का सूचक है, क्योंकि लोग यही कहते हैं कि यात्रा के समय टोकना अशुभ होता है। यदि वह उन्हें परदेश जाने के लिए कहती है तो उससे उसका प्रेम नष्ट हो जाएगा। वह कहती है यदि वह उन्हें परदेश जाने से मना करती है तो यह उन पर प्रभुत्व स्थापित करने अर्थात् उन्हें आदेश देने के समान होगा, जो अनुचित है और यदि वह कुछ नहीं कहती है तो उसका पति के प्रति स्नेह नष्ट होता है। वह कहती है कि ऐसी स्थिति में यदि वह अपने प्रियतम से कहे कि उनके बिना वह जीवित नहीं रह सकती है तो क्या वे विश्वास करेंगे? नायिका इस बात से परेशान है कि परदेश जाते हुए अपने पति से वह क्या कहे। अन्ततः वह अपने प्रियतम (पति) से ही अनुरोध करती है कि उसके परदेश गमन के समय वह उससे क्या कहे, यह बात उसे वह स्वयं समझा दे। नायिका चतुरतापूर्वक अपने मन की बात पति को बताते हुए उसके प्रेम को जीतने की कोशिश कर रही है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i) नायिका के अन्तर्मन में उठ रहे भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है। नायिका की चतुरता प्रदर्शित हुई है।
(ii) रस शृंगार
कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
छन्द सवैया अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 आजु लौं जौ न मिले तो कहा हम तो तुम्हरे सब भाँति कहावै।
    मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावै।
    जो ‘हरिचन्द’ भई सो भई अब प्रान चले चहैं तासों सुनावै।
    प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा के समै सब कण्ठ लगावै।।।

शब्दार्थ आजु लौं-आज तक: उराहनो-उलाहना; तासों-इसलिए; जू-यह; रीति-परम्परा; समै-समय; कण्ठ लगावै गले लगाते हैं।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में नायिका की विरह दशा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या विरह में व्याकुल एक नायिका अपने प्रेमी के प्रति अपनी भावनाएँ व्यक्त करती हुई कहती है कि आज तक तुम हमसे नहीं मिले तो कोई बात नहीं। हम तो सभी प्रकार से केवल तुम्हारे ही कहलाते हैं। मेरा आपको कोई उलाहना नहीं है, क्योंकि सभी अपने भाग्य का फल पाते हैं। जैसा जिसके भाग्य में लिखा होता है, वैसा ही उसे भोगना पड़ता है। अगर मेरे भाग्य में आपसे न मिलना लिखा
था, तो इसमें कोई क्या कर सकता है? कवि हरिश्चन्द्र कहते हैं कि जो कुछ होना । था, वह तो हो चुका है, इसलिए बीती बातों को याद करके दुःखी होने से कोई फायदा नहीं है। अब मेरे प्राण इस तन से निकलने वाले हैं अर्थात् मेरा अन्तिम समय निकट आ गया है। अतः मैं आपको सुनाते हुए कह रही हूँ कि संसार की यह रीति (नियम) होती है, कि अन्तिम विदाई के समय सभी अपनों को गले से लगाते हैं। आप जीवन भर हमसे नहीं मिले तो न सही, परन्तु जब मैं सदैव के लिए आपसे दूर जा रही हूँ, तो आप आकर मुझे अपने गले से लगा लीजिए।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) नायक के प्रति नायिका के समर्पित प्रेम-भाव की अभिव्यक्ति हर्ड है।
(ii) रस विप्रलम्भ शृंगार
कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द मत्तगयन्द सवैया
अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

4 ब्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन हैं हमहूँ पहिचानती है।
पै बिना नंदलाल बिहाल सदा ‘हरिचन्द’ न ज्ञानहिं ठानती भी
तिम ऊधौ यहै कहियो उनसों हम और कछु नहिं जानती
पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अंखियों दुखियाँ नहिं मानती हैं।

शब्दार्थ थल-स्थलबिहाल-व्याकुल; ज्ञानहि-ज्ञान को; ठानती-महत्त्व
देती है: निहारे-देखे।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत सवैया में गोपियाँ उद्धव के ज्ञानमार्ग की अपेक्षा भक्तिमार्ग को अधिक महत्त्व देती हैं।

