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UP Board syllabus हजारीप्रसाद द्विवेदी – जीवन-परिचय – अशोक के फूल
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी गद्य-हजारीप्रसाद द्विवेदी // अशोक के फूल
Chapter 3
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com
जीवन परिचय हजारीप्रसाद द्विवेदी
नामहजारीप्रसाद द्विवेदी
जन्म1907 ई.
जन्म स्थानबलिया जिले के ‘दूबे का छपरा’नामक ग्राम में
पिता का नामपण्डित अनमोल दूबे
शिक्षाकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की ।
उपाधि1949 ई. में डी.लिट् की उपाधि तथा 1957 ई. में पद्मभूषण से सम्मानित
साहित्यिक पहचान निबन्धकार, आलोचक, उपन्यासकार।
भाषाशुद्ध, परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ी बोली
शैलीविवेचनात्मक, गवेषणात्मक, आलोचनात्मक, भावात्मक, आत्मपरका
साहित्य में स्थान हिन्दी-साहित्य जगत् में द्विवेदी जी को एक विद्वान् समालोचक, निबन्धकार
एवं आत्मकथा लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है। .
मृत्यु1979 ई.

जीवन परिचय

हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक एवं भारतीय संस्कृति के युगीन व्याख्याता आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 ई. में बलिया जिले के ‘दूबे का छपरा’ नामक ग्राम में हुआ था। संस्कृत एवं ज्योतिष का ज्ञान इन्हें उत्तराधिकार में अपने पिता पण्डित अनमोल दूबे से प्राप्त हुआ। 1930 ई. में इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की। 1940 से 1950 ई. तक ये शान्ति निकेतन में हिन्दी भवन के निदेशक के रूप में उपस्थित रहे। विस्तृत स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन का शिलान्यास यहीं हुआ। 1949 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 1950 ई. में ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने तथा 1960 से 1966 ई. तक पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी बने। 1957 ई. में इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। अनेक गुरुतर दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने 1979 ई. में रोग-शय्या पर ही चिर निद्रा ली।

साहित्यिक सेवाएँ

साहित्यिक सेवाएँ
आधुनिक युग के गद्यकारों में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी-गद्य के क्षेत्र में इनकी साहित्यिक सेवाओं का आकलन निम्नवत् किया जा सकता है ।

(i) निबन्धकार के रूप में आचार्य द्विवेदी के निबन्धों में जहाँ साहित्य और संस्कृति की अखण्ड धारा प्रवाहित होती है, वहीं नित्यप्रति के जीवन की विविध गतिविधियों, क्रिया-व्यापारों, अनुभूतियों आदि का चित्रण भी अत्यन्त सजीवता और मार्मिकता के साथ हुआ है।
(ii) आलोचक के रूप में आलोचनात्मक साहित्य के सृजन की दृष्टि से द्विवेदी जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में विद्वत्ता और अध्ययनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ‘सूर-साहित्य’ उनकी प्रारम्भिक आलोचनात्मक कृति है।
(iii) उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी के उपन्यासों में विस्तृत तथा गम्भीर अध्ययन व प्रतिभा का सामंजस्य मिलता है।
(iv) ललित निबन्धकार के रूप में द्विवेदी जी ने ललित निबन्ध के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण लेखन-कार्य किया है। हिन्दी के ललित निबन्ध को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले निबन्धकार के रूप में आचार्य हजारीप्रसाद अग्रणी हैं। निश्चय ही ललित निबन्ध के क्षेत्र में वे युग-प्रवर्तक लेखक रहे हैं।

कृतियाँ
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिनको निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया गया है
निबन्ध-संग्रह अशोक के फूल, कुटज, विचार-प्रवाह, विचार और वितर्क, आलोक पर्व, कल्पलता!
आलोचना-साहित्य सूर-साहित्य, कालिदास की लालित्य योजना, कबीर, साहित्य-सहचर, साहित्य का मर्म।
इतिहास हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, हिन्दी साहित्या
उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु-चन्द्र लेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
सम्पादन नाथ-सिद्धों की बानियाँ, संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, सन्देश रासक।
अनूदित रचनाएँ प्रबन्ध-चिन्तामणि, पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह, प्रबन्ध-कोश, विश्व-परिचय, लाल कनेर, मेरा बचपन आदि।

