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Class 12th हिन्दी पद्य.jpg
जगन्नाथदास रत्नाकर – परिचय – उद्धव-प्रसंग – गंगावतरण
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य-जगन्नाथदास रत्नाकर – उद्धव-प्रसंग // गंगावतरण
Chapter 2
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com
संक्षिप्त परिचय – जगन्नाथदास रत्नाकर
नामजगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
जन्म1866 ई.
जन्म-स्थान काशी
पितापुरुषोत्तमदास
शिक्षाबी.ए.
रचनाएँहिंडोला, समालोचनादर्श, गंगालहरी, गंगावतरण
तथा उद्धव-शतक आदि।
सम्पादनसाहित्य सुधानिधि व सरस्वती।
भाषा-शैली ब्रजभाषा व कहीं-कहीं बनारसी कापुट
तथा चित्रात्मक, आलंकारिकएवं चमत्कृत
शैली का प्रयोग है।
साहित्य में स्थान ये ब्रजभाषा काव्य की महान विभूति
मृत्यु1932 ई.

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में 1866 ई. में हुआ था। ‘रत्नाकर’ जी के पिता श्री पुरुषोत्तमदास भारतेन्दु जी के समकालीन, फ़ारसी भाषा के विद्वान् और हिन्दी काव्य के मर्मज्ञ थे। 1891 ई. में वाराणसी के क्वीन्स कॉलेज से बी.ए. की डिग्री प्राप्त करके 1902 ई. में अयोध्या-नरेश के निजी सचिव नियक्त हुए और 1928 ई. तक इसी पद पर रहे। राजदरबार से सम्बद्ध होने के कारण इनका रहन-सहन सामन्ती था, लेकिन इनमें
प्राचीन धर्म, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी आस्था थी। इन्हें प्राचीन भाषाओं का अच्छा ज्ञान था तथा ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं में गति भी थी। इन्होंने ‘साहित्य-सुधानिधि’ और ‘सरस्वती’ के सम्पादन, ‘रसिक मण्डल’ के संचालन तथा ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना एवं उसके विकास में योगदान दिया। 1932 ई. में इनका देहावसान हरिद्वार में हुआ।

कृतियाँ

गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में साहित्य सृजन करने वाले रत्नाकर जी मूलत: कवि थे। इनकी प्रमुख कृतियों में हिंडोला, समालोचनादर्श, हरिश्चन्द्र, गंगालहरी, शृंगारलहरी, विष्णुलहरी, रत्नाष्टक, गंगावतरण तथा उद्धव-शतक उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने सुधाकर, कविकुलकण्ठाभरण, दीप-प्रकाश, सुन्दर-शृंगार, हम्मीर हठ, प्रकीर्ण गद्यावली, रस विनोद, हिम तरंगिणी, बिहारी रत्नाकर आदि ग्रन्थों का सम्पादन भी किया।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. भाव एवं रस रत्नाकर जी ने अपने काव्य में मानव हृदय में समय-समय पर उठने वाले विविध भावों का बहुत ही सूक्ष्मता से
    निरूपण किया है। इनका काव्य सौष्ठव एवं काव्य संगठन नूतन तथा मौलिक है। इन्होंने मानव हृदय के कोने-कोने में झाँककर हृदय को गदगद करने वाले चित्र प्रस्तुत किए हैं। इनके काव्य में लगभग सभी रसों को समुचित स्थान प्राप्त है, किन्तु संयोग श्रृंगार की अपेक्षा विप्रलम्भ (वियोग) शृंगार में अधिक सजीवता व मार्मिकता है तथा वीर, रौद्र व भयानक रसों का भी सुन्दर वर्णन है।
  2. भक्ति भावना श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त होने के कारण इनके काव्य में भक्ति-भाव का सुन्दर समावेश है।
  3. प्रकृति चित्रण इन्होंने अपने काव्य में स्वतन्त्र रूप से तथा उद्दीपन के रूप में प्रकृति का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है।

कला पक्ष

  1. भाषा रत्नाकर जी भाषा के मर्मज्ञ तथा शब्दों के आचार्य थे। सामान्यतया इन्होंने काव्य में प्रौढ़ साहित्यिक ब्रजभाषा को ही अपनाया, लेकिन जहाँ-तहाँ बनारसी बोली का भी समावेश है। भाषा व्याकरण-सम्मत, मधुर एवं प्रवाहयुक्त है। वाक्य-विन्यास सुसंगठित एवं प्रवाहपूर्ण है। इन्होंने कहावतों एवं मुहावरों का भी
    कुशल प्रयोग किया है। अपने भावों को प्रकट करने के लिए इन्होंने चित्रात्मक, आलंकारिक तथा चमत्कृत आदि शैलियों का प्रयोग किया है।
  2. छन्द योजना इन्होंने मुख्यत: रोला, छप्पय, दोहा, कवित्त एवं सवैया को अपनाया।
  3. अलंकार योजना अलंकारों का समावेश अत्यन्त स्वाभाविक तरीके से हुआ है, कहीं भी वह बोझिल प्रतीत नहीं होते हैं। इन्होंने मुख्यत: रूपक, उत्प्रेक्षा, उपमा, असंगति, स्मरण, प्रतीप, अनुप्रास, श्लेष, यमक आदि का प्रयोग किया।

हिन्दी साहित्य में स्थान


रत्नाकर जी हिन्दी के उन जगमगाते रत्नों में से एक हैं, जिनकी आभा चिरकाल तक बनी रहेगी। अपने व्यक्तित्व तथा अपनी मान्यताओं को इन्होंने काव्य में सफल वाणी प्रदान की है। उसकी छाप इनकी साहित्यिक रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इनकी रचनाओं में प्राचीन और मध्ययुगीन समस्त भारतीय साहित्य का सौष्ठव बड़े स्वस्थ, समुज्ज्वल एवं मनोरम रूप में उपलब्ध होता है। रत्नाकर जी ब्रजभाषा काव्य की महान् विभूति हैं। आधुनिक काल में ब्रजभाषा में कविता करके इन्होंने अपने आप को ऐतिहासिक पुरुष सिद्ध कर दिया।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या

उद्धव-प्रसंग

  • 1 भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
    सुधि ब्रज-गावँनि मैं पावन जबै लगीं।
    कहै ‘रतनाकर’ गवालिनि की झौरि-झौरि
    दौरि-दौरि नन्द-पौरि आवन तबै लगीं।
    उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै
    पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं।
    हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
    हमकौं लिख्यौं है कहा कहन सबै लगीं।।

शब्दार्थ मनभावन-मन को अच्छे लगने वाले आवन-आने की, आगमन, सुधि-सूचना; पावन-पाना, प्राप्त करना; झौरि-झण्ड, समूहः पौरि-द्वार; उझकि-उचककर, पद-पंजनि चरण कमल: पेखि देखकर; पाती-पत्र छोहन विकलता, मिश्रित उत्कण्ठा।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्य पुस्तक में संकलित तथा जगन्नाथदास ‘रत्नाकार’ द्वारा रचित ‘उद्धव-प्रसंग’ शीर्षक कविता से उधत है।

प्रसंग प्रस्तत पद में कहा गया है कि गोपियों को जब यह ज्ञात हुआ कि उद्धव उनके प्रिय श्रीकृष्ण का कोई सन्देश लेकर आए हैं, तो वे अपने प्रियतम का सन्देश जानने के लिए अत्यन्त व्यग्र हो गईं।।

व्याख्या जब मनभावन श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए दूत उद्धव के आगमन की । सचना गोपियों को मिली, तो वे समूह में दौड़-दौड़कर अपने प्रियतम के दत से मिलने के लिए नन्द के द्वार पर आने लगीं। अपने कमलरूपी चरणों के पंजों पर । उचक-उचककर वे श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए पत्र को देखने लगीं। सभी गोपियों का हृदय क्षोभ से (उत्कण्ठा मिश्रित व्याकुलता से) भर उठा। सभी गोपियाँ करने लगीं कि श्रीकष्ण ने उनके लिए क्या लिखा है? हमारे लिए कृष्ण ने क्या सन्देश भेजा है? इस प्रकार सभी गोपियाँ अपने अपने नाम के सन्देश को सुनने को व्याकल। होने लगीं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) भाव गोपियों की व्याकुलता के भाव उनकी स्वाभाविक मानसिक प्रवृत्ति का सूचक है और विशेषकर, तब जब सन्देश भेजने वाला प्रियतम हो। ।
(ii) गोपियों की उत्सुकता के भाव का स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
(iii) रस विप्रलम्भ शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार अनुप्रास, रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश, वीप्सा एवं पदमैत्री
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 2 चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम-सुन्दर कौ
    जोग के प्रयोग में हियौ तौ बिलस्यो रहे।
    कहै ‘रतनाकर’ सु-अन्तर-मुखी है ध्यान ।
    मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै।।
    ऐसे करौं लीन आतमा को परमातमा में
    जामै जड़-चेतन-बिलास बिकस्यौ रहै।
    मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि
    सो तौ सब अन्तर-निरन्तर बस्यौ रहै।।