व्याख्या गोपियाँ, उद्धव से यह कह रही हैं कि उन्हें भी यह अच्छी तरह से मालूम है कि ब्रह्म सम्पूर्ण विश्व के कण-कण में व्याप्त है, किन्तु उन्हें नन्दलाल (कृष्ण) के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। कवि हरिश्चन्द्र कह रहे हैं कि वे ज्ञान मार्ग को महत्त्व नहीं देती हैं। (ब्रह्म को पाने के तीन मार्ग हैं-ज्ञान, कर्म एवं भक्ति।) गोपियाँ भक्ति के द्वारा कृष्ण को पाना चाहती हैं, ज्ञान के द्वारा नहीं। इसलिए वे उद्धव से कहती हैं कि वे कृष्ण से यह कह दें कि वे उनकी भक्ति करने के अतिरिक्त उनको पाने के अन्य किसी भी मार्ग को
नहीं जानती। कृष्ण को देखे बिना उनकी दुःखी आँखें किसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं होंगी एवं उनके मनाने से भी नहीं मानेंगी। अतः वे कृष्ण को उनसे मिलने के लिए भेज दें, उनकी दुखियाँ आँखों को कृष्ण से मिलने की प्रतीक्षा है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कृष्ण वियोग से व्याकुल गोपियों की विरह-व्यथा का वर्णन किया गया है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द सवैया अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य
शब्द शक्ति लक्षणा

भाव साम्य प्रेम की अनन्यता का चित्रण तलसीदास की इन पंक्तियों में भी किया। गया है
एक भरोसो एक बल, एक आस विस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास।।

यमुना-छवि

1 सरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए।।
किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज-निज सोभा।
कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।
मनु आतप वारन तीर कौं सिमिटि सबै छाये रहत।
कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ।।

शब्दार्थ तरनि-तनूजा-सूर्यपुत्री यमुना, तमाल-एक प्रकार का सदाबहार वृक्ष, कूल-किनारा, परसन-स्पर्श करने के लिए: सुहाये-शोभायमान हो; किंधौ-अथवा, मुकुर-दर्पण; लखत-देखना; उझकि-उचक कर; प्रनवत-प्रणाम करते हैं; आतप-धूप; वारन-निवारण करना; तीर-तट; निखि-देखकर नै रहे-झुक रहे हैं; लहत-प्राप्त करना।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘यमुना-छवि’ शीर्षक कविता से उदधत है।

प्रसंग कवि ने प्रस्तुत पद में यमुना की शोभा का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि यमुना नदी के किनारे तमाल के कई सुन्दर। वृक्ष छाए हुए हैं, उनकी डालियाँ किनारे की ओर झुकी हुई हैं, जिन्हें देखकर । ऐसा लगता है मानों वे यमुना के पवित्र जल का स्पर्श करना चाहते हों या वे वृक्ष जलरूपी दर्पण में अपनी शोभा देखने के लिए मानो उचक-उचक कर आगे। की ओर झुक गए हों या यमुना के जल को पवित्र मानकर उत्तम फल की प्राप्ति के लिए झुककर उन्हें प्रणाम कर रहे हों।

कवि कह रहे हैं कि यमुना के किनारे की ओर झुके हुए तमाल के वृक्षों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो तट को धूप-ताप से बचाने के लिए वे एक साथ सिमट कर उसे छाया प्रदान कर रहे हो या वे तट पर, कृष्ण को नमन करने एवं उनकी सेवा करने के लिए झुके हुए हों। उनके तट पर झुके होने का कारण कृष्ण का दर्शन पाना भी हो सकता है, जिनके दर्शन से मन एवं आँखों को अत्यधिक शीतलता एवं सुख मिलता है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) यमुना के किनारे छाए हुए तमाल के वृक्षों की अनुपम शोभा का चित्रण किया गया है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास, सन्देह, उत्प्रेक्षा गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा

  • 2 तिन पै जेहि छिन चन्द जोति राका निसि आवति।
    जल मैं मिलिकै नभ अवनी लौं तान तनावति।।
    होत मुकुरमय सबै तबै उज्जल इक ओभा।
    तन मन नैन जुड़ात देखि सुन्दर सो सोभा।।।
    सो को कबि जो छबि कहि सकै ता छन जमुना नीर की।।
    मिलि अवनि और अम्बर रहत छबि इक-सी नभ तीर की।

शब्दार्थ तिन पै-जिन पर जेहि -जिस-छिन -क्षण चन्द जोति -चाँदनी:
राका निसि -पूर्णिमा की रात;अवनी -भूमि:तान तनावति -तम्बू सी तनी हुई है;मुकुरमय -दर्पण-सा ओभा –शोभा;जुड़ात -शीतल होता है; अम्बर -आकाशा

