UP board syllabus दूतवाक्यम् (दूतवाक्य)

UP board syllabus दूतवाक्यम् (दूतवाक्य)

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी खण्ड-ख संस्कृतदूतवाक्यम् (दूतवाक्य)
Chapter 11
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

गद्यांशों एवं श्लोकों का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद

प्रश्न-पत्र में संस्कृत के पाठों (गद्य व पद्य) से दो गद्यांश व दो श्लोक दिए जाएँगे, जिनमें से एक गद्यांश व एक श्लोक का सन्दर्भ
सहित हिन्दी में अनुवाद करना होगा, दोनों के लिए 5-5 अंक निर्धारित हैं।

1.काञ्चकीय: भो भो: प्रतीहाराधिकृताः! महाराजो योधन: समाज्ञापयति- अद्य सर्वैः पार्थिवैः सह मन्त्रयितुम् इच्छामि!
तदाहूयन्तां सर्वे राजान: इति। (परिक्रम्य अवलोक्य) अये! अयं महाराजो दुर्योधन; इत एवाभिवर्तते।
(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो दुर्योधनः)
काञ्चुकीयः जयतु महाराज:! महाराजशासनात समानीतं सर्व राजमण्डलम्।।
दुर्योधनः सम्यक् कृतम्! प्रविश त्वम् अवरोधम्।
काञ्चकीय: यदाज्ञापयति महाराजः। (निष्क्रान्तः, पुनः प्रविश्य)
काञ्चुकीय: जयतु महाराजः। एष खलु पाण्डवस्कन्धावारात् दौत्येनागतः पुरुषोत्तम: नारायणः।
दुर्योधनः मा तावद् भोः बादरायण! किं किं कंसभृत्यो दामोदरस्तव नारायणः। स गोपालकस्तव पुरुषोत्तमः। ब्राहद्रथापहृतविजयकीर्तिभोगः तव पुरुषोत्तमः।
अहो! पार्थिवासन्नमाश्रितस्य भृत्यजनस्य समुदाचारः। क एष दूत: प्राप्तः।
काञ्चुकीयः प्रसीदतु महाराजः/दूतः प्राप्त: केशवः।

शब्दार्थ प्रतीहाराधिकृताः पहरेदारों, समाज्ञापयति आज्ञा देते हैं. अब आज पार्थिवः सह-राजाओं के साथ मन्त्रयितुम-
मन्त्रणा परिक्रम्य घमकर अवलोक्य देखकर जयतु जय हो. शासनात्-आज्ञा से, समानात बुला लिया गया है, सम्यक-
ठीक कृतम्-किया: अवरोधम् रनिवारा, प्रविश्य प्रवेश करके, पाण्डवरकन्याबारात्-पाण्डवों के शिविर से प्राप्तः आया है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘संस्कृत’ के ‘दूतवाक्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। ।

अनुवाद कांचकीय हे पहरेदारों महाराज दुर्योधन आज्ञा देते हैं, “मैं आज सभी राजाओं के साथ मन्त्रणा (विचार-विमर्श) करना चाहता
हैं, इसलिए सभी राजाओं को बुलाओ।”(घूमकर देखते हुए)”अरे! ये महाराज दुर्योधन तो इधर ही आ रहे हैं।” (तब जैसा कि निर्दिष्ट किया
गया, दुर्योधन प्रवेश करता है)
कांचुकीय महाराज की जय हो। महाराज की आज्ञा के अनुसार सम्पूर्ण राजमण्डल को बुला लिया गया है।
दुर्योधन अच्छा किया। तुम रनिवास में जाओ।
कांचुकीय जैसी आज्ञा महाराज। (निकलकर पुनः प्रवेश करता है) ।
कांचुकीय महाराज की जय हो। निश्चय ही पाण्डव शिविर से दूतरूप में पुरुषोत्तम नारायण (श्रीकृष्ण) पधारे हैं।
दुर्योधन हे बादरायण! ऐसा मत कहो। क्या कंस का सेवक दामोदर तेरा नारायण (भगवान) है? वह ग्वाला तेरा पुरुषोत्तम है! जरासन्ध
द्वारा छीन लिया गया विजय-यशवाला तेरा पुरुषोत्तम है! अरे! राजा के समीप रहने वाले सेवक का यही शिष्टाचार है? कहो, कौन-सा दूत आया है?
कांचुकीय महाराज प्रसन्न हो। केशव नामक दूत आया है।