भाषा-शैली
द्विवेदी जी ने अपने साहित्य में संस्कृतनिष्ठ, साहित्यिक तथा सरल भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने संस्कृत के साथ-साथ अग्रेजी, उर्दू तथा फारसी भाषा के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी किया है। इनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग प्रायः कम हुआ है। इस प्रकार द्विवेदी जी की भाषा शुद्ध, परिष्कृत एवं । परिमार्जित खड़ी बोली है। उनकी गद्य-शैली प्रौढ़ एवं गम्भीर है। इन्होंने विवेचनात्मक, गवेषणात्मक, आलोचनात्मक, भावात्मक तथा आत्मपरक
शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी की कृतियाँ हिन्दी-साहित्य की शाश्वत निधि हैं। उनके निबन्धों एवं आलोचनाओं में उच्च कोटि की विचारात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं। हिन्दी-साहित्य जगत् में इन्हें एक विद्वान् समालोचक, निबन्धकार एवं आत्मकथा-लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है। वस्तुतः ये एक महान् साहित्यकार थे। आधुनिक युग के गद्यकारों में इनका विशिष्ट स्थान है।

पाठ का सारांश

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ एक श्रेष्ठ ललित निबन्ध है। इस निबन्ध में द्विवेदी जी ने अशोक के फूल के सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्व का वर्णन किया है। साथ ही इन्होंने अपनी बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहर की लोगों द्वारा उपेक्षा करने की ओर भी संकेत किया है।

अशोक के फूल को देखकर लेखक का उदास होना
अशोक के वृक्ष पर खिले लाल रंग के फूलों को देखकर लेखक का मन उदास हो जाता है। वह अपनी उदासी का कारण स्पष्ट करते हए कहता है कि वह इसलिए दुःखी नहीं है कि अशोक के फूल अधिक सुन्दर हैं या उनकी सुन्दरता से उसे ईर्ष्या हो रही है और न ही वह उसकी कमियों की ओर इशारा करके उसे अभागा बताकर तथा सहानुभूति दिखाकर स्वयं को उससे सुन्दर, सर्वगणसम्पन्न बताकर अपने मन को सुखी बना रहा है। उसके दुःख का कारण यह है कि जिस अशोक के फल का वर्णन करके कालिदास
ने उसे अत्यधिक सम्मान का अधिकारी बनाया, उसी अशोक को भारतीय रस साधना के पिछले हजारों वर्षों के साहित्य में भला दिया गया। उत्तर भारतीय साहित्यकारों का अशोक के प्रति यह अपमानपूर्ण व्यवहार किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

भारतीय संस्कृति : विश्व की अनेक संस्कृतियों का मिश्रण
लेखक ने भारत को विचित्र देश माना है, क्योंकि यहाँ की संस्कृति विश्व की अनेक संस्कृतियों का मिश्रण है। भारत में समय-समय पर अनेक जातियाँ असुर, आर्य, शक, हूण, नाग, गन्धर्व आदि आईं और यहीं पर बस गईं। ये जातियाँ यहाँ पर रहकर वापस चली गई और अपनी संस्कृति का गहरा प्रभाव भारतीय संस्कृति पर छोड़ गईं। इन सभी का भारतीय संस्कृति के विकास एवं समृद्धि में उल्लेखनीय योगदान है। आज समचे
विश्व में हिन्दू रीति-नीति के नाम से जो भारतीय संस्कृति प्रसिद्ध है, वह वास्तव में आर्यों एवं यहाँ रहने वाली अनेक दूसरी जातियों का मिला-जुला रूप है। इसमें विभिन्न जातियों की संस्कृति का मिश्रित रूप दृष्टिगोचर होता है।