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि यमुना के जल पर पूर्णिमा की चाँद की किरणों के प्रकाश से उत्पन्न सौन्दर्य का वर्णन कर रहे हैं।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि पूर्णिमा के चाँद की किरणें जिस क्षण यमुना के जल पर पड़ती हैं, तो उन्हें देखकर ऐसा लगता है, मानों ये किरणें यमुना के जल में मिलकर पृथ्वी से आकाश तक एक तम्बू सा तान देती हैं। उस समय इन किरणों का उज्ज्वलमय प्रकाश दर्पण के समान प्रतीत होता है। यमुना की इस अनुपम सुन्दरता को देखकर तन, मन एवं आँखें शीतलता एवं सुख का अनुभव करती हैं। यमुना जल की इस सुन्दरता का वर्णन कोई कवि नहीं कर सकता है। ऐसे समय में पूर्णिमा के चाँद की किरणों से आकाश और नदी के किनारों की सुन्दरता आकाश से पृथ्वी तक जैसे एक समान ही दिखाई पड़ती है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) पद्यांश में इस भाव की अभिव्यक्ति हुई है कि पूर्णिमा का चाँद आकाश एवं
पृथ्वी दोनों को एक समान सुन्दर बना देता है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास तथा उपमा गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा व लक्षणा

  • 3 परत चन्द्र प्रतिबिम्ब कहूँ जल मधि चमकायो।
    लोल लहर लहि नचत कबहुँ सोई मन भायो।
    मनु हरि दरसन हेत चन्द्र जल बसत सुहायो।
    कै तरंग कर मुकुर लिये सोभित छबि छायो।
    कै रास रमन में हरि मुकुट आभा जल दिखरात है।
    कै जल उर हरि मूरति बसति ता प्रतिबिम्ब लखात है।।

शब्दार्थ मधि -मध्य में लोल -चंचल-लहि -पाकर हेत -के लिए बसत
बसता है;सुहायो -सुन्दर मुकुर -दर्पण, शीशा:रास रमन -रास क्रीड़ा; डर -बीच में दिखाई देता है।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने यमुना के जल पर पड़ते हुए चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि यमुना के जल के मध्य में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब चमकता हुआ दिखाई पड़ रहा है। यमुना के जल की चंचल लहरों के हिलने से चन्द्रमा के हिलते हुए प्रतिबिम्ब को देखकर कवि को ऐसा लगता है, मानो वे चंचलता के साथ नृत्य कर रहे हों। चन्द्रमा के इस प्रतिबिम्ब की शोभा को देखकर, यह लगता है कि मानो विष्णु (जिनका निवास स्थल जल में है) के दर्शन के लिए वह जल में उतर आया है अथवा वह यह सोच कर यमुना के जल में आ बसा है। कि जब कृष्ण यमुना-तट पर, विहार करने आएँगे, तब उसे उनके दर्शन प्राप्त हो जाएँगे। कवि कह रहे हैं कि चन्द्रमा की छवि, जल में ऐसी शोभा पा रही है, जैसे यमुना की लहरें, अपने हाथ में चन्द्रमा का प्रतिबिम्बरूपी दर्पण लिए हों अथवा रास-क्रीड़ा में रमे हुए, श्रीकृष्ण के मुकुट की आभा ही इस चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के रूप में, यमुना के जल में प्रतिबिम्बित हो रही हो। कवि चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कल्पना कर रहे हैं कि यह भी हो सकता है कि यमुना के हृदय में चन्द्रमा के रूप में, कान्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की छवि बसी हुई है एवं यह प्रतिबिम्ब उन्हीं का है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कवि के मन में अनेक कल्पनाएँ उत्पन्न हो रही हैं।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, सन्देह तथा मानवीकरण गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 4 कबहुँ होत सत चन्द कबहुँ प्रगटत दुरि भाजत।
    पवन गवन बस बिम्ब रूप जल में बहु साजत।।
    मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोलै।
    कै तरंग की डोर हिंडोरनि करत कलोलें।।
    कै बालगुड़ी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती।
    कै अवगाहत डोलत कोऊ ब्रजरमनी जल आवती।।