2 दर्योधनः केशवः इति, एवमेष्टव्यम्! अयमेव समुदाचारः।।
भो भोः राजानः!
दौत्येनागतस्य केशवस्य किं युक्तम्। किमाहुर्भवन्तः ‘अर्घ्यप्रदानेन
पूजयितव्य: केशवः’ इति। न मे रोचते। ग्रहणे अत्र अस्य हितं पश्यामि।
ग्रहणमुपगते तु वासुदेवे, हृतनयना इव पाण्डवाः भवेयुः।।
गतिमतिरहितेषु पाण्डवेषु, क्षितिरखिलापि भवेन्ममासपत्ना।।
अपि च योऽत्र केशवस्य प्रत्युत्थास्यति स मया द्वादशसुवर्णभारेण
दण्ड्यः । तदप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः। कोऽत्र भो

शब्दार्थ समुदाचार-शिष्टाचार; राजानः-राजाओं; किं-क्या;
युक्तम्-उचित; आहु-कहते हैं; भवन्त-आप; पूजयितव्यः-पूजा करनी
चाहिए; न-नहीं; से मुझे; रोचते-अच्छा लगता है; ग्रहणे-पकड़ने।
में; ग्रहणमुपगते-बन्दी बना लेने से; हृतनयन-नेत्रहीन; भवेयुः-हो
जाएँगे; गतिमतिरहिते-गति एवं मतिविहीन हो जाने पर
क्षितिरखिला-िसम्पूर्ण पृथ्वी; यो-जो; प्रत्युत्थास्यति- खड़ा होगा:
मय-मैं (मेरे द्वारा); द्वादशसुवर्णभारेण- बारह सुवर्ण मुद्राओं से;
दण्ड्यः – दण्डित करूँगा; तदप्रमत्ता-सावधान; भवन्तः-आप सब;
कोऽयहाँ कौन।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद दुर्योधन केशव! हाँ, यही उचित है। यही शिष्टाचार है।।
हे राजाओं! दूतरूप में आए केशव के लिए क्या उचित है?
आप लोगों का क्या कहना है? अर्घ्य अर्पित कर केशव को पूजना चाहिए! मझे यह नहीं भाता। यहाँ उसे पकड़ लेने (बन्दी बना लेने) में ही मुझे हित दिखता है। वासुदेव को बन्दी बना लेने से पाण्डव नेत्रहीन हो जाएँगे। पाण्डवों के गतिविहीन एवं मतिविहीन हो जाने पर मेरे लिए सम्पूर्ण पृथ्वी शत्रु-रहित हो जाएगी। और जो भी यहाँ केशव की ओर से खड़ा होगा, उसे मैं.बारह स्वर्ण मुद्राओं से दण्डित करूँगा। अतः आप सब सावधान रहें। अरे! यहाँ कौन है?

3, काञ्चुकीयः जयतु महाराजः।
दुर्योधनः बादरायण! आनीयतां स विहगवाहनमात्रविस्मितो दूतः।
काञ्चुकीयः यदाज्ञापयति महाराजः। (निष्क्रान्त:)
दुर्योधनः वयस्य कर्ण!
प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानां ।
दौत्येक भृत्य इव कृष्णमति: स कृष्णः।
श्रोतुं सखे! त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णौ
नारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य।।
वासुदेवः अद्य खलु धर्मराजवचनात् मित्रतया चाहवदर्पम्
अनुक्तग्राहिणं दुर्योधनं प्रति मयापि अनुचितदौत्य-
समयेऽनुष्ठितः।
दुष्टवादी गुणद्वेषी शठः स्वजननिर्दयः।
सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्यं करिष्यति।।
भो बादरायण! अपि प्रवेष्टव्यम्?