सामन्तीय सभ्यता एवं परिष्कृत रुचि का प्रतीक : अशोक
भारतीय परम्परा में अशोक के फूल दो प्रकार के होते हैं-श्वेत एवं लाल पुष्प। श्वेत पष्प मालिक क्रियाओं की सिद्धि के लिए उपयोगी हैं, जबकि लाल पुष्प स्मृतिवर्धक माना वेदीजी का मानना है कि मनोहर, रहस्यमय एवं अलंकारमय दिखने वाला अशोक का वक्ष विशाल सामन्ती सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक है। यही का सामन्ती व्यवस्था के ढह जाने के साथ-साथ अशोक के वृक्ष की महिमा एवं दोनों नष्ट होने लगी। इससे अशोक के वृक्ष का सामाजिक महत्त्व कम होने लगा।

अशोक वृक्ष की पूजा : गन्धों एवं यक्षों की देन
प्राचीन साहित्य के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि अशोक के वृक्ष में कन्दर्प देवताओं का वास है। असल में पूजा अशोक की नहीं, बल्कि उसके अधिष्ठाता कन्दर्प-देवता की होती थी। इसे ही ‘मदनोत्सव’ कहते थे। लेखक का मानना है कि अशोक के स्तवकों (गुच्छे) में वह मादकता आज भी है। भारतवर्ष का सवर्ण युग इस पुष्प के प्रत्येक दल में लहरा रहा है।

मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा (जीने की इच्छा) लेखक का मानना है कि दुनिया की सारी चीजें मिलावट से पूर्ण हैं। कोई भी वस्तु अपने विशुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद, केवल एक ही चीज़ विशुद्ध है और वह है मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा की अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ हज़म करने के बाद भी पवित्र है। मानव जाति की दुर्दम, निर्मम धारा के हजारों वर्षों का रूप देखने से स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य की जीवन-शक्ति बड़ी ही निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है, न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती हुई यह जीवनधारा आगे बढ़ी है।

सभ्यता और संस्कृति निरन्तर परिवर्तनशील है
लेखक कहता है कि आज जिस संस्कृति को हम बहुमूल्य मान रहे हैं, वह हमेशा ऐसी ही नहीं बनी रहेगी। संसार का नियम रहा है कि समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता रहता है। आज जो वस्तु अथवा परम्परा है, वह कल अवश्य परिवर्तित होगी और तब वह एक भिन्न रूप में हमारे सामने उपस्थित होगी। यही बात संस्कृति पर भी लागू होती है। सी समय सम्राट और सामन्तों ने जिस संस्कृति को जन्म दिया था, वह । मनमोहक और व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित कर देने वाला पर समय के साथ-साथ एक दिन वह समाप्त हो गई। इसके पश्चात् धर्म के आचार्यों ने जिस ज्ञान और वैराग्य को बहुमूल्य समझा उसे समाज में प्रतिष्ठित भी किया, परन्तु उसका अस्तित्व भी धीरे-धीरे समाप्त हो गया। मध्ययुग में मुस्लिम शासकों के अनुकरण पर जो रसिक संस्कृति समाज में उमड़ी, वह भी भाप बनकर न जाने कहाँ उड़ गई? अर्थात् समाप्त हो गई। हमारी वर्तमान संस्कृति भी मध्ययुगीन रसिकता से निर्मित है और वह व्यावसायिक भी है, पर एक दिन इस व्यावसायिक संस्कृति का कमल भी मुरझाकर नष्ट हो जाएगा। समय बड़ा बलवान है, इसके प्रहार से आज तक कोई भी बच नहीं पाया है।

अशोक के फूल का मदमस्त होना
लेखक कहता है कि अशोक का फूल आज भी अपनी उसी मौज में है, जिसमें वह दो हजार वर्ष पहले था। उसका कहीं से भी कुछ नहीं बिगड़ा है। वह उसी मस्ती में हँस रहा है, वह उसी मस्ती में झूम रहा है, परन्तु जो लोग उसके महत्त्व को प्राचीन समय में देख चुके हैं वह उसकी महत्ता की क्षति को देख दुःखी होते हैं। उन दुःखी लोगों में से एक लेखक भी है, जो अशोक के फूलों की दुर्दशा देख आहत है। अन्ततः लेखक कहता है कि अशोक आज भी ज्यों का त्यों अपने अस्तित्व को लिए अपनी मस्ती में झूम रहा है। मनुष्य उसे देख अपनी मनोवृत्तियों के अनुसार उससे आनन्दित हो सकता है तथा दुःखी भी। जैसे कालिदास और मैंने अपनी-अपनी मनोवृत्तियों के चलते उसमें रस का अनुभव किया। समय बदलता है और हमें उसके अनुसार अपने मनोभावों को संचालित करते रहना चाहिए, न कि उस परिवर्तन को देखकर दुःखी होना चाहिए।