शब्दार्थ सत-सौ: दुरि-दूर भाजत-भागता है;गवन -चलना;
बहु सजात -बहुत से शोभायमान होते हैं,ससि-चन्द्रमा अनुराग-प्रेम; जमुन-यमुना कलोले-क्रीडा: बालगुड़ी-बच्चों की पतंग:धावती-दौड़ती है: अवगाहत -नहाकर ब्रजरमनी-ब्रज की नारी आवती.-आती हुई।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि भारतेन्दु ने जल में पड़ते हुए, चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या चाँदनी रात में हवा के चलने से जब यमुना का जल हिलने लगता । है, तब उस जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब, अनेक रूपों में सुशोभित होने लगता है। यमुना के हिलते हुए जल में, लहरें भी हिलती हैं, उन लहरों में कभी-कभी कवि को सौ-सौ चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ते हैं, जो अनेक रूपों में सुशोभित होते
हैं। कभी उन चंचल, लहरों के साथ दूर चले जाने से चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब अदृश्य हो जाता है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि प्रतिबिम्ब लहरों के साथ उनसे दूर चला जाता है। कभी वह कवि के सामने प्रकट हो जाता है एवं कभी दूर जाती लहरों के साथ छिपकर दूर भाग जाता है। हवा के कारण लहरों में हिलते हुए चन्द्रमा
के प्रतिबिम्ब को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा प्रेम से परिपूर्ण होकर यमुना-जल में डोलता फिर रहा हो, तो कभी ऐसा लगता है मानो चन्द्रमा युमना की लहररूपी डोरी को पकड़कर जल के झूले में झूलता हुआ आनन्द-क्रीड़ा कर रहा हो। लहरों के साथ इधर-उधर हिलते हुए प्रतिबिम्ब को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बच्चे के द्वारा उड़ाई गई पतंग आकाश में ।
इधर-उधर उड़ती हुई सुशोभित हो रही हो। या फिर कोई ब्रज-युवती जल-विहार करती हुई चली आ रही हो। कवि के मन में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब से सम्बन्धित – कई कल्पनाएँ मूर्त स्वरूप धारण करती है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि ने चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के अनेक काल्पनिक रूपों को चित्रण किया है।
(i) रस श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास, उत्प्रेक्षा एवं दृष्टान्त गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा।

  • 5 मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल।
    के तारागन ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल।।
    कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत।
    तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।
    कै बहुत रजत चकई चलत के फुहार जल उच्छरत।
    कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत।।

शब्दार्थ जुग-दो पच्छ-पक्ष (कृष्ण और शुक्ल) लुकत-छिप जाते हैं।
अबिकल-पर्ण: कालिन्दी नीर-यमुना के जल में उपजावत-पैदा करता है। तासों-उससे, उच्छरत-उछलता है; निसिपति-चन्द्रमाः मल्ल-पहलवान।।

सन्दर्भ पूर्ववत्।।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का अनुपम वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि यमुना के जल में कभी तो चन्द्रमा का।
प्रतिबिम्ब दिखाई देता है एवं कभी अदृश्य हो जाता है अर्थात् दिखाई नहीं देता। पर देखकर कवि को ऐसा लगता है मानों दोनों पक्ष (कृष्ण एवं शक्ल) प्रत्यक्ष रूप का के जल में मिल गए हों। कहने का तात्पर्य यह है कि चन्द्रमा के अदश्य ने पर ऐसा लगता था मानो कृष्ण पक्ष आ गया हो एवं पुन: प्रकट हो जाने पर ऐसा लगता था मानो कृष्ण पक्ष समाप्त हो गया हो एवं शक्ल । कवि को लगता है मानो तारागण को ठगने के लिए ही जाते हैं. तो कभी प्रकट हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो यमना। को ठगने के लिए ही चन्द्रमा कभी छिप। तरंगे उत्पन्न होती हैं, चन्द्रमा उतने ही रूप धारण करके उन तरंगों से मिलने के लिए उत्साहित होकर दौड़ता रहता हैं। कवि को ऐसा लगता है मानो जल-प्रतिबिम्ब के रूप में जल के भीतर चाँदी की कई चकई चल रही हों या जल की फुहारें उठ रही हों या फिर चन्द्रमारूपी पहलवान उठ-बैठकर कई प्रकार की कसरतें कर रहा हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि ने यमुना के जल में चन्द्रमा के परिवर्तित होते रूपों का वर्णन किया है।
(i) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त एवं मानवीकरण गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 6 कूजत कहुँ कलहंस कहूँ मज्जत पारावत।।
    कहुँ कारण्डव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत।।
    चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत
    सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत।।
    एकहुँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करता।
    जल पान नहान करि सुख भरे, तट सोभा सब जिय धरत।।।