शब्दार्थ आनीयता बुलाओ, विहगः-पक्षी; वयस्य-मित्र प्राप्त:-आया है; वचनात्-कहने से; इह-यहाँ; दौत्येक-दूत रूप में; भृत्य इव-सेवक के सदृश; कृष्णमति-कुटिल बुद्धि वाला; नारीमृदूनि-नारी के सदृश कोमल; वचनानि-वचन; युधिष्ठिरस्य युधिष्ठिर के खलु-निश्चय ही;
धर्मराजवचनात्-युधिष्ठिर के कहने से; मित्रतया मित्रता के कारण; अपि- क्या; दुष्टवादी-बुरे वचन बोलने वाला; गुणद्वेषी-गुणों से द्वेष रखने वाला; शठ-दुष्ट, स्वजननिर्दयः-स्वजनों के प्रति निर्दयी; मां-मुझको; दृष्ट्वा-देखकर; नैव-नहीं; कार्य-कार्य; करिष्यति-करेगा;
प्रवेष्टव्यम्-प्रवेश करें।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद कांचुकीय महाराज की जय हो। ।
दुर्योधन बादरायण! पक्षी के वाहन-मात्र से घमण्डी उस दूत को बुलाओ।
कांचुकीय महाराज की जैसी आज्ञा। (निकल गया)
दुर्योधन मित्र कर्णी
निश्चय ही पाण्डवों के कहने पर कुटिल बुद्धि वाला कृष्ण आज दूत रूप में सेवक सदृश यहाँ आया है। हे कर्ण! युधिष्ठिर के नारी के सदृश कोमल वचन सुनने के लिए तुम भी अपने कानों को तैयार कर लो।
वासदेव आज मैंने निश्चय ही युधिष्ठिर के कहने से मित्रता के कारण युद्ध का घमण्ड रखने वाले और कही बातों को न मानने वाले दुर्योधन के लिए अनुचित दूत का कार्य चुना है। बुरे वचन बोलने वाला, गुणों से द्वेष रखने वाला, दुष्ट और स्वजनों के प्रति निर्दयी दुर्योधन मुझे देखकर कार्य नहीं करेगा। हे बादरायण! आप
भी प्रवेश करें।

4 काञ्चुकीयः अथ किम् अथ किम्। प्रवेष्टुमर्हति पद्मनाभः।
वासुदेवः (प्रविश्य स्वगतम्) कथं कथं मां दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः
सर्वे क्षत्रियाः। (प्रकाशम) अललमं सम्भ्रमेण,
स्वैरमासतां भवन्तः।
दुर्योधनः कथं कथं केशवं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रियाः।
अलम अलं सम्भ्रमेण। स्मरणीयः पर्वमाश्रावितो दण्डः।
ननु अहम् आज्ञप्ता।
भोः सुयोधन! किं भणसि।
दुर्योधनः (आसनात् पतित्वा आत्मगतम्) सुव्यक्तं प्राप्त एव
केशवः।
उत्साहेन मतिं कृत्वाप्यासीनोऽस्मि समाहितः।
केशवस्य प्रभावेण चलितोऽस्म्यासनादहम्।।

शब्दार्थ अथ किम अवश्य ही प्रवेष्टमर्हति-प्रवेश के अधिकारी हैं:
पद्मनाभः-श्रीकृष्णः प्रविश्य-प्रवेश करके कथं- क्यों मां-मुझको;
दृष्ट्वा -देखकर; सम्भ्रान्ताः-घबरा गए; उत्साहेन-उत्साह से; मति-
विचार (बुद्धि); कृत्व-करके, अस्मि-हूँ: केशवस्य-श्रीकृष्ण के;
प्रभावेण-प्रभाव से।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद कांचुकीय निश्चय ही, निश्चय ही। श्रीकृष्ण! आप प्रवेश के
अधिकारी हैं।
वासुदेव (प्रवेश करके मन-ही-मन में) क्यों, मुझे देखकर सभी क्षत्रिय क्यों घबराए हुए हैं? (प्रकट रूप में) घबराएँ नहीं, आप सब निश्चिन्त होकर बैठें।।
दुर्योधन क्या, क्या, सभी क्षत्रिय केशव को देखकर घबरा उठे हैं! मत घबराएँ। पूर्व में सुनाए गए दण्ड को स्मरण रखें। निःसन्देह, मैं आज्ञा देने वाला हूँ।
वासुदेव हे दुर्योधन! क्या कहते हो?