गद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

  • पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। इसलिए
    नहीं कि सुन्दर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष
    रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं!
    जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अन्तिम मुहूर्त तक का
    हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर
    भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली
    कारण तो मेरे अन्तर्यामी ही जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा मैं भी ।
    अनुमान कर सकता हूँ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) किस पुष्प को देखकर लेखक उदास हो जाते हैं?
उत्तर अशोक के खिले हुए पुष्प को देखकर लेखक उदास हो जाते हैं। उसकी सुन्दरता के कारण नहीं, बल्कि उसकी कमियों का अन्वेषण कर दुःखी हो

(ii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या बताना चाहता है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक बताना चाहता है कि संसार में सुन्दर वस्तुओं को दुर्भाग्यशाली या कम समय के लिए भाग्यवान समझकर ईर्ष्यावश उससे आनन्द की प्राप्ति करने वाले लोगों की कमी नहीं है।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्वयं के विषय में क्या कहा है?
उत्तर लेखक ने स्वयं को अन्य लोगों से कम दूरदर्शी बताकर अपनी उदारता एवं महानता का परिचय दिया है। लेखक अशोक के फूल के सम्बन्ध में अपनी मनः स्थिति एवं सोच को स्पष्ट कर रहा है।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश के लेखक व पाठ का नाम स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इस पाठ में किस शैली का प्रयोग किया है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश के लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं तथा पाठ का नाम अशोक के फूल है। इस निबन्ध में लेखक ने वर्णनात्मक, विवेचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है।

(v) निम्न शब्दों के अर्थ लिखिए।
उत्तर हतभाग्य – भाग्यहीन, अभागा दूरदर्शी – भविष्य की घटनाओं को समझने वाला।

  • भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश
    और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं। ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था; परन्तु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है. वह पहले कहाँ था। उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर. दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किसके महत्त्व पर प्रकाश डाला है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अपने भारतीय साहित्य तथा जन-जीवन में अशोक के वृक्ष की महत्ता पर प्रकाश डाला है। वे स्पष्ट करते हैं कि भारतीय साहित्य में अशोक के वृक्ष के वर्णन की गौरवशाली परम्परा कालिदास से आरम्भ होती

(ii) “इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर जिस प्रकार किसी नाटक में कोई पात्र अचानक मंच पर प्रवेश करता है और फिर अचानक ही नाटक से बाहर हो जाता है, उसी प्रकार कालिदास के साहित्य में अशोक का वर्णन पर्याप्त मात्रा में मिलता है। एक समय के जन जीवन में अशोक के वृक्ष को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, किन्तु बाद के साहित्य में अशोक के वृक्ष का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

(iii) कालिदास के साहित्य में अशोक के फूल का कैसा वर्णन मिलता है?
उत्तर कालिदास के साहित्य में अशोक का वर्णन इतना मोहक तथा आकर्षक मिलता है, जितना मोहक और आकर्षक दृश्य किसी नई दुल्हन के पहले गृह-प्रवेश का होता है। नई दुल्हन के घर में गरिमापूर्ण व पवित्र प्रथम आगमन की तरह ही कालिदास ने अशोक के वृक्ष का भारतीय साहित्य में प्रवेश कराया है।

(iv) निम्न शब्दों का अर्थ लिखिए।
उत्तर निर्गम – बाहर निकलना, गरिमा – गौरव, सुकुमारता – कोमलता।

(v) गृह-प्रवेश’ में कौन-सा समास है?
उत्तर गृह प्रवेश – गृह में प्रवेश। अतः यहाँ अधिकरण तत्पुरुष समास है।