शब्दार्थ कलहंस उत्तम हंस, मज्जत स्नान करना; पारावत-कबूतर;
कारण्डव कौड़ीला पक्षी; जल कुक्कुट-जल मुर्गा; चक्रवाक-चकवा चकवी बक बगुला; सुक-तोता; पिक कोयल; भ्रमरावलि-भौरों की पक्तियाँ; रोर-शोर

सन्दर्भ पूर्वदत्।

प्रसंग प्रस्तत पद में कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने यमुना के किनारे एवं यमना । के जल में विहार करते विभिन्न पक्षियों की अनुपम शोभा का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि यमुना के जल में कूजते हुए राजहंस
इधर-उधर विहार कर रहे हैं, तो कहीं कबूतरों का समूह स्नान कर रहा है, तो कहीं बतख उड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं और कहीं जल-मुर्गियाँ दौड़ती हुई दिखाई पड़ती हैं। यमुना के जल में कहीं चकवा-चकवी की जोड़ियाँ जल-विहार करते हुए। दिखाई पड़ते हैं, तो कहीं बगुले मछलियाँ पकड़ने के लिए ध्यान-मग्न दिखाई
पड़ते हैं। कहीं तोते और कोयल यमना का जल-पान कर रहे हैं, तो कहीं भौरों की पंक्तियाँ यमुना के जल में खिले हुए कमलों पर गुनगुनाते हुए गा रही हैं। यमुना के किनारे कहीं मोर नृत्य कर रहे हैं, तो कहीं विभिन्न प्रकार के पक्षी मिलकर कलरव करते हुए अत्यधिक शोर कर रहे हैं। कवि कह रहे हैं कि इस प्रकार विभिन्न प्रकार के पक्षी यमुना के जल का पान एवं उसमें स्नान तथा विहार
करते हुए सब प्रकार का सुख पाते हुए यमुना-तट की शोभा बढ़ा रहे हैं। कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र यह कह रहे हैं कि यमुना के तट की एवं स्वयं उसकी शोभा । को उन्होंने अपने हृदय में अच्छी तरह धारण कर लिया है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि ने यमुना के तट एवं उसके जल में पक्षी-विहार का अनुपम चित्रण किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रज शैली मुक्तक छन्द छप्पय अलंकार अनुप्रास गुण प्रसाद
शब्द शक्ति अभिधा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

प्रेम-माधुरी

1 रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।।
जो ‘हरिचन्द’ कहैं तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए।
तासों पयान समे तुम्हरे हम का कहैं आपै हमें समुझाइए।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक युग के प्रवर्तक कवि व नाटककार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता प्रेम-माधुरी’ से उद्धृत है।

(ii) पद्यांश में नायिका की किस मनोदशा का वर्णन किया गया है?
उत्तर पद्यांश में नायिका की असमंजस एवं दुविधापूर्ण मानसिक स्थिति का वर्णन किया गया है। नायिका का पति परदेश जा रहा है और वह इस असमंजस की स्थिति में है कि किस प्रकार विदेश जाते हुए अपने पति को अपने मनोभावों से अवगत कराए।

(iii) नायिका द्वारा जगत की किस रीति का उल्लेख किया गया है?
उत्तर नायिका जाते हुए किसी को पीछे से टोकने से सम्बन्धित जगत् की रीति का उल्लेख करती है। नायिका कहती है कि यदि वह अपने प्रियतम को पीछे से टोकती है, तो लोगों के अनुसार यात्रा को जाते समय किसी को टोकना अशुभ होता है। अतः वह किस प्रकार अपने प्रियतम को अपनी बात बताए।

(iv) जो कहे जाह न तो प्रभुता जौ कुछ न कहें तो सनेह नसाइए। पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति में नायिका की दुविधापूर्ण स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि वह सोचती है, यदि वह अपने प्रियतम से विदेश न जाने के लिए कहती है तो वह उन्हें आदेश देने के समान होगा और यदि वह उनसे। कुछ नहीं कहती तो उसका प्रेम नष्ट होगा।

(v) पद्यांश की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने नायिका की दुविधापूर्ण मानसिक स्थिति को व्यक्त करने के लिए ब्रज भाषा का प्रयोग किया है, जो अत्यन्त प्रभावशाली है। कवि ने मुक्तक शैली का प्रयोग करते हुए सम्पूर्ण कथा अभिव्यक्त की है।