दुर्योधन (आसन से गिरकर स्वयं ही मन में) सुस्पष्ट है, केशव आ गया है। उत्साहपूर्वक मन में दृढ़ निश्चय करके मैं अत्यधिक सावधान बैठा हूँ, किन्तु केशव के प्रभाव से मैं आसन से विचलित हो गया हूँ।

5 अहो! बहुमायोऽयं दूतः। (प्रकाशम्) भो दूत! एतदासनमास्यताम्।
वासुदेवः आचार्य! आस्यताम्। गाङ्गेयप्रमुखा: राजानः! स्वैरम्
आसतां भवन्तः।
वयमपि उपविशामः। (उपविशति)

शब्दार्थ अहो! -अरे;बहुमायोऽयं -बहुत मायावी है,दूतः -दूत
(संदेशवाहक);प्रकाशम् -प्रकट रूप में एतदासनमास्यताम् -इस आसन पर बैठो,आस्यतां -बैठिए,स्वैरम् -आराम से;आसतां -बैठे।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद अरे! यह दूत बहुत मायावी है (प्रकट रूप में) हे दूत! इस आसन पर बैठो।
वासुदेव हे आचार्य! आप बैठिए। हे भीष्म आदि राजाओं! आप सब आराम से बैठिए। हम भी बैठते हैं। (बैठ जाते हैं।

6 दुर्योधन धर्मात्मजो वायुसुतश्च भीमो भ्रातार्जुनो मे त्रिदशेन्द्रसूनुः
यमौ च तावश्विसुतौ विनीतौ सर्वे सभृत्या: कुशलोपपन्ना।।

शब्दार्थ धर्मात्मजो -धर्म के पुत्र (युधिष्ठिर);वायुसुतः –वायु के पुत्र
(भीम);भ्राता -भाई,मे –मेरा;त्रिदशेन्द्रसूनुः -देवताओं के राजा इन्द्र का पुत्र (अर्जुन) यमौ -जुड़वाँ,तावश्विसुतौ -वे दोनों अश्विनीकुमारों के पुत्र (नकुल-सहदेव);सर्वे -सभी;सभृत्या – सेवकों सहित।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद धर्म के पुत्र (युधिष्ठिर) और वायुपुत्र भीम, मेरे भाई और इन्द्र के पुत्र अर्जुन, जुड़वाँ वे दोनों अश्विनी कुमारों के पुत्र नकुल और सहदेव सभी सेवकों सहित कुशल हैं।

7 वासुदेवः कुशलिन: सर्वे भवतो राज्ये शरीरे च कुशलमनामयं च
पृष्ट्वा विज्ञापयन्ति
अनुभूतं महदुःखं सम्पूर्णः समय: स च।।
अस्माकमपि धर्म्यं यद् दायाद्यं तद् विभज्यताम्।।।

शब्दार्थ कुशलिन: -कुशल,अनामयं -नीरोग:पृष्ट्वा -पूछकर;
विज्ञापयन्ति -सूचित करते हैं,अनुभूतं -अनुभव किया,महद्दुःखं – बड़ा
दुःख,अस्माकमपि -हमारा भी,यद् -जो दायाद्यं -उत्तराधिकार में प्राप्त
सम्पत्ति विभज्यताम -बाँट दो।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद वासुदेव सब कुशलतापूर्वक हैं। आपके राज्य की कुशलता और शरीर के स्वास्थ्य को पूछकर निवेदन करते हैं-
(हमने) अधिक कष्ट भोग लिया है। अब वह शर्त भी पूरी हो गई है। अतः धर्म के अनुसार जो भी देने योग्य हो, वह बाँट दीजिए।