  • अशोक को जो सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था। सुन्दरियों क आसिंजनकारी नूपुरवाले चरणों के मृदु आघात से वह फूलता था,. . कोमल कपोलों पर कर्णावतंस के रूप में झूलता था और चंचल नील अलकों की अचंचल शोभा को सौ गुना बढ़ा देता था। वह महादेव के मन में क्षोभ पैदा करता था, मर्यादा पुरुषोत्तम के चित्त में सीता का भ्रम पैदा करता था और मनोजन्मा देवता के एक इशारे पर कन्धों पर से ही फूट उठता था।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) संस्कृत के किस कवि ने अशोक को सम्मानित किया?
उत्तर संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अशोक को जो सम्मान दिया, वह अपूर्व था। उससे पहले किसी भी कवि ने अशोक का वर्णन नहीं किया।

(ii) किस फूल की सुन्दरता के कारण सुन्दरियाँ उन्हें अपने कानों का आभूषण बनाती हैं?
उत्तर अशोक के फूलों की सुन्दरता के कारण सुन्दरियाँ उन्हें अपने कानों का आभूषण बनाती हैं। यह कर्णफूल जब उनके गलों पर झूलता है तो वे और अधिक सुन्दर लगने लगती हैं।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का उद्देश्य क्या है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अशोक के फूल का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। यहाँ लेखक कहना चाहता है कि साहित्यकारों में मुख्य रूप से संस्कृत के महान कवि कालिदास ने अशोक के फूल का जो मादकतापूर्ण वर्णन किया है, ऐसा किसी अन्य ने नहीं किया है।

(iv) अशोक पर फूल आने के सम्बन्ध में लेखक का क्या विचार हैं?
उत्तर लेखक का विचार है कि अशोक पर तभी पुष्प आते हैं जब कोई अत्यन्त सुन्दर युवती अपने कोमल और संगीतमय नूपुरवाले चरणों से उस पर प्रहार करती है।

(v) निम्न शब्दों का अर्थ लिखिए – आसिंजनकारी तथा कर्णावतंस।
उत्तर आसिंजनकारी – अनुरागोत्पादक कर्णावतंस – कर्णफूल।

.रवीन्द्रनाथ ने इस भारतवर्ष को ‘महामानवसमुद्र’ कहा है। विचित्र देश है वह! असुर आए, आर्य आए, शक आए, हूण आए, नाग आए, यक्ष आए, गन्धर्व आए न जाने कितनी मानव-जातियाँ यहाँ आईं और आज के भारतवर्ष को बनाने में अपना हाथ लगा गईं। जिसे हम हिन्दू रीति-नीति कहते हैं, वे अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अद्भुत मिश्रण है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) रवीन्द्रनाथ ने ‘महामानव समुद्र’ की संज्ञा किसे दी है और क्यों?
उत्तर रवीन्द्रनाथ ने भारत की विशालता एवं विपुल जनसंख्या को ध्यान में रखकर इसे ‘महामानव समुद्र’ की संज्ञा दी है। जिस प्रकार समुद्र विशाल एवं विस्तृत होता है उसी प्रकार भारत देश भी लोगों की संख्या की दृष्टि से अत्यन्त विशाल एवं व्यापक

(ii) किन जातियों का प्रभाव भारतीय संस्कृति पर पड़ा है?
उत्तर असुर, शक, हूण, नाग, आर्य, गन्धर्व आदि प्रमुख ऐसी जातियाँ हैं जिनका प्रभाव भारतीय संस्कृति पर पड़ा है और भारतीय संस्कृति के विकास एवं समृद्धि में इनका उल्लेखनीय योगदान है।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश का मूल भाव क्या है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में भारत और उसकी परम्पराओं, रीति-रिवाजों के निर्माण के विषय में लेखक ने बताया है। हिन्दू रीति-रिवाजों और नीतियों को यहाँ विचित्र माना है, क्योंकि यह संसार की विविध संस्कृतियों का सम्मिश्रण है।

(iv) लेखक ने किस संस्क्रति को प्रसिद्ध माना है? .
उत्तर लेखक ने भारतीय संस्कृति को विश्व में प्रसिद्ध माना है, क्योंकि आज समूचे विश्व में हिन्दू रीति-रिवाज के नाम से जो भारतीय संस्कृति प्रसिद्ध है वह वास्तव में आर्यों एवं यहाँ आने वाली अनेक दूसरी जातियों का मिला-जुला रूप है।