  • 2 आजु लौं जौ न मिले तो कहा हम तो तुम्हरे सब भाँति कहावै।।
    मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावै।।
    जो ‘हरिचन्द’ भई सो भई अब प्रान चले चहैं तासों सुनावै।
    प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा के समै सब कण्ठ लगावै।। ।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका की किस दशा की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर नायिका नायक से अत्यधिक प्रेम करती है। वह उसे बिछुड़ने के कारण अत्यधिक दुःखी है तथा उससे मिलने के लिए लालायित है। नायिका की इस विरह अवस्था की अभिव्यक्ति ही काव्यांश में हुई है ।

(ii) नायिका अपनी विरह अवस्था के लिए किसे उत्तरदायी मानती है?
उत्तर नायिका का मानना है कि नायक से न मिल पाने अर्थात उससे (नायक)। विरह के लिए उसका भाग्य ही उत्तरदायी है। वह कहती है कि सभी अपने भाग्य के अनुसार फल पाते हैं और उसके भाग्य में नायक से विरह लिखा है, । इसलिए वह इस दशा से पीड़ित है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने अपनी कौन-सी इच्छा प्रकट की है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में नायिका नायक के विरह में तडप रही है। उसकी उत्कट इच्छा है कि नायक उससे मिलने के लिए आए। नायिका अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहती है कि उसके प्राण अब उसके तन से निकलने वाले हैं। अतः नायक को नायिका से मिलने के लिए आना चाहिए और उसे गले लगाना चाहिए।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने जगत् की किस रीति का उल्लेख किया है?
उत्तर नायिका का मानना है कि जगत की यह रीति (नियम) रही है कि जो व्यक्ति जा रहा होता है, उसे गले लगाकर अन्तिम विदाई दी जाती है। अतः नायक को आकर इस रीति का पालन करना चाहिए।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में प्रयुक्त रस को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने वियोग श्रृंगार रस का प्रयोग किया है। इस पद्यांश में कवि ने नायक से नायिका के न मिल पाने के कारण उसकी विरहावस्था का वर्णन किया है। अतः इसमें वियोग शृंगार रस है। अत: नायक को आकर इस रीत का पालन करना चाहिए।

  • 3 ब्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन हैं हमहूँ पहिचानती हैं।
    पै बिना नंदलाल बिहाल सदा ‘हरिचन्द’ न ज्ञानहिं ठानती हैं।
    तुम ऊधौ यहै कहियो उनसों हम और कछू नहिं जानती हैं।
    पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में गोपियों द्वारा किस भक्तिमार्ग को महत्त्व दिया गया है।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ ईश्वर की प्राप्ति हेतु ज्ञान मार्ग की अपेक्षा सगुण भक्ति मार्ग को अधिक महत्त्व देती हैं। इसके पक्ष में वे तर्क देते हुए कहती हैं कि अवश्य ही ईश्वर प्रत्येक कण में विद्यमान है, किन्तु उनके लिए ईश्वर प्राप्ति का । एकमात्र मार्ग सगुण भक्ति मार्ग है।

(ii) श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के भावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर मोपियाँ श्रीकृष्ण से अत्यधिक प्रेम करती हैं और उनकी भक्ति को ही जीवन का आधार मानती हैं। वे कहती हैं कि कृष्ण को देखे बिना उनकी आँखें सन्तुष्ट नहीं होती और वे उनके दर्शनों की प्रतीक्षा के लिए लालायित रहती हैं। गोपियों के ये भाव कृष्ण के प्रति उनकें प्रेम को उजागर करते हैं।

(iii) गोपियाँ कृष्ण को किस प्रकार पाना चाहती हैं?
उत्तर गोपियाँ कृष्ण को ज्ञानमार्गीय भक्ति से नहीं, अपितु उनके सगुण रूप की उपासना एवं उनके साक्षात् दर्शन करके पाना चाहती हैं।

(iv) गोपियाँ उद्धव से कृष्ण को क्या सन्देश देने के लिए कहती हैं?
उत्तर गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि वे कृष्ण से जाकर कह दें कि उनके पास उन्हें पाने के लिए उनकी भक्ति करने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है और न ही वे किसी अन्य मार्ग को जानती हैं। अत: श्रीकृष्ण उनकी प्रतीक्षा में बैठी उनकी दुखियाँ आँखों (गोपियों) को दर्शन देकर सन्तुष्ट करें।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में अलंकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में ‘ब्यापक ब्रह्म’, ‘नँदलाल बिहाल’, ‘प्यारे तिहारे निहारे व अँखियाँ दुखियाँ’ में क्रमश: ‘ब’, ‘ल’, ‘र’, ‘य’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