8 दुर्योधनः कथं कथं। दायाद्यमिति। भो दूत! न जानाति भवान्
राजव्यवहारम्
राज्यं नाम नृपात्मजैस्सहृदयैर्जित्वा रिपून भुज्यते।
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दीनाय वा दीयते।।
काङ्क्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम्।
स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुष्टं शमायाश्रमम्।।

शब्दार्थ कथं -कैसे, क्यों; भो दूत -अरे दूत;न -नहीं जानाति – जानते
हैं:भवान् -आप,नृपात्मजै: -राजकुमारों के द्वारा;जित्वा – जीतकर;
रिपून् -शत्रुओं को भुज्यते -भोगा जाता है:तल्लोके -वह संसार में ।
याच्यते -माँगा जाता है,दीनाय -निर्धन के लिए दीयते – दिया जाता है;
काङ्क्षा –चाह:कुर्वन्तु -करें;साहसम् -साहस जुष्टं – प्रसन्नतापूर्वक;
शमाय – शान्ति के लिए आश्रमम् – वानप्रस्थाश्रम।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद दुर्योधन क्या-क्या। उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति| अरे दूत! आप राजव्यवहार को नहीं जानते हैं।
सहृदय राजकुमारों के द्वारा राज्य तो शत्रुओं को जीतकर भोगा जाता है। वह न तो लोक (संसार) में माँगा जाता है तथा न ही किसी निर्धन व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। यदि उन्हें (पाण्डवों को) राज पाने की चाह हो तो साहस करें, अन्यथा शान्ति हेतु शान्त चित्त वाले तपस्वियों से युक्त आश्रम में प्रवेश करें।

9 वासुदेवः भोः सुयोधन! अलं बन्धुजने परुषमभिधातुम्
कर्त्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्या गुणेतराः।
सम्बन्धो बन्धुभिः श्रेयान् लोकयोरुभयोरपि।।

शब्दार्थ भोः सुयोधन! -अरे दुर्योधन,अलं -बस करो;बन्धुजने –
भाइयों को परुषम् -कठोर,अभिधातुम् -कहना भ्रातृषु –भाइयों से;
स्नेह -प्रेम विस्मर्तव्या –भुला देना चाहिए;गुणेतराः -अवगुणों को;
सम्बन्धो –मेल-मिलाप रखना;बन्धुभिः -भाइयों से;श्रेयान् –
मंगलकारी।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद वासुदेव अरे दुर्योधन! भाइयों को कठोर वचन कहना बन्द करो। भाइयों से स्नेह करना कर्त्तव्य है। उनके अवगुणों को भुला देना चाहिए। भाइयों से
मेल-मिलाप रखना दोनों ही लोकों में मंगलकारी होता है।

10 दुर्योधनः
देवात्मजैर्मनुष्याणां कथं वा बन्धुता भवेत्।
पिष्टपेषणमेतावत् पर्याप्तं छिद्यतां कथा।।

शब्दार्थ देवात्मजैः -देवपुत्रों के साथ कथं -कैसे;बन्धुता – भाईचारा;
पिष्टपेषणम् -बार-बार कहना:छिद्यतां -बन्द कीजिए।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद दुर्योधन देवपुत्रों के साथ मनुष्यों का भाईचारा कैसे हो सकता है? बार-बार कहना पर्याप्त हो चुका, अब इस कथा को बन्द कीजिए।

12 वासुदेवः भोः सुयोधन! किं न जानासि अर्जुनस्य पराक्रमम्।
दुर्योधन: न जानामि।
वासुदेव: भोः श्रूयताम्, एकेनैव अर्जुनेन तदा विराटनगरे
भीष्मादयो निर्जिताः। अपि च चित्रसेनेन नभस्तलं
नीयमानस्त्वं फाल्गुनेनैव मोचितः। अत:-
दातुमर्हसि मद्वाक्याद् राज्यार्द्ध धृतराष्ट्रज।
अन्यथा सागरान्तां गां हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः॥