शब्दार्थ स्वबस अपने बस में, अपने अधिकार में; जोग के प्रयोग-योग- युक्तियाँ, योग-साधना, योगाभ्यास; बिलस्यौ-आनन्द के साथ लीन; । सु-वह; अन्तरमुखी भीतर लीन रहने वाला; हिय-कंज-हृदयरूपी कमल, जिसमें ब्रह्मस्वरूप ज्ञान-ज्योति जलती है; जगी-जाग्रत, जलती हुई धस्यौ-धंसना, लीन होना; जामै-जिसमें बिकस्यौ-विकसित होना, प्रकट होना; जोहत-देखते हो; छोहि क्षुब्ध या व्यथित होकर; अन्तर-हृदय, मा अन्तरात्मा; बस्यौ स्थित

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में उद्धव, गोपियों को ज्ञान मार्ग का अनुसरण करने का सन्देश दे रहे हैं।

व्याख्या उद्धव गोपियों से कह रहे हैं कि यदि तुम श्याम सुन्दर अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ संयोग (मिलाप) को अपने अधिकार में करना चाहती हो, तो अपने हृदय को योग साधना में आनन्द के साथ लीन रखें। कवि कह रहे हैं कि उद्धव गोपियों को कृष्ण का ध्यान करने के लिए हृदय में स्थित आत्मा की ओर उन्मुख होने को कहते हैं। मनुष्य के सुन्दर हृदयरूपी कमल में ब्रह्म की ज्योति जलती रहती है, उसी ब्रह्म की ज्योति के ध्यान में गोपियों को लीन रहना चाहिए। उद्धव का यह कहना है कि कृष्ण सच्चे अर्थ में ब्रह्म के स्वरूप हैं एवं गोपियाँ यदि उन्हें पाना चाहती हैं, तो उन्हें अपनी आत्मा को परमात्मा अर्थात् ब्रह्म में इस प्रकार लीन कर देना चाहिए, जिससे उनके हृदय में जड़ और चेतन के प्रति आनन्द प्रकट होता रहे। ब्रह्म का साक्षात्कार करने वाले योगी को, जैसे जड़ और चेतन में आनन्द की अनुभूति होती रहती है, वैसे ही गोपियों को भी अपनी आत्मा में कृष्ण की उपस्थिति की अनुभूति होने लगेगी। मोह वश जिसके वियोग का अनुभव करके गोपियाँ क्षुब्ध (दुःखी) होती हैं तथा प्रिय कृष्ण को अपने से पृथक् समझती हैं, वह तो गोपियों के ही नहीं, अपितु सभी के हृदय (आत्मा) में सदैव विद्यमान रहते हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
योग के उपाय एवं अंग जिनसे योग-सिद्धि होती है, का वर्णन किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार अनुप्रास, यमक एवं पदमैत्री गण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान
    कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी है।
    कहै ‘रतनाकर’ रिसानी, बररानी कोऊ
    कोऊ बिलखानी, बिकलानी, बिथकानी है।।
    कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रहीं
    कोऊ घूमि-घूमि परी भूमि मुरझानी हैं।
    कोऊ स्याम-स्याम कै बहकि बिललानी कोऊ
    कोमल करेजी थामि सहमि सुखानी हैं।।

शब्दार्थ अकह-न कहने योग्य; थहरानी-काँप गई, थानहिं-स्थान पर ही, थिरानी-स्थिर हो गई, जड़वत् हो गई: रिसानी-क्रोधित हुई बररानी- बड़बड़ाई; बिलखानी-बिलखने लगी, विलाप करने लगी: बिकलानी-विकल हुई बिथकानी-थकित या शिथिल हुई; सेद-स्वेद, पसीना; सानी-नहा गई. बदकि-आये से बाहर होकर, आवेश में आकर; बिललानी-तड़पने लगी। थामि-पकड़कर; सहमि-भयभीत होकर; सुखानी-सूख गई।

सन्दर्भ पूर्ववत्।
प्रसंग प्रस्तत पद्यांश में उद्धव के न कहने योग्य कहानी को सुनकर गोपियों की। जो दुर्दशा हुई उसी का चित्रण किया गया है।

व्याख्या कवि कह रहे है कि उद्धव के द्वारा न कहने योग्य कहानी अर्थात योग्य सम्बन्धी असह्य एवं निष्ठर सन्देश अपने कानों से सनकर गोपियों। की दशा अत्यन्त दु:खमय हो गई। उनमें से कोई कृष्ण के वियोग मिलान पाने के भय से थर-थर काँपने लगी एवं कोई उद्धव के सन्देश सुनकर स्तब्ध होकर अपने स्थान पर स्थिर खड़ी हो गई। कवि रत्नाकर कह रहे हैं कि निष्ठर सन्देश को सुनकर कोई क्रोधित हो गई है, तो कोई शोक वश विलाप करने लगी एवं कोई विकल हो गई। उनमें से कोई शिथिल हो गई, कोई घबड़ाहट के चलते पसीने से भीग गई, तो कोई कृष्ण के वियोग में दुःख से रोने लगी और उनकी आँखों में पानी भर आया। किसी को इतना दुःख हुआ कि वह मर्छित होकर गिर गई। कोई श्याम-श्याम कहते हुए आवेश में तड़पने लगी एवं कोई अपने कोमल कलेजे को पकड़कर भय से सूख गई। कवि यह
कहना चाहते हैं कि कृष्ण के वियोग से द:खी गोपियाँ उनके योग सम्बन्धी असह्य सन्देश को सुनकर दु:ख के असीम सागर में डूब गईं एवं वे अपने दुःख को नियन्त्रित करने में बिलकुल असमर्थ हो गई हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) गोपियों के आन्तरिक एवं बाह्य दुर्दशा के भाव का सजीव चित्रण किया गया है।
(ii) रस विप्रलम्भ श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक अलंकार पुनरुक्तिप्रकाश एवं पदमैत्री
शब्द शक्ति लक्षणा छन्द मनहरण सवैया गुण प्रसाद

  • 4 कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत है पधारे आप
    धारे प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की।
    कहै ‘रतनाकर’ पै प्रीति-रीति जानत ना
    ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की।
    मान्यों हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
    तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की।
    जैहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि कौं
    बूंदता बिलैहे बूंद बिबस बिचारी की।

शब्दार्थ कैधौं-अथवा; पधारे-आए; धारे प्रन-प्रण धारण करके;
ब्रजबारी-ब्रजबालाओं; पै-पर, परन्तु; रीति-पद्धति; ठानत
अनीति-अन्याय करते हो; आनि-अन्य, विपरीत; भावति-अच्छी लगती; अन्यारी-एकत्व, अभेदता; बारिधिता-असीमता, विशालता; बँदता-लघु अस्तित्व, बूंद का छोटा रूप; बिबस-असक्त, बेचारी; बिलैहै -विलीन हो जाएगी।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में उद्धव आत्मा एवं परमात्मा की अभिन्नता को
प्रतिपादित करते हुए गोपियों को उपदेश दे रहे हैं।

व्याख्या गोपियाँ, उद्धव से प्रश्न पूछ रहीं हैं कि आप ब्रजबालाओं की
बुद्धि को बदलने का प्रण लेकर तथा कृष्ण का दूत बनकर आए हैं या ब्रह्म का दूत बनकर आए हैं? वे उद्धव से यह कह रहीं हैं कि कहने को तो वे कृष्ण का दूत बनकर आए हैं, किन्तु कृष्ण की चर्चा न करके वे ब्रह्म की चर्चा ही कर रहे हैं। रत्नाकर कवि कह रहे हैं कि उद्धव को प्रीति की रीति का ज्ञान नहीं है, इसलिए वे अनाड़ियों एवं बुद्धिहीनों जैसा व्यवहार करके गोपियों के साथ अन्याय कर रहे हैं, जो उन्हें उनके प्रेमी कृष्ण के स्थान पर ब्रह्म की बात बताते । हैं। गोपियाँ, उद्धव से कह रही हैं कि यदि उन्होंने उनके कहने के अनुसार, श्रीकृष्ण एवं ब्रह्म को एक मान भी लिया तो भी उन्हें एकत्व या अभेदता की इस भावना को मानना अच्छा नहीं लगता है। गोपियाँ, उद्धव से कह रही हैं कि ब्रह्म अथाह समुद्र की तरह है एवं वे जल । की बूंदों के समान है। समुद्र में जल की कुछ बूंदें मिले या नहीं मिले, इससे समुद्र । के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, किन्तु यदि बूंद समुद्र में मिल जाए तो उसका अस्तित्व अवश्य ही समाप्त हो जाता है। मोहवश, गोपियाँ यह कह रही हैं कि यदि वे ब्रह्म से मिलने के लिए योग साधना करती हैं, तो उनमें लीन होने से। उनका अस्तित्व अवश्य ही समाप्त हो जाएगा, किन्तु कृष्ण की आराधना करने से उनका अस्तित्व बना रहेगा। जैसे विवश बूंद समुद्र के जल में मिलकर उसमें लीन होकर अपने पृथक अस्तित्व को खो देती है. वैसे ही गोपियों के ब्रह्म में मिल जाने से उनका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जिससे वे कृष्ण को पाने से वंचित हो जाएँगी। कृष्ण के ध्यान में रहने से उनका अस्तित्व बने रहने की सम्भावना है। अत: गोपियाँ, उद्धव की बात मानकर ब्रह्म को पाने के लिए योग साधना करने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) गोपियों के द्वारा आत्मा एवं परमात्मा की अभेदता को अस्वीकार करने के । भाव अभिव्यक्त हुए हैं।
(ii) रस विप्रलम्भ श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा
शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार अनुप्रास, यमक, श्लेष, पदमैत्री एवं दृष्टान्त गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना

5.चिन्ता-मनि मंजुल पँवारि धूर-धारनि मैं
काँच-मन-मुकुर सुधारि रखिबौ कहौ।
कहै ‘रतनाकर’ बियोग-आगि सारन कौं
ऊधौ हाय हमकौं बयारि भखिबौ कहौ।।
रूप-रस-हीन जाहि निपट निरूपि चके
ताको रूप ध्याइबौ औ रस चखिबौ कहौ।
एते बड़े बिस्ब माहीं हेरै हूँ न पैयै जाहि,
ताहि त्रिकुटी मैं नैन मुंदि लखिबौ कहौ।

शब्दार्थ मंजुल-सुन्दर; पँवारि फेंकना; धूर-धारनि मैं धूल की धाराओं में, भस्म रमाने में काँच-मन-मुकुस्मनरूपी काँच का दर्पण; सुधारिसँभालकर; राखिको रखने के लिए; सारन बझाना: बयारि भखिबौ-वायु का भक्षण करना, प्राणायाम करना; निपट-सरासर, नितान्त; निरूपि-निरूपण; ध्याइको ध्यान करना; एते इतने हेदेखने पर, खोजने पर, पै-पाइए: मँदि-बन्द करके लखिौ देखने के लिए।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ योग-साधना की निरर्थकता को सिद्ध कर रही हैं। वे कृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त निराकार ब्रह्म की उपासना नहीं करना चाहती हैं।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि निराकार ब्रह्म की उपासना करना गोपियों को उपयुक्त नहीं लगता है। उनका मन कृष्ण के प्रेम में लीन है। इसलिए जब उद्धव उन्हें निराकार ब्रह्म की उपासना करने के लिए कहते हैं, तब वे उनसे कहती हैं कि आप हमें सुन्दर चिन्तामणि को धूल की धाराओं (भस्म रमाने) में फेंककर, मनरूपी काँच के दर्पण को सँभालकर रखने के लिए कह रहे हैं। यह हमारे लिए सम्भव। नहीं है। उनका कहना है कि कृष्ण की भक्ति समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली है, जिसे छोड़कर उद्धव उन्हें भस्म रमाने के लिए कह रहे हैं। रत्नाकर कवि कहते हैं कि वियोग की अग्नि से व्याकुल गोपियों को उद्धव वायु भक्षण (प्राणायाम) के द्वारा अपनी वियोग अग्नि को बुझाने के लिए कह रहे हैं।

वायु, अग्नि को भड़काती है, बुझाती नहीं। प्राणायाम करने से गोपियों के विरह की आग बुझेगी नहीं, अपितु और अधिक भड़केगी, गोपियों के इसी भाव को कवि ने यहाँ अभिव्यक्त किया है। गोपियाँ, उद्धव से कह रही हैं कि निराकार ब्रह्म नितान्त रूपहीन एवं रसहीन है, इसका निरूपण हो चुका है, फिर भी उद्धव उन्हें उनके रूप का ध्यान करने एवं रस का पान करने के लिए कह
इन बातों में गोपियों को साम्य नहीं दिखाई पड़ता है। वे कह रही हैं कि इतने बड़े संसार में जिन्हें खोजने पर भी पाया नहीं जा सकता है, उस ब्रह्म को उद्धव उन्हें त्रिकुटी चक्र में ध्यान के द्वारा देखने के लिए कह रहे हैं। गोपियों के कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण को वे अपनी आँखों से देख सकती हैं, जिससे वे उनके रूप एवं रस का पान करती हुई उनकी भक्ति करती हैं, किन्तु निराकार ब्रह्म जो रूपहीन एवं रसहीन हैं, उनका ध्यान लगा पाना या उनकी उपासना करना उनके लिए सम्भव नहीं है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) गोपियों के मन में यह भाव है कि कृष्ण-भक्ति उनके साकार रूप के दर्शन द्वारा आसान होती है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया
अलंकार श्लेष, रूपक, अनुप्रास तथा विरोधाभास
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 6 आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै
    ऊधौ ये बियोग के बचन बतरावौ न।
    कहै ‘रतनाकर’ दया करि दरस दीन्यौ
    दुख दरिबै कौं, तोपै अधिक बढ़ावौ ना।।
    टूक-टूक ढहै मन-मुकुर हमारौ हाय
    चूकि हूँ कठोर बैन-पाहन चलावौ ना।
    एक मनमोहन तौ बसिकै उजाऱ्या मोहिं
    हिय मैं अनेक मनमोहन बसावौ ना।।

शब्दार्थ सिखावन शिक्षा देने; तो-तो; बतराव-कहना; दीन्यौ-दिया;
दरिदै-दलना, नष्ट करना; चूकि हूँ-भूल से भी; बैन-पाहन-वचनरूपी
पत्थर; बसिकै बसकर; उजारया-उजाड़ना; मनमोहन श्रीकृष्णा

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में गोपियाँ योग की शिक्षा देने आए उद्धव के सामने
अपने मनोभावों को प्रकट कर रही हैं। ।

व्याख्या उद्धव मथुरा से कृष्ण के आदेश से गोपियों को योग की शिक्षा देने आए हैं। गोपियाँ उनसे कह रही हैं कि वे उन्हें योग की शिक्षा देने मथुरा से आए हैं यह ठीक है, किन्तु योग की बात करते हुए वे वियोग की बातें न करें। रत्नाकर कवि कहते हैं कि कृष्ण के वियोग से दु:खी गोपियों को भले ही उद्धव ने उनके दु:ख दूर करने के लिए उन्हें दर्शन दिए, पर कृष्ण के न आने का सन्देश देकर उन्होंने गोपियों के दु:ख को और भी अधिक बढ़ा दिया। गोपियाँ,
उद्धव से अनरोध कर रही हैं कि वियोग की बात करके हमारे दुःख को और अधिक न बढ़ाएँ, क्योंकि कृष्ण के वियोग की बात सुनकर उनके हृदय में स्थित । मनरूपी दर्पण के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। अतः भूल कर भी उन्हें कठोर वचनरूपी पत्थर नहीं चलाइए। वे कह रही हैं कि एक कृष्ण ने हमारे मन में वास करके अपने वियोग से उसे उजाड़ा।

उस उजड़े हुए हृदय के दर्पण को यदि उद्धव के कठोर वचन रूपी पत्थर ने टुकड़े-टुकड़े कर दिए तो श्रीकृष्ण के एक ही प्रतिबिम्ब के कई टुकड़े हो जाएंगे, जिससे हमारे हृदय में अनेक कष्ण के वास होने से एवं उनके पुनः उजड़ने से हमारा कष्ट कितना बढ़ जाएगा इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन है। गोपियों के ऐसा
कहने का आशय यह है कि उद्धव अपने कठोर वचनरूपी पत्थरों से उनके हृदय के टूटे दर्पण के टुकड़ों में अनेक मनमोहन को बसाकर फिर उसे उजाड़ कर उन्हें और अधिक दुःखी न करें।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद में कवि ने स्त्रियों के मनोविज्ञान का चित्रण किया है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, वक्रोक्ति तथा रूपक गुण माधुर्य
शब्द शक्ति लक्षणा और व्यंजना

  • 7 ऊधौ यहै सूधौ सौ सँदेस कहि दीजो एक
    जानति अनेक न बिबेक ब्रज-बारी हैं।
    कहै ‘रतनाकर’ असीम रावरी तौ क्षमा
    छमता कहाँ लौं अपराध की हमारी हैं।।
    दीजै और ताजन सबै जो मन भावै पर
    कीजैन दरस-रस बंचित बिचारी हैं।
    भली हैं बुरी हैं औ सलज्ज निरलज्ज हूँ हैं
    जो कहौ सो हैं पै परिचारिका तिहारी हैं।।