यमुना छवि

1 .तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए।।
किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज-निज सोभा।
कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।
मनु आतप वारन तीर कौं सिमिटि सबै छाये रहत।
कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक व कवि का नाम बताइए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी में संकलित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता ‘यमुना छवि’ से उद्धृत है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने यमुना नदी के किनारे छाए हुए तमाल के वृक्षों का वर्णन किया है। जिन्हें देखकर कवि के मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न छायाचित्र निर्मित होते हैं।

(iii) यमुना नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को क्या प्रतीत होता है?
उत्तर नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे तमाल के वृक्ष यमुना नदी को स्पर्श करना चाहते हों या फिर वे झुककर नदी के पानी में अपना प्रतिबिम्ब देखना चाहते हों। कभी-कभी कवि को ऐसा लगता है मानो वे नदी के तट को धूप से बचाने के लिए उसे छाया प्रदान कर रहे हों या वे तट पर, कृष्ण को नमन करने एवं उनकी सेवा करने के लिए झुके हुए।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के अलंकार सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अलंकारों का अत्यन्त सुन्दर प्रयोग किया है, जिसने । काव्य की शोभा बढ़ा दी है। ‘तरनि तनुजा तट तमाल’, में ‘त’ वर्ण की। आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, ‘सब निज-निज सोभा’, में निज-निज की पुनरावृत्ति के कारण पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार व ‘मन आतप वारन तीर। कौं’ में क्रमशः अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश व उत्प्रेक्षा अलंकार हैं तथा सम्पूर्ण पद्यांश में मानवीकरण अलंकार विद्यमान है।

(v) ‘तरनि-तनूजा’ व ‘तट’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची बताइए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची
तरनि-तनूजा यमुना, कालिन्दी किनारा, तीर

2.परत चन्द्र प्रतिबिम्ब कहूँ जल मधि चमकायो।
लोल लहर लहि नचत कबहुँ सोई मन भायो।
मन हरि दरसन हेत चन्द्र जल बसत सहायो।
कै तरंग कर मुकुर लिये सोभित छबि छायो।
कै रास रमन में हरि मुकुट आभा जल दिखरात है।
कै जल उर हरि मूरति बसति ता प्रतिबिम्ब लखात है।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया है?
उत्तर प्रस्तत पद्यांश में कवि ने यमुना के जल पर पड़ते हुए चन्द्रमा के प्रतिबिम्बका वर्णन किया है। जिसे देखकर कवि के मन में अनेक कल्पनाएँ उत्पन्न हो रही हैं। कभी वह उसे लहरों पर नृत्य करता हुआ प्रतीत होता है, तो कभी श्रीकृष्ण के मुकुट की आभा के समान प्रतीत होता है।

(ii) ‘मनु हरि दरसन हेत चन्द्र जल बसत सुहायो पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि यमुना नदी में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कवि को ऐसा लग रहा है, मानो चन्द्रमा यमुना के जल में यह सोचकर आ बसा है कि जब कृष्ण यमुना-तट पर विहार करने आएँगे, तब उसे उनके दर्शन प्राप्त हो जाएँगे।

(iii) कवि ने चन्द्रमा की किन-किन रूपों में कल्पना की है?
उत्तर कवि ने यमुना नदी के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर विभिन्न कल्पनाएँ की हैं कभी वह उसे पानी पर नृत्य करता हुआ दिखाई देता है, कभी वह श्रीकृष्ण के मुकुट की आभा के समान प्रतीत होता है तथा कभी वह कवि को यमुना के हृदय के रूप में दिखाई देता है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में प्रयुक्त मानवीकरण अलंकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चन्द्रमा के विभिन्न क्रियाकलापों की तुलना मानवीय क्रियाकलापों से की है; जैसे- चन्द्रमा का नदी की लहरों पर नृत्य करना या श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए यमुना तट पर आना आदि। चन्द्रमा का इस तरह वर्णन मानवीकरण अलंकार का उदाहरण है।

(v) ‘हरि’ व ‘लहर’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची
हरि विष्णु, कृष्ण
लहर तरंग, हिलोर