(v) लेखक ने किस बोली का प्रयोग प्रस्तुत गद्यांश में किया है?
उत्तर लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में विचारात्मक एवं विवेचनात्मक बोली का प्रयोग किया है। कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में किस प्रसंग की चर्चा की गई है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक आचार्य द्विवेदी जी ने रचनाकारों अर्थात् साहित्यकारों द्वारा अशोक के फूल को भूल जाने की आलोचना की है।

(ii): लेखक ने गद्यांश में किस प्रकार के लोगों को स्वार्थी कहा है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक आचार्य द्विवेदी ने रचनाकारों अर्थात्
साहित्यकारों द्वारा ‘अशोक के फूल’ के भूल जाने की आलोचना की है कि यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह केवल उन्हीं बातों को याद रखता है जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है।

(iii) ‘सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।’ से लेखक का क्या
तात्पर्य है?
उत्तर लेखक कहना चाहता है कि यह संसार स्वार्थी व्यक्तियों से भरा पड़ा है। यहाँ हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ को साधने में लगा हुआ है। उसे अपने ही स्वार्थ को सिद्ध करने से फुरसत नहीं है, तो वह अशोक के फूल की क्या परवाह करेगा, जो शायद उसके लिए किसी काम का नहीं है।

(iv) ‘फूल’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर फूल-पुष्प, कुसुम, प्रसून आदि।

(v) स्वार्थ शब्द का विलोम लिखिए।
चावर स्वार्थ शब्द का विलोम निःस्वार्थ होगा।

अशोक का वृक्ष जितना भी मनोहर हो, जितना भी रहस्यमय हो जितना भी अलंकारमय हो, परन्तु है वह उस विशाल सामन्त-सभ्यता की परिष्कृत रुचि का ही प्रतीक, जो साधारण प्रजा के परिश्रमों पर पली थी, उसके रक्त के संसार कणों को खाकर बड़ी हुई थी और लाखों-करोड़ों की उपेक्षा से जो समृद्ध हुई थी। वे सामन्त उखड़ गए, समाज ढह गए और दिनोत्सव की धूमधाम भी मिट गई। सन्तान-कामिनियों को गन्धर्वो से अधिक शक्तिशाली देवताओं का वरदान मिलने लगा-पीरों ने, भूत-भैरवों ने, काली-दुर्गा ने यक्षों की इज्जत घटा दी। दुनिया अपने रास्ते चली गई, अशोक पीछे छूट गया।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में किसकी प्रशंसा की है?

उत्तर लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में ‘अशोक के फूल’ के गुणों की प्रशंसा की है कि वह मनोहर, रहस्यमय एवं अलंकारमय के साथ-साथ विशाल, सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक है।

(ii) प्रस्तुत गद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में अशोक को सामन्ती के प्रतीक रूप में स्थापित किया गया है। सामन्तों ने जन-साधारण का शोषण किया था, इसलिए कालान्तर में जन-साधारण ने सामन्तों को पददलित कर दिया और उसी के साथ अशोक को भी पददलित कर दिया। .

(iii) लेखक ने किसके अधिकारों के हरण की बात की है?
उत्तर लेखक ने जन-साधारण के अधिकारों के हरण की बात की है। लेखक कहता है कि सामन्ती व्यवस्था ने जन-साधारण के खून-पसीने की कमाई से ही अपनी तिजोरियाँ भरी हैं। ये आम जनता का ही खून चूसकर महाबली बने है।

(iv) अशोक के फूल की प्रतिष्ठा कम होने का क्या कारण है?
उत्तर अशोक के फूल की प्रतिष्ठा कम होने का क्या कारण है? अशोक के फूल की जो आज प्रतिष्ठा में कमी आई है, उसका महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि वह उस विशाल सामन्त-सभ्यता की रुचि का प्रतीक रहा है, जिसमें जन-साधारण के रक्त को चूस-चूसकर अपनी तिजौरियाँ भरी गई, लेकिन समय के साथ-साथ वह सामन्ती व्यवस्था मिट गई और उसी के साथ

अशोक के फूल की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो गई।

(v) ‘दिनोत्सव’ का सन्धि-विच्छेद करते हुए भेद बताइए।
वित्त दिन + उत्सव = दिनोत्सव। यहाँ गुण सन्धि है।

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