शब्दार्थ सूधौ सौ-सीधा-सा; असीम-सीमाहीन; रावरी-आपकी; ताजन- कोड़ा, चाबुक, यहाँ कष्ट या ताड़ना से आशय है; सलज्ज-लज्जाशीलः । निरलज्ज-लज्जाहीन; परिचारिका-दासी, सेविका; तिहारी-तुम्हारी।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गोपियों के द्वारा किए गए कृष्ण से अनुरोध एवं | उनके स्वभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या गोपियाँ, उद्धव से कह रही हैं कि वे कृष्ण से हमारा यह सीधा-सा । सन्देश कह दें कि ब्रजबालाएँ छल-कपट की अनेक बातें नहीं जानती हैं। उनके कहने । का आशय यह है कि वे निर्दोष एवं निरापराध हैं। रत्नाकर कवि कहते हैं कि गोपियाँ, श्रीकृष्ण की क्षमा करने की सीमाहीन शक्ति को जानती हैं इसलिए कहती हैं कि हममें अपराध करने की इतनी शक्ति नहीं है जितनी श्रीकृष्ण में क्षमा करने की शक्ति है। वे कहती हैं कि हमने कोई अपराध नहीं किया है, फिर भी श्रीकृष्ण को हमें कष्ट या दण्ड देना है, तो उन्हें जो अच्छा लगे वे कष्ट दे सकते हैं, किन्तु वे अपने मन में यह अच्छी तरह विचार कर लें कि हम सबको अपना दर्शन अवश्य दें एवं हमें अपने दर्शन देने से वंचित न करें। गोपियाँ, श्रीकृष्ण से अपनी सफाई देती हुई कह रही हैं कि वे उन्हें लज्जाशील या लज्जाहीन एवं भला या बुरा जैसा भी वे समझें उन्हें सब स्वीकार है, किन्त यह सत्य है कि वे जैसी भी हैं, उनकी ही सेविकाएँ हैं। गोपियाँ, श्रीकृष्ण के दर्शन पाने के लिए। व्याकल हैं। उनका कहना है कि उनके अपराध भले ही अधिक हो, किन्त श्रीकष्ण की जमा करने की शक्ति के सामने उनके अपराध नगण्य है, इसलिए अपने समस्त अपराधों के उपरान्त वे उनकी कृपा पाना चाहती हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) गोपियों के प्रेम एवं समर्पण के भाव की अभिव्यक्ति हुई है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार ‘दरस-रस’ में यमक, पदमैत्री। गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना

  • 8 धाई जित तित तैं बिदाई-हेत ऊधव की
    गोपी भरी आरति सँभारति न साँसुरी।
    कहै ‘रतनाकर’ मयूर-पच्छ कोऊ लिए
    कोऊ गुंज-अंजली उमाहै प्रेम-आँसुरी।।
    भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
    कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।
    पीत पट नन्द जसुमति नवनीत नयौ
    कीरति-कुमारी सुरबारी दई बाँसुरी।।

शब्दार्थ जित तित-इधर-उधर: आरति-दु:ख, गुंज-अंजली-घुघची
की माला; उमाहै-उमड़ाती हुई, रुचिर-स्वादिष्ट, सजाव-मलाईदार:
मही-मट्ठा, दलकति-फटती हुई, पाँसरी-पसलियों को पीत पट-
पीताम्बर, नवनीत नयौ-ताजा मक्खन, कीरति-कुमारी-राधा,
सुरबारी-सुरीले।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने उद्धव के मथुरा लौटने के समय, राधा,
यशोदा, नन्द और गोपियों के द्वारा, उन्हें कृष्ण के लिए विभिन्न उपहार दिए जाने के प्रसंग का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि जब उद्धव ब्रज से जाने लगे एवं उनकी विदाई का समय आया तो गोपियाँ अत्यन्त व्याकल हो गईं। उन्हें विदाई देन। के लिए वे इधन-उधर दौड़ने लगीं। उस समय वे इतना दुःखी थीं कि दुःख। के चलते वे ठीक से साँस भी नहीं ले पा रही थीं।

रत्नाकर कवि कहते हैं कि कृष्ण को उपहार के रूप में गोपियाँ अपनी शक्ति के अनुसार कुछ-न-कुछ देना चाहती थीं, जो उनके प्रियतम को प्रिय है। उनमें से कोई मोर के पंख लेकर आई, तो कोई अपने आँखों में आँस उमड़ाते हुए अपने हाथों में घुघची की माला लिए हुए आई। कृष्ण के प्रेम भाव से भरी हुई कोई गोपी स्वादिष्ट मलाईयुक्त दही लेकर आई तो कोई अपनी फटती हुई पसलियों को दबाते हुए मट्ठा लेकर आई। इन विभिन्न प्रकार के उपहारों को वे उद्धव से अपने प्रेम को प्रकट करने के लिए श्रीकृष्ण को भेज रहीं थीं। नन्द बाबा ने उनके लिए पीताम्बर, यशोदा ने ताजा मक्खन एवं राधा ने सुरीले स्वर वाली बाँसुरी लाकर दी। ब्रजवासियों को कृष्ण से अथाह प्रेम था। अत: वे उनके दर्शन के लिए एवं उनके साथ रहने के लिए व्याकुल थे। अपने से दूर रहने वाले अपने । प्रियतम के लिए वे सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहते थे। सांसारिक उपहार की वस्तुएँ तो उनके प्रेम के प्रतीक स्वरूप थे।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i)प्रस्तुत पद में कवि ने कृष्ण के प्रेम में विह्वल एवं उद्धव की विदाई से। दुःखी ब्रजवासियों की दशा का चित्रण किया है।
(ii) रस वियोग श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया
अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 9 प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
    थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है।
    कहै ‘रतनाकर’ यौँ आवत चकात ऊधौ
    मानो सुधियात कोऊ भावना भुलाई है।।
    धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
    सारत बँहोलिनि जो आँस-अधिकाई है।
    एक कर राजे नवनीत जसुदा को दियौ
    एक कर बंसी बर राधिका-पठाई है।।

शब्दार्थ प्रेम-मद-प्रेम-रस का नशा: छाके-चर, मस्त: थाके थके हुए;
सिथिलता आलस्य, अवसाद, चकात-चकित हुए; सुधियात-स्मृत करते हुए। सारत-पोंछते हैं: बॅहोलिनि-करते ही बाँहें: राजै-शोभितः नवनीत-मक्खन।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में ब्रजवासियों के प्रेमाधिक्य के कारण उद्धव की । भाव-विह्वल स्थिति का वर्णन है।

व्याख्या जब उद्धव ब्रज से मथुरा के लिए चलने लगे, तो ब्रजवासियों (गोपियाँ, राधा, नन्द, यशोदा आदि) ने उन्हें अत्यन्त भावपूर्ण विदाई दी। ब्रजवासियों के प्रेम-रस का आकण्ठ पान किए हुए उद्धव जब चलने लगे, तो उनके पैर कहीं-के-कहीं पड़ने लगे। उनके शरीर के सारे अंग थके थके से लगने लगे और उनकी आँखों में शिथिलता (कमजोरी) दिखाई देने लगी (ऐसा लग रहा था मानो उन्हें बलपूर्वक जाना पड़ रहा हो)। उद्धव इस प्रकार चल रहे थे, मानो भूली हुई कोई बात याद कर रहे हों। उनके एक हाथ में यशोदा जी का दिया हुआ मक्खन था, तो दूसरे हाथ में राधा द्वारा दी गई बाँसरी। उन वस्तुओं के प्रति अत्यधिक सम्मान भाव के कारण वे उन उपहारों को जमीन पर नहीं रख रहे थे। साथ-ही-साथ, वे प्रेम की अधिकता के कारण अपने नेत्रों से प्रवाहित हो रहे आँसुओं को अपने कुर्ते की बाँहों से पोंछते जा। रहे थे।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) ब्रजवासियों की प्रेमपूर्ण विदाई से भाव-विह्वल उद्धव की मनःस्थिति का मार्मिक वर्णन हुआ है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार ब्रह्म ज्ञानी उद्धव ब्रजगोपियों के अपार प्रेम से प्रभावित होकर स्वयं श्रीकृष्ण के प्रेम में सराबोर होकर उनके भक्त बन गए। अंगों की शिथिलता, पैरों का डगमगाना, आँखों से आँसू बहना आदि लक्षणों के द्वारा उद्धव का सजीव चित्र खींचा गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार रूपक, अनुप्रास एवं उत्प्रेक्षा गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 10 ब्रज-रज-रंजित सरीर सुभ ऊधव को
    धाइ बलबीर है अधीर लपटाए लेत।
    कहै ‘रतनाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
    थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।
    कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
    छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
    परन न देत एक बूंद पुहुमी की कोंछि
    पोछि-पोंछि पट निज नैननि लगाए लेत।।