3.कबहुँ होत सत चन्द कबहुँ प्रगटत दुरि भाजत।
पवन गवन बस बिम्ब रूप जल में बहु साजत।।
मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोलै।
कै तरंग की डोर हिंडोरनि करत कलोलैं।।
कै बालगुड़ी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती।
कै अवगाहत डोलत कोऊ ब्रजरमनी जल आवती।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवि को यमुना नदी के जल पर पड़े चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर क्या अनुभूति होती है?
उत्तर कवि जब यमुना नदी के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखता है तो कभी। उसे लहरों पर सौ-सौ चन्द्रमा दिखाई देते हैं, कभी वह उसे दूर जाकर अदृश्य होता हुआ अनुभूत होता है। कभी वह उसे जल में झूला झूलते हए प्रतीत होता है तो कभी उसे उसमें बच्चे द्वारा उड़ाई गई पतंग की अनुभूति होती है।

(ii) ‘कै बालगुड़ी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती।’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर कवि यमुना के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कल्पना करते हुए कहता है कि यमुना की लहरों पर चन्द्रमा का हिलता हुआ प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो किसी बच्चे की पतंग आकाश में हवा के जोर से इधर-उधर हिल रही हो।

(iii) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर पद्यांश में कवि भारतेन्दु ने यमुना के जल पर पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का वर्णन किया है। चन्द्रमा का यह रूप कवि को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, जिसे देखकर कवि के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की कल्पनाएँ प्रकट हो रही हैं।

(iv) पद्यांश के शिल्प पक्ष पर प्रकाश डालिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए मुक्तक शैली में काव्य रचना की है। जल पर पड़ने वाली चन्द्रमा की छाया का वर्णन करते हुए।

पद्यांश में शृंगार रस की प्रधानता विद्यमान है। ‘मनु ससि भरि अनुराग’ में उत्प्रेक्षा अलंकार व ‘सोहत इत उत धावती’ में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है। माधुर्य गुण व लक्षणा शब्दशक्ति भी काव्य में विद्यमान है।

(v) “ससि’ व ‘नभ’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची
ससि राकेश, चन्द्रमा
नभ आकाश, गगन

  • 4 मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल।
    कै तारागन ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल।।
    कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत।
    तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।
    कै बहुत रजत चकई चलत कै फुहार जल उच्छरत।
    कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत।।
    कूजत कहुँ कलहंस कहूँ मज्जत पारावत।
    कहुं कारण्डव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत।।
    चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत।
    सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत।।
    कहुँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करत।
    जल पान नहान करि सुख भरे तट सोभा सब जिय धरत।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तलना कवि किससे करता है?
उत्तर यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तुलना कवि माह के दोनों पक्षों कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष से करता है। कवि कहता है कि जब चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है तो ऐसा लगता है मानो शुक्ल पक्ष के कारण चारों और उजाला हो गया हो और छिपने पर ऐसा लगता है मानो कृष्ण पक्ष के
कारण चारों ओर अँधेरा हो गया हो।

(ii) कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत।
तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

उत्तर प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि प्रत्येक लहर के साथ चन्द्रमा की छवि दिखने के कारण कहता है कि उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो चाँद यमुना में उठने वाली प्रत्येक लहर से मिलने के लिए उतने ही रूप धारण करके उनके पीछे उत्साहित होकर दौड़ता रहता है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने पक्षियों की शोभा का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि पक्षियों की शोभा का वर्णन करते हुए कहता है कि यमुना के जल में विभिन्न पक्षी; राजहंस, कबूतर, जल-मुर्गियाँ, चकवा-चकवी, बगुले, तोते, कोयल, मोर, भँवरे आदि इधर-उधर विहार कर रहे हैं। कोई स्नान कर रहा है, कोई गीत गा रहा है और कोई नृत्य कर रहा है। इस प्रकार, कवि ने पक्षियों के
विभिन्न क्रिया-कलापों का वर्णन किया है।

(iv) पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर पद्यांश में अलंकारों का प्रयोग उसके शिल्प एवं भाव पक्ष में सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है। पद्यांश में ‘जात, जमुन जल’ व ‘कूजत कहुँ कलहंस कहँ’ में क्रमश: ‘ज’ व ‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, ‘तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत’ में मानवीकरण, ‘मनु जुग पच्छ प्रतच्छ’ में उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग कवि ने किया है।।

(v) ‘कालिन्दी’ व ‘सुक’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची
कालिन्दी – यमुना, सूर्यसुता
सुक – तोता, सुगा

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