दर्योधनः-कथं कथं हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः।
प्रहरति यदि युद्धे मारुतो भीमरूपी
प्रहरति यदि साक्षात्पार्थरूपेण शक्रः।
परुषवचनदक्ष! त्वद्ववचोभिर्न दास्ये
तृणमपि पितृभुक्ते वीर्यगुप्ते स्वराज्ये।।

शब्दार्थ किं-क्या;न -नहीं जानासि -जानते हो; श्रूयताम -सुनिए;
एकेनैव -अकेले ही;तदा -तब चित्रसेनेन -चित्रसेन से;मोचितः –
छुड़ाया गया था; दातुमर्हसि -दे देना चाहिए;मद्वाक्याद् -मेरे
कथन के अनुसार राज्याई -आधा राज्य धृतराष्ट्रज-धृतराष्ट्र के
पुत्र (दुर्योधन);सागरान्तां -समुद्र के अन्त तक की;गां -पृथ्वी;
हरिष्यन्ति -छीन लेंगे;पाण्डवाः -पाण्डव:प्रहरति -प्रहार करता है;
युद्ध -युद्ध में पार्थरूपेण – अर्जुन रूप में शक्र: -इन्द्रः |
परुषवचनदक्ष! -कटु वचन बोलने में दक्ष, (कृष्ण);त्वद्वचोभिः –
तुम्हारे कहने से;दास्ये -दूंगा;तृणमपि – तिनका भी;पितृभुक्ते –
पिता द्वारा भोगे गए;वीर्यगुप्ते -पराक्रम से संरक्षित।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद
वासुदेव-हे दुर्योधन! क्या अर्जुन के पराक्रम को नहीं जानते?
दुर्योधन-नहीं जानता।
वासुदेव-हे (दुर्योधन) सुनो! विराटनगर में अर्जुन ने अकेले ही भीष्म
आदि को जीता था तथा अर्जुन ने ही तुम्हें आकाश में ले जाते हुए चित्रसेन से छुड़ाया था।

हे धृतराष्ट्रकुमार! तुम्हें मेरे कथन के अनुसार राज्य का आधा भाग दे
देना चाहिए अन्यथा पाण्डव (निश्चय ही) समुद्र के अन्त तक की धरती तुमसे छीन लेंगे।
दुर्योधन कैसे, पाण्डव कैसे छीन लेंगे।
कटुवचन बोलने में दक्ष हे कृष्ण! यदि युद्ध में स्वयं वायु देव भी भीम रूप में प्रहार करें तथा साक्षात् इन्द्र भी अर्जुन रूप में प्रहार करें तो भी (मैं) तुम्हारे कहने से पिता द्वारा भोगे गए, पराक्रम से संरक्षित अपने राज्य का तिनका भी नहीं दूंगा।

13 वासुदेव: भोः कुरुकुलकलङ्कभूत!
दुर्योधन: भोः गोपालक!
वासुदेव: भोः सुयोधन ! ननु क्षिपसि माम।
दुर्योधनः आः अनात्मज्ञस्त्वम्। अहं कथयामि यद्
भवविधैः सह न भाषे।
वासुदेव: भोः शठ! त्वदर्थात् अयं कुरुवंशः अचिरान्नाशमेष्यति।
भो भोः राजानः! गच्छामस्तावत्।
दुर्योधनः कथं यास्यति किल केशवः। भोः दुःशासन!
दूतसमुदाचारमतिक्रान्त: केशव: बध्यताम्।
मातुल! बध्यतामयं केशव:। कथं पराङ्मुखः
पतति। भवतु अहमेव पाशैर्बध्नामि (उपसर्पति)।
वासुदेव: कथं बद्धकामो मां किल सुयोधनः। भवतु,
सुयोधनस्य सामर्थ्यं पश्यामि (विश्वरूपमास्थित:)।