शब्दार्थ ब्रज-रज-रंजित-ब्रज की धल में सने शुभ-पवित्र; धाइ-दौड़कर; थरकति–काँपती: थामि-पकड़कर थहरि-ठहराकर थिराए लेत-स्थिर किए लेते हैं; कीरति-कुमारी-राधा; सद्य-नवीन; दरस-रस, दर्शनरूपी रस; छलकति-उमड़ना; चाहि-देखकर; पलकनि-पलकों को पुलकाए लेत- प्रफुल्लित कर लेते हैं। पुहुमी-पृथ्वी; कोछि-कुक्षि, गोद, पट-वस्त्र, दुपट्टा।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने गोपियों की भक्ति-भावना से विह्वल उद्धव जी मथुरा लौट आए हैं। उनकी दशा को देखकर कृष्ण भी भाव विह्वल हो जाते हैं, इसी का वर्णन यहाँ किया गया है।

व्याख्या ब्रज से लौटकर आए हुए उद्धव का शरीर धूल से भरा हुआ है। ब्रज की पवित्र धूलि से सने हुए उनके शरीर को देखकर भाव-विह्वल श्रीकृष्ण दौड़कर अत्यन्त अधीरता से उन्हें अपने बाँहों में लिपटा लेते हैं। उद्धव का धूल से भरा हुआ शरीर उन्हें ब्रज की याद दिला देता है। उद्धव की गोपियों के प्रेम के कारण भाव-विह्वलता को देखकर कृष्ण के मन में गोपियों एवं ब्रजवासियों की मधुर-स्मृति जागृत हो जाती है। कवि रत्नाकर कहते हैं कि उद्धव को प्रेम-मद में मत्त देखकर श्रीकृष्ण उनकी काँपती हुई भुजा को थाम लेते हैं एवं अपने मन में गोपियों के उस पवित्र प्रेम को याद करके वे काँपते हुए हाथों से उद्धव को स्थिर करने की कोशिश करते हैं। उद्धव के द्वारा हाल ही में श्रीराधा जी के किए गए नवीन-दर्शनरूपी रस का पान करने से आँसुओं से उमड़ते हुए उनकी आँखों को देखकर श्रीकृष्ण की आँखें भी गीली हो गईं। कहने का आशय यह है कि उद्धव की भरी हुई आँखों को देखकर कृष्ण की आँखों की पलकें भी गीली हो गईं। श्रीराधा के दर्शन से पवित्र हो गई उद्धव की आँखों से निकले हुए आँसुओं को श्रीकृष्ण, उनके पृथ्वी पर नीचे गिरने से पहले ही एक-एक बूंद को अपने दुपट्टे से पौंछकर अपनी आँखों से लगा रहे हैं। उन आँसूओं में कृष्ण को राधा का ही स्वरूप दिखलाई पड़ता है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) उद्धव को भाव-विह्वलता के साथ श्रीकृष्ण के भाव मिलकर एक हो गए हैं।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली मुक्तक छन्द मनहरण सवैया अलंकार पुनरुक्तिप्रकाश के साथ-साथ अनुप्रास गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

  • 11 छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कैं तीर
    गौन रौन-रेती सों कदापि करते नहीं।
    कहै ‘रतनाकर’ बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
    स्रौन रसना मैं रस और भरते नहीं।।
    गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
    लेखि प्रलयागत हूँ नैंकु डरते नहीं।
    होतौ चित चाब जौ न रावरे चितावन को
    तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं।।

शब्दार्थ छावते-बनाते; कुटीर-कुटिया, झोंपड़ी, रौन-रमणीक, सुन्दर; तीर-तट, किनारा; गौन-प्रस्थान, गमन; बिहाइ-विस्मृत करके, छोड़कर; गढ गम्भीर सौन_श्रवण कान रसना-जीभ लेखि-देखकर प्रलयागम- प्रलय का आगमन चाव-गहन इच्छा, तीव्र अभिलाषा: रावरे-आपके चितावन-चेतना, सजग करना।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने उद्धव के ऊपर गोपियों एवं ब्रजवासियों के प्रभाव तथा उनके प्रति असीम प्रेम का वर्णन किया है।

व्याख्या ब्रज से लौटकर आए हुए उद्धव गोपियों एवं ब्रजवासियों के प्रेम से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे (उद्धव) यमुना नदी के सुन्दर किनारे पर ही कहीं अपनी कुटिया बना लेते एवं उस सुन्दर रेतीले किनारे को छोड़कर कहीं और नहीं जाते। गोपियों के प्रेम में डूबे हुए उद्धव अपने कानों से गोपियों की रसपूर्ण कथा को छोड़कर किसी अन्य रसपूर्ण कथा को नहीं सुनते और अपनी
जिह्वा से गोपियों की कथा को छोड़कर किसी अन्य की कथा नहीं सुनाते। । उद्धव श्रीकृष्ण से यह कह रहे हैं कि गोपियों की आँखों से निकलते हुए आँसुओं को देखकर अब वे प्रलय के आगमन से भी भयभीत ही होंगे। उनके कहने का आशय यह है कि गोपियों के अश्रु-प्रवाह प्रलयकालीन जल से भी भयावह प्रतीत होता था। उद्धव कहते हैं कि श्रीकृष्ण! यदि मेरे मन में आपको सजग करने की इच्छा नहीं होती तो मैं ब्रज से मथुरा की ओर पैर नहीं रखता
अर्थात् ब्रज में ही रह जाता, कभी मथुरा लौट कर नहीं आता।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि ने उद्धव के माध्यम से ब्रजभूमि के प्रति अपने अनुराग के भाव ।
अभिव्यक्त किए हैं।
(ii) रस करुण एवं शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा छन्द मनहरण सवैया अलंकार अनुप्रास, प्रतीप एवं लोकोक्ति गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा एवं लक्षणा
शैली मुक्तक

गंगावतरण

  1. निकसि कमण्डल तैं उमण्डि नभ-मण्डल खण्डति।
    धाई धार अपार बेग सौं बायु बिहण्डति।।
    भयौ घोर अति शब्द धमक सौं त्रिभुवन तरजे।
    महामेघ मिलि मनहु एक संगहिं सब गरजे।।
    निज दरेर सों पौन-पटल फारति फहरावति।।
    सुर-पुर के अति सघन घोर धन घसि घहरावति।।
    चली धार धुधकारि धरा-दिसि काटति कावा।
    सगर-सुतनि के पाप-ताप पर बोलति धावा।।

शब्दार्थ निकसि-निकलकर; बिहण्डति-खण्डित करती हुई, नष्ट करती
हुई; धमक भयंकर आवाज; तरजे-भयभीत हुए; महामेघ-प्रलयकालीन मेघ; दरेस्-धक्का; पौन पटल-पवनरूपी वस्त्र; घसि-घुसकर; घहरावति-घनघोर शब्द करती हुई; काटति कावा-चक्कर खाती हुई; धावा-आक्रमण।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित रत्नाकर द्वारा रचित ‘गंगावतरण’ शीर्षक से उद्धृत है।

प्रसंग प्रस्तत पद में कवि ने ब्रह्मा जी के कमण्डल से निकली गंगा का वर्णन। किया है।

व्याख्या कवि गंगा के पृथ्वी पर अवतरण को चित्रित करते हुए कहते हैं कि गंगा स्वर्ग में ब्रह्मा के कमण्डल से उल्लास एवं उद्वेग के साथ उमड़कर निकली एवं आकाशमार्ग को चीरती हुई वायुमण्डल को विखण्डित करती हुई अपार वेग

से धरती की ओर तेजधारा से दौड़ पड़ी। स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक तक आने के क्रम में गंगा के तीव्र वेग से अति भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ, जिसकी धमक से तीनों लोक काँप गए। गंगा पर पृथ्वी के अवतरण (उतरने) का वेग अत्यधिक प्रचण्ड था, उससे उत्पन्न शब्द को सुनकर ऐसा लग रहा था मानो प्रलयकाल के बादल एक साथ मिलकर गरज रहे हों। गंगा के तीव्र वेग से स्वर्ग से निकलने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो। उसकी धारा अपने धक्के से पवनरूपी परदे को फाड़ती हुई, घनघोर शब्द करती हई एवं स्वर्गलोक के घने बादलों को अपने सम्पर्क से घिसती हुई, पृथ्वी की ओर
चक्कर काटती हुई आगे बढ़ी। कवि कह रहे हैं कि तीव्र वेग की धारा से युक्त गंगा राजा सगर के पुत्रों के पाप तथा दुःख पर चढ़ाई-सी करती हुई, पृथ्वी पर अवतरित हुई।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) गंगा का अवतरण स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए हुआ था, इसी भाव को कवि ने प्रस्तुत पद में अभिव्यक्त किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रज भाषा शैली मुक्तक छन्द रोला अलंकार उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास एवं ध्वन्यर्थ व्यंजना गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 2 स्वाति-घटा घहराति मुक्ति-पानिप सौं पूरी।
    कैधों आवति झुकति सुध्र आभा रुचि रूरी।।
    मीन-मकर-जलव्यालनि की चल चिलक सुहाई।
    सो जनु चपला-चमचमति चंचल छबि छाई।।।

शब्दार्थ स्वाति-घटा स्वाति नक्षत्र की मेघ घटा; घहराति-घुमड़ती हुई; मक्ति-मोती; परी-पूर्ण भरी हुई पानिप-कान्ति; रूरी-सुन्दर;
जलव्यालनि-पानी के सीपों की; चिलका चमक; चपला-बिजली।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के क्रम में । उनकी स्वाभाविक दशा का चित्रण किया है।

व्याख्या आकाश से धरती पर उतरती हुई गंगा की श्वेत धारा (जो मुक्ति । देने की क्षमता से युक्त है) को देखकर ऐसा लग रहा था, मानो मोतियों की कान्ति से परिपूर्ण स्वाति नक्षत्र के मेघों का समूह आकाश में उमड़ रहा हो या सुन्दर श्वेत प्रकाशमान ज्योति पृथ्वी की ओर झुकती हुई चली आ रही हो। गंगा की पवित्र धारा में मछलियों, मगरमच्छों एवं जल सों की चमक ऐसे शोभा पा रही है मानो चंचल बिजली चमक रही हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
कवि ने गंगा के सौन्दर्य का वर्णन अलंकार युक्त भाषा में किया है।
(ii) गंगा के लिए ‘मुक्ति-पानिप’ विशेषण गंगा के मोक्ष प्रदायिनी शक्ति के भाव को अभिव्यक्त करता है।
(iii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रज भाषा छन्द रोला गुण प्रसाद अलंकार उत्प्रेक्षा, श्लेष, सन्देह एवं अनुप्रास शब्द शक्ति लक्षणा शैली मुक्तक

  • 3 रुचिर रजतमय कै बितान तान्यौ अति बिस्तर।
    झरति बूंद सो झिलमिलाति मोतिनि की झालर।।
    ताके नीचें राग-रंग के ढंग जमाये।
    सुर-बनितनि के बृन्द करत आनन्द-बधाये।।
    शब्दार्थ रुचिर-मनोहर, सुन्दर; रजतमय-चाँदी से परिपूर्ण;
    बितान-चँदोवा: बिस्तर-विस्तत. विशाल: राग-रंग-आमोद-प्रमोद,
    सर-बनितनि-देवताओं की स्त्रियाँ; बुन्द-समूह।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने आकाश से धरती की ओर उतरती गंगा का बहुत सुन्दर चित्रण किया है।

व्याख्या गंगा जब आकाश से पृथ्वी पर अवतरित हो रही थी, तब उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने सुन्दर रूपहला श्वेत रंग का विस्तृत चँदोवा (तम्बू) टाँग दिया हो। गंगा की धारा से जल बूँदें तम्बू में लटकी हुई मोतियों की झालर के समान शोभा पा रही थीं। मोतियों के रूप में गिरती हुई जल की बूँदें झिलमिलाती हुई अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रही थीं। कवि कहते हैं। कि इस दृश्य को देखकर यह प्रतीत हो रहा था कि उस तम्बू के नीचे देवताओं की स्त्रियों के समूह ने आनन्द मनाने के लिए राग-रंग के सभी समान सजाए हैं। कवि ने अपनी काल्पनिक शक्ति से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण को कलात्मक दृश्य रूप प्रदान किया है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि की कल्पना से अलौकिक भाव की प्रस्तुति हुई है। देवताओं की स्त्रियाँ आकाश में राग-रंग मना रही हैं, यह कवि की मौलिक कल्पना है।
(i) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली प्रबन्ध छन्द रोला अलंकार उपमा एवं अनुप्रास गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

  • 4 कबहुँ सु-धार अपार वेग नीचे कौं धावै।
    हरहराति लहराति सहस जोजन चलि आवै।।
    मनु बिधि चतुर पौन निज मन को पावत।
    पुन्य-खेति-उत्पन्न हीर की रासि उसावत।।

शब्दार्थ सुधार-सुन्दर धारा; धावै-दौड़ती है; हरहराति-हड़बड़ाती हुई
सहस-हजार; जोजन-योजन; पौन-पवन, पुन्य खेत-पुण्य क्षेत्र, हीर-हीरे; उसावत-बरसा रहा है।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने गंगा के तीव्र गति से पृथ्वी पर उतरने का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कह रहे हैं कि गंगा की सुन्दर धारा बड़ी तेजी के साथ धरती की ओर दौड़ी एवं हर-हर शब्द की ध्वनि के साथ हजार योजन तक लहराती हुई आगे बढ़ रही है। कवि का कहना है कि गंगा की धारा जल की बूंदों को पृथ्वी पर गिरते हुए देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो ब्रह्मारूपी चतुर किसान ने अपने
मन के अनुकूल पवन गति को देखकर अपने पुण्यरूपी खेत में उत्पन्न हीरे की फसल को उड़ाकर उसकी प्रचुर राशि की बरसा पृथ्वी पर की हो, जिससे हीरे रूपी गंगा की धारा जल की बूंदें पृथ्वी पर गिर रही हैं एवं भूसे पृथ्वी पर इधर-उधर फुहारों के रूप में बिखर रहे हैं। ब्रह्मा के कमण्डल से निकली गंगा की। धारा के जल की बूंदों एवं फुहारों के लिए कवि के मन में उत्पन्न ब्रह्मारूपी किसान एवं हीरेरूपी फसल की कल्पना की मौलिकता अद्भुत है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे किसान अपने अनाज को भूसे से अलग करने के लिए उसे हवा में उड़ाता है, तो अनाज एवं भसा अलग-अलग हो जाता है वैसे ही ब्रह्मारूपी किसान ने भी अपने पुण्यरूपी कृषि से उत्पन्न हीरे को अर्थात् गंगा की धारा के जल दी बूंदों को हवा में उड़ाया तो उसका भूसा फुहार के रूप में
इधर-उधर फैल गया। कवि ने गंगा की धारा के जल की बूंदों को हीरा एवं उसकी फुहारों की तुलना भूसे से की है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) गंगावतरण का वर्णन करने के क्रम में कवि ने कल्पना के आधार पर ब्रह्मारूपी किसान एवं हीरेरूपी फसल के अपने काल्पनिक भावों को अभिव्यक्त किए हैं।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली प्रबन्ध छन्द रोला अलंकार रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास एवं शब्द मैत्री गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 5 इहिं बिधि धावति धंसति ढरति ढरकति सुख-देनी।
    मनहुँ सँवारति सुभ सुर-पुर की सुगम निसेनी।।
    बिपुल बेग बल बिक्रम के ओजनि उमगाई।।
    हरहराति हरषाति सम्भु-सनमुख जब आई।

शब्दार्थ इहि बिधि-इस प्रकार; धावति-दौड़ती; सर-पर-स्वर्ग: संगम
निसेनी–आसान सीढ़ी; विपुल वेग-अत्यधिक जल्दी ओजनि-ओज;
सम्भु-सनमुख-भगवान शिवा

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने सुख प्रदायिनी गंगा के शिव के सन्मुख आने का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहते हैं कि गंगा अपनी तीव्र गति से आकाश से पृथ्वी पर दौड़ लगाती, धैंसती, ढलती, ढलकती-सी एवं सब के मनों को सुख प्रदान करने वाली प्रतीत होती है। कवि का कहना है कि गंगा को देखकर ऐसा लगता है मानो वह पृथ्वीवासियों के लिए पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक की सीढ़ी तैयार कर रही हो। उसकी धारा में अत्यधिक वेग, शक्ति, पराक्रम तथा ओज की उमंग है। अपने इन गुणों को सभी में उमगाती हुई, हर-हर की ध्वनि करती हुई वह अत्यन्त प्रसन्नता के साथ भगवान शिव के समक्ष प्रकट हुई। ।
पौराणिक कथा में गंगा के वेग को कम करने के लिए शिव के द्वारा उसे अपनी जटा में धारण करने का वर्णन है। कवि ने इसी आधार पर प्रस्तुत पद में गंगा के शिव के सन्मुख उपस्थित होने का वर्णन किया है। शिव का निवास स्थल हिमालय है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि गंगा स्वर्गलोक से उतरकर पृथ्वीलोक पर हिमालय पर स्थित शिव के सामने आकर रुकी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) गंगा की धारा में वेग, शक्ति, पराक्रम, ओज तथा उमंग के भावों की अभिव्यक्ति हुई है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली प्रबन्ध छन्द रोला अलंकार उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास गुण प्रसाद एवं ओज शब्द शक्ति अभिधा

  • 6 भई थकित छबि चकित हेरि हर-रूप मनोहर।
    टै आनहि के प्रान रहे तन धरे धरोहर।।
    भयो कोप को लोप चोप औरै उमगाई।
    चित चिकनाई चढ़ी कढ़ी सब रोष रुखाई।।

शब्दार्थ थकित-स्थिर; हेरी-देखकर; हर-शिव; आनहि के अन्य;
कोप-क्रोध; चोप-उत्कण्ठा, उमंग: उमगाई-उमड़ने लगा: चिकनाई-प्रेम की स्निग्धता।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने ब्रह्मा के लोक से स्वर्गलोक पर उतरी गंगा द्वारा शिव के अनुपम रूप का दर्शन पाकर उन पर मुग्ध हो जाने का वर्णन किया

व्याख्या कवि कहते हैं कि गंगा शिव के अनुपम एवं तेजस्वी रूप को देखकर धन्य एवं आश्चर्यचकित हो गई। उन्हें देखकर उसके मन में यह इच्छा हुई कि वह शिव के समीप ही विश्राम करे। अत: वह शिव के मनोरम रूप को देखते हुए वहीं स्थिर हो गई। गंगा के शरीर में स्थित उसके प्राण अब पराए हो गए अर्थात् अब वे शिव की धरोहर मात्र ही रह गए। कवि के कहने का आशय यह है कि गंगा ने अपना हृदय शिव के चरणों में समर्पित कर दिया। शिव के सामीप्य में उसका क्रोध शान्त हो गया। उसके मन में शिव को पाने की उत्कण्ठा (इच्छा) जागृत हो गई थी। उसके हृदय का रूखापन और नाराजगी अब दूर हो गई थी। अतः उसके मन में स्थित रोष एवं रूखाई के स्थान पर प्रेम की स्निग्धता उत्पन्न हो गई थी। वह शिव के प्रेम में निमग्न हो गई थी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि ने गंगा के शिव पर मुग्ध होने के भाव का चित्रण किया है।
(ii) रस क्रोध (स्थायी भाव) का शान्त होना तथा रति की उत्पत्ति हुई है। अतः। शृंगार रस है।

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली प्रबन्ध छन्द रोला अलंकार अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 7 कृपानिधान सुजान सम्भु हिय की गति जानी।
    दियौ सीस पर ठाम बाम करि कै मनमानी।।
    सकुचति ऐंचति अंग गंग सुख संग लजानी।
    जटा-जूट हिम कूट सघन बन सिमटि समानी।।

शब्दार्थ सुजान-चतर: ठाम-स्थान: बाम स्त्री; ऐचति-सिकोड़ती हुई,
खिंचती हुई, हिम कूट-हिमालय की चोटी; समानी-समा गई।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने गंगा की धारा का शिव की जटाओं में समा जाने का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहते हैं कि कृपा के निधान शिवजी ने गंगा के मन में निहित भाव को जान लिया। उन्होंने उसे प्रियतमा के रूप में स्वीकार किया एवं उसे अपनी जटाओं में स्थान दिया। फिर गंगा संकोचवश अपने अंगों को सिकोड़कर सुखपूर्वक प्रवाहित होने लगी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो लज्जावश उसने अपने अंगों को सिकोड़ लिया हो। सघन हिमालय के समान शिवजी की
घनी जटाओं (चोटियों) में गंगा सिमट कर विलीन हो गई। कहने का अभिप्राय यह है कि जब गंगा को शिवजी ने अपनी जटाओं में धारण कर लिया, तब उसके तीव्र प्रवाह में कमी आ गई। स्वर्ण की ऊँचाई से धरती पर उतरते समय उसका प्रवाह अत्यन्त तीव्र था, किन्तु शिव की जटाओं में स्थान मिलने पर गंगा
सन्तुलित हो गई।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवि में गंगा और शिव के पारस्परिक प्रेम के भाव का अति सुन्दर चित्रण किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा ब्रजभाषा शैली प्रबन्ध छन्द रोला अलंकार रूपक एवं छेकानुप्रास गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

उद्धव-प्रसंग

  1. भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
    सुधि ब्रज-गाँवनि मैं पावन जबै लगीं।
    कहै ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि
    दौरि-दौरि नन्द-पौरि आवन तबै लगीं।
    उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै
    पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं।
    हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
    हमकौं लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि कौन हैं?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश ‘उद्धव प्रसंग’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ जी हैं।

(ii) गोपियों के अत्यन्त व्याकुल होने के कारण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर कवि कहते हैं कि जब गोपियों को यह ज्ञात हुआ कि उद्धव उनके प्रिय श्रीकृष्ण का कोई सन्देश लेकर आए हैं, तो वे अपने प्रियतम का सन्देश जानने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो उठती हैं।

(ii) श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश के आगमन पर गोपियों का चित्रण कवि ने किस प्रकार किया है?
उत्तर श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश को उनके दूत उद्धव लाते हैं। इसकी सूचना मिलते ही सभी गोपियाँ समूह में दौड़-दौड़कर अपने प्रियतम (कृष्ण) के दूत (उद्धव) से मिलने हेतु नन्द के द्वार पर आने लगीं और अपने कमलरूपी चरणों के पंजों पर उचक-उचककर वे श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश को। देखने लगीं। यहाँ कवि ने गोपियों की व्याकुलता को उजागर किया है।

(iv) “हमकों लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं।” इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि सभी गोपियाँ अपने प्रियतम द्वारा भेजे गए सन्देश को जानने हेतु उत्कण्ठित हो उठी हैं। वे सभी उद्धव से जानना चाहती हैं कि उनके प्रियतम ने किसके लिए क्या-क्या सन्देश भेजे हैं। वे सभी अपने-अपने सन्देश को सुनने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो चुकी हैं।

(v) प्रस्तुत पद्यांश के अलंकार सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर ‘झौरि-झौरि’, ‘दौरि-दौरि’, ‘उझकि उझकि’, ‘पेखि पेखि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है, ‘छाती छोहिन छबै’ में अनुप्रास अलंकार है, ‘पद-कंजनि’ में ‘रूपक अलंकार’ है।

  • 2 चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम-सुन्दर कौ
    जोग के प्रयोग में हियौ तौ बिलस्यो रहे।
    कहै ‘रतनाकर’ सु-अन्तर-मुखी है ध्यान
    मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै।।
    ऐसैं करौं लीन आतमा को परमातमा में
    जामै जड़-चेतन-बिलास बिकस्यौ रहै।
    मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि
    सो तौ सब अन्तर-निरन्तर बस्यौ रहै।।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में गोपियों को उद्धव क्या सन्देश दे रहे हैं?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से उद्धव गोपियों को ज्ञान-मार्ग का अनुसरण करने का सन्देश दे रहे हैं। उद्धव के अनुसार योग से आय एवं अंग से योग-सिद्धि होती है। वे गोपियों को सगुण भक्ति को छोड़ निर्गण भक्ति की। ओर ले जाने हेत ही ज्ञान-मार्ग और योग का सन्देश दे रहे हैं।।

(ii) उद्धव के अनुसार गोपियों का श्रीकृष्ण से मिलन किस प्रकार सम्भव है?
उत्तर पद्यांश में उद्धव गोपियों को स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि यदि तुम (गोपियाँ) श्याम सुन्दर अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ संयोग को अपने अधिकार में करना चाहती हो, तो अपने हृदय को योग साधना में आनन्द के साथ लीन रखो अर्थात् उद्धव गोपियों को कष्ण के मिलन के नाम पर प्रेम-मार्ग से हटाते हुए योग-मार्ग की ओर ले जाना चाहते हैं।

(iii) ‘मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहे’ पंक्ति का आशय स्पष्ट
कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति उद्धव द्वारा गोपियों को श्रीकृष्ण से संयोग के सन्दर्भ में कही गई है। उद्धव गोपियों को कृष्ण का ध्यान करने के लिए हृदय में स्थित आत्मा की ओर उन्मुख होने के लिए कहते हैं। मनुष्य के सुन्दर हृदयरूपी कमल में ब्रह्म की ज्योति जलती रहती है, उसी ब्रह्मा की ज्योति के ध्यान में गोपियों को लीन रहना चाहिए। इसी ब्रह्म की ज्योति से श्रीकृष्ण का संयोग सम्भव है।

(iv) उद्धव ने कृष्ण को क्या माना है? वे परमात्मा के मिलने के सन्दर्भ में क्या कहते हैं?
उत्तर उद्धव ने कृष्ण को ब्रह्म का स्वरूप माना है और ब्रह्म प्राप्ति के सन्दर्भ में उनका विचार है कि जब हम परमात्मा को पाना चाहते हैं तब आत्मा को ब्रह्म (परमात्मा) में इस प्रकार लीन हो जाना चाहिए, जिससे परमात्मा के हृदय में जड और चेतन के प्रति आनन्द प्रकट होता रहे। इस प्रकार परमात्मा को पाया जा सकता है।

(v) ‘मंजु हिय-कंज-जगी’-प्रस्तुत पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
तर प्रस्तुत काव्य पंक्ति में कमल को हृदयरूपी बताया गया है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

  • 3 कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत कै पधारे आप
    धारे प्रन फेरन को मति ब्रजबारी की।
    कहै ‘रतनाकर’ पै प्रीति-रीति जानत ना
    ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की।।
    मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
    तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की।
    जैहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि कौं
    बूंदता बिलैहे बूंद बिबस बिचारी की।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) गोपियों ने उद्धव के आगमन पर क्या प्रश्न किया?
उत्तर गोपियों ने उद्धव के आगमन पर प्रश्न किया कि आप ब्रजमण्डल में हमारी बुद्धि बदलने का प्रण लेकर कृष्ण का दूत बनकर आए हैं या बह्म का दूत बनकर आए हैं?

(ii) “धारे प्रन फेरन को मति ब्रजबारी की।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से उद्धव गोपियों का ध्यान कृष्ण-प्रेम से हटाना चाहते हैं। उद्धव गोपियों को निर्गुण उपासना के प्रति उपदेश देकर कृष्ण की सगुण उपासना का विरोध गोपियों के समक्ष करते हैं, जिससे गोपियों का हृदय परिवर्तन हो जाए और वे कृष्ण को अपने मन से विस्मृत कर दें।

(iii) कवि ने उद्धव को अनारी क्यों कहा है?
उत्तर कवि के अनुसार उद्धव को प्रीति की रीति का ज्ञान नहीं है और वे बद्धिहीनों जैसा व्यवहार करके गोपियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। वे गोपियों के प्रेमी कृष्ण के स्थान पर ब्रह्म की बातों का उपदेश दे रहे हैं। यही कारण है कि कवि ने उद्धव को अनारी कहा है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में ब्रह्म की तुलना किससे की गई है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में ब्रह्म की तुलना गोपियों ने अथाह समुद्र से करते हुए कहा है। कि ब्रह्म अथाह समुद्र की तरह है एवं वे जल की बूंदों के समान हैं। समुद्र में। जल की कुछ बूंदें मिलें या नहीं मिलें, इससे समुद्र के अस्तित्व पर कोई प्रभाव। नहीं पड़ता, परन्तु द समुद्र में मिल जाए तो उसका अस्तित्व अवश्य की समाप्त हो जाता है।

(v) प्रस्तुत पंद्याश में कौन-सा रस है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में वियोग श्रृंगार रस है। यहाँ गोपियों एवं कृष्ण के वियोग का वर्णन है।

  • 4 चिन्ता-मनि मंजुल पँवारि धूर-धारनि मैं
    काँच-मन-मुकुर सुधारि रखिबौ कहो।।
    कहै ‘रतनाकर’ बियोग-आगि सारन कौं
    ऊधौ हाय हमकौं बयारि भखिबौ कहौ।।
    रूप-रस-हीन जाहि निपट निरूपि चुके
    ताको रूप ध्याइबौ औ रस चखिबौ कहौ।
    एते बड़े बिस्ब माहीं हेरैं हूँ न पैयै जाहि,
    ताहि त्रिकुटी मैं नैन ऍदि लखिबौ कहौ।।
    आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै
    ऊधौ ये बियोग के बचन बतरावौ न।
    कहै ‘रतनाकर’ दया करि दरस दीन्यौ
    दुख दरिबै कौं, तोपै अधिक बढ़ावौ ना।।
    टूक-टूक लैहै मन-मुकुर हमारौ हाय
    चूकि हूँ कठोर बैन-पाहन चलावौ ना।
    एक मनमोहन तौ बसिकै उजाऱ्या मोहिं
    हिय मैं अनेक मनमोहन बसावौ ना।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ योग-साधना की निरर्थकता को सिद्ध कर रही है। वै । कृष्ण शक्ति के अतिरिक्त निराकार ब्रह्म की उपासना नहीं करना चाहती है। गोपियों के हृदय में यह भाव है कि कृष्ण-भक्ति उनके साकार रूप के दर्शन। द्वारा ही सहज होती है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गोपियों के किस भाव को अभिव्यक्त किया है? ।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गोपियों के कृष्ण प्रेम के भाव को अभिव्यक्त करते हुए उद्धव की योग साधना को प्रेम-मार्ग में बाधक बताया है। कवि ने कहा है कि गोपियाँ वियोग की अग्नि से व्याकुल हैं और उद्धव उन्हें प्राणायाम द्वारा अपनी वियोग अग्नि को बुझाने के लिए कह रहे हैं। कवि ने उद्धव के विरुद्ध कहा है कि प्राणायाम करने से गोपियों के विरह की आग बुझेगी नहीं अपितु भड़केगी।

(iii) गोपियाँ उद्धव से क्या अनुरोध करती हैं?
उत्तर गोपियाँ उद्धव से अनुरोध करती हैं कि वियोग की बात करके हमारे दुःख को और अधिक न बढ़ाएँ, क्योंकि कृष्ण के वियोग की बात सुनकर उनके हृदय में स्थित मनरूपी दर्पण के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे और वे वियोग की अग्नि में और अधिक जलने लगेंगी।

(iv) कवि ने उद्धव के वचन को किस प्रवृत्ति का माना है?
उत्तर कवि ने उद्धव के वचन को पत्थर के समान कठोर प्रवृत्ति का माना है, जो गोपियों के हृदय के टूटे दर्पण के टुकड़ों में अनेक मनमोहन (कृष्ण) को बसाकर फिर उसे उजाड़कर उनके वियोग को और अधिक बढ़ा देते हैं।।

(v) ‘नैन’ और मनमोहन के दो-दो पर्यायवाची बताइए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची नैन आँख, नयन मनमोहन श्रीकृष्ण, वासुदेव

  • 5 धाई जित तित तैं बिदाई-हेत ऊधव की
    गोपी भरी आरति सँभारति न साँसुरी।
    कहै ‘रतनाकर’ मयूर-पच्छ कोऊ लिए
    कोऊ गुंज-अंजली उमाहै प्रेम-आँसुरी।।
    भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
    कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।
    पीत पट नन्द जसुमति नवनीत नयौ
    कीरति-कुमारी सुरबारी दई बाँसुरी।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन किया गया है? |
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने उद्धव के मथुरा लौटने के समय राधा, यशोदा, नन्द और गोपियों के द्वारा उन्हें कृष्ण के लिए विभिन्न उपहार दिए जाने से सम्बन्धित प्रसंग का वर्णन किया गया है।

(ii) इस पद्यांश में ब्रजवासियों की कैसी दशा का वर्णन किया गया है?
उत्तर इस पद्यांश में कवि ने कृष्ण के प्रेम में विहृल एवं उद्धव की विदाई से दुःखी ब्रजवासियों की भावपूर्ण दशा का चित्रण किया है।

(iii) गोपियाँ कृष्ण के लिए क्या-क्या उपहार देना चाहती हैं?
उत्तर गोपियाँ अपनी शक्ति के अनुसार कृष्ण को कुछ-न-कुछ उपहार अवश्य देना चाहती हैं। कोई गोपी मोर पंख लेकर आती है, तो कोई घुघची की माला,

कोई गोपी मलाईयक्त दही, और कोई मट्ठा लेकर आती है। यह सभी
उपहार गोपियों द्वारा कृष्ण के प्रति प्रेम-भाव को उजागर करते हैं।

(iv) ब्रजवासियों का कृष्ण के साथ कैसा सम्बन्ध था?
उत्तर ब्रजवासियों का कृष्ण से अथाह प्रेम था। वे उनके दर्शन के लिए एवं उनके सान्निध्य के लिए सदैव व्याकुल रहते थे। ब्रज की गोपियाँ अपने से दूर रहने वाले अपने प्रियतम के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहती थीं।

(v) “पीत पट नन्द जसुमति नवीन नयौ।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर ‘पीत पट’ में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति तथा ‘नवीन नयौं’ में ‘न’ वर्ण की आवृत्ति । होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

  • 6 प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
    थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है।
    कहै ‘रतनाकर’ यौं आवत चकात ऊधौ
    मानो सुधियात कोऊ भावना भुलाई है।।
    धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
    सारत बँहोलिनि जो आँस-अधिकाई है।
    एक कर राजै नवनीत जसुदा को दियौ
    एक कर बंसी बर राधिका-पठाई है।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ब्रजवासियों की प्रेमपूर्ण विदाई से भाव-विह्वल उद्धव की मनःस्थिति का मामिका वर्णन हुआ है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार ज्ञानी उद्धवा ब्रजगोपियों के अपार प्रेम से प्रभावित होकर स्वयं श्रीकष्ण के प्रेम में सराबार। होकर उनके भक्त बन गए। यहाँ सगुण की निर्गण पर विजय का भाव व्यक्त किया गया है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में वर्णित उद्धव की मनःस्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर जब उद्धव ब्रज से मथुरा के लिए जाने लगे, तो वे भी भावुक हो गए थे। उनके शरीर के सारे अंग थके-थके से लगने लगे और उनकी आँखों में शिथिलता दिखाई देने लगी। वह अत्यन्त दुःखी प्रतीत हो रहे थे।

(iii) उद्धव को ब्रज प्रस्थान के समय किन-किन लोगों ने विदाई दी?