शब्दार्थ कुरुकूलकलभता-हे कुरुवंश के कलंक;भो: गोपालक-हे ग्वाले; क्षिपसि-आक्षेप करते हो;अनात्मज्ञः -अपने से अनभिज्ञासह -साथ;न भाषे -नहीं बोलता;शठ -मूर्ख;बध्यताम -बाँध दो;मातुल -मामा; पराङ्मुखः -उल्टे मुँह।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद वासुदेव हे कुरुवंश के कलंक!
दुर्योधन हे ग्वाले!
वासुदेव हे दुर्योधन! मुझ पर आक्षेप करते हो।
दुर्योधन अरे, तू स्वयं से अनभिज्ञ है। मैं कह देता हूँ कि तुझ जैसों से मैं नहीं बोलता।
वासुदेव हे मूर्ख! तेरे कारण यह कुरुवंश शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। हे, हे राजाओं! हम जाते हैं।
दुर्योधन केशव भला कैसे चला जाएगा! हे दुःशासन! दूत की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले केशव को बाँध दो। मामा! इस केशव को बाँध दो। (अरे आप) उल्टे मुँह क्यों गिर रहे हैं? अच्छा, इसे मैं ही बन्धन से बाँधता हूँ (समीप जाता है)।
वासुदेव क्या, दुर्योधन मुझे बाँधना चाहता है? अच्छा, देखू दुर्योधन की सामर्थ्य (विराटप धारण करते हैं)।

14 दुर्योधन:-भो दूत!
सृजसि यदि समन्ताद् देवमाया: स्वमायाः
प्रहरसि यदि वा त्वं दुर्निवारैस्सुरास्त्रैः।
हयगजवृषभाणां पातनाज्जातदो।
नरपतिगणमध्ये बध्यसे त्वं मयाद्य।।

आ: तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्ट: केशव:? अहो ह्रस्वत्वं केशवस्य। आः तिष्ठ इदानीम कथं न दष्ट: केशव:! अहो दीर्घत्वं केशवस्य। कथं न दृष्टः केशवः! अयं केशवः। कथं सर्वत्र शालायां केशवा एव केशवा: दृश्यन्ते! किम् इदानीं करिष्ये! भवतु, दृष्टम्। भो राजानः! एकेन एक: केशवः बध्यताम्। कथं स्वयमेव पाशैर्बद्धाः पतन्ति राजानः। (निष्क्रान्ताः सर्वे)

शब्दार्थ सजसि -रच दो;समन्ताद -चारों ओर प्रहरसि -प्रहार करो;
हय -घोड़े,गजः -हाथियों वषभाणां -बैलों;पातनाज्जातदों – मारने से
उत्पन्न घमण्ड वाले,नरपतिगणमध्ये -राजाओं के मध्य;बध्यसे -बाँधूंगा;
आः -अरे;तिष्ठ -ठहर इदानीम -अब कथं -क्यों हस्वत्वं -सूक्ष्मता; ।
दीर्घत्वं -विशालता,शालायां -सभा में करिष्ये – करूँ पतन्ति -गिर रहे हैं; राजानः -राजागण:निष्क्रान्ताः सर्वे – सभी निकलते हैं।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद दुर्योधन अरे दूत!
यदि तुम चारों ओर अपनी देवमाया रच दो, यदि तुम अबाध दिव्यास्त्रों से प्रहार
करो, घोड़े, हाथियों एवं बैलों को मारने से उत्पन्न घमण्ड वाले, आज मैं (इन) राजाओं
के मध्य तुम्हें बाँधूंगा।
अरे! अब ठहर! क्यों नहीं दिख रहा केशव? अरे! केशव की सूक्ष्मता! अरे! अब ठहर। केशव क्यों नहीं दिख रहा? अरे! केशव की विशालता। क्यों नहीं दिख रहा केशव? यह है केशव! क्या इस सभा में सर्वत्र केशव-ही-केशव दिख रहा है? अब मैं।
क्या करूँ? अच्छा, समझा। हे राजाओं! (आप में से) प्रत्येक एक केशव को बाँधे। क्या बन्धन में बँधे राजागण स्वयं ही गिर रहे हैं! (सभी निकलते हैं)

अति लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-पत्र में संस्कृत के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अति लघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

  1. पाण्डवदूतः कः आसीत्?
    उत्तर पाण्डवदूतः श्रीकृष्णः आसीत्।
  2. श्रीकृष्ण कस्य समीपे दौत्येन गतः?
    अथवा श्रीकृष्ण: दूतरूपेण कुत्र गतः?
    उत्तर श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य समीपे दौत्येन गतः।
  3. वासुदेवः कस्य दौत्येन कुत्र गतः? .
    उत्तर वासुदेवः युधिष्ठिरस्य दौत्येन दुर्योधनस्य समीपे गतः।।
  4. दुर्योधनः कर्णं किम् अवोचत्?
    उत्तर दुर्योधनः कर्णम् अवोचत्-सखे कर्ण! त्वमपि युधिष्ठिरस्य नारीमृदूनि वचनानि श्रोतुं कर्णो सज्जया
  5. पद्मनाभः कः आसीत्?
    उत्तर पद्मनाभः श्रीकृष्णः आसीत्।
  6. सर्वे क्षत्रियाः कं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः?
    उत्तर सर्वे क्षत्रियाः श्रीकृष्णं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः।
  7. पूर्वम् श्रावितः कः स्मरणीय?
    उत्तर पूर्वम् श्रावितः दण्डः स्मरणीय।
  8. दुर्योधन: कैः सह मन्त्रयितुम इच्छामि?
    उत्तर दुर्योधनः पार्थिवैः सह मन्त्रयितुम् इच्छामि।
  9. कस्मात् दूतः आगतः?
    उत्तर पाण्डवस्कन्धावारात् दूतः आगतः।
  10. दुर्योधनः श्रीकृष्णं किम् अपृच्छत्?
    उत्तर दुर्योधनः श्रीकृष्णं अपृच्छत् यत् तस्य भ्रातरः अपि कुशलिनः।
  11. के महदुःखम् अनुभूतम्?
    उत्तर पाण्डवाः महदुःखम् अनुभूतम्।
  12. दीनाय किं न दीयते?
    उत्तर दीनाय राज्यं न दीयते।
  13. श्रीकृष्ण: दुर्योधनस्य किमपरं नाम वदति?
    उत्तर श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य अपरं नाम ‘सुयोधन’ इति वदति।।
  14. केन विराटनगरे भीष्मादयः पराजिताः?
    उत्तर अर्जुनेन विराटनगरे भीष्मादयः पराजिताः।
  15. पाण्डवाः कां हरिष्यन्ति?
    उत्तर पाण्डवाः गां हरिष्यन्ति।
  16. दुर्योधनः पाण्डवान् किं न दास्यति? |
    उत्तर दयोधनः पाण्डवान् तृणमपि न दास्याता
  17. कः कुरुकुलकलङ्क भूतः?
    उत्तर दुर्योधनः कुरुकुलकलङ्क भूतः।
  18. दुर्योधनः गोपालकः कम् अकथयत्?
    उत्तर दुर्योधनः गोपालकः श्रीकृष्णम् अकथयत्।
  19. श्रीकृष्णः कस्य सामर्थ्यं पश्यति?
    उत्तर श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य सामर्थ्यं पश्यति।
  20. श्रीकृष्णस्य कानि रूपाणि अभवन्?
    उत्तर श्रीकृष्णस्य अनेकानि रूपाणि अभवन।
  21. सर्वे राजानः कैः बद्धाः स्वयमेव पतन्ति?
    उत्तर सर्वे राजानः पाशैः बद्धाः स्वयमेव पतन्ति।
  22. दुर्योधनः कस्य पुत्रः आसीत्? –
    उत्तर दुर्योधनः धृतराष्ट्रस्य पुत्रः आसीत्।

दूतवाक्यम-पार्ट 3/संस्कृत दिग्दर्शिका/इंटर ..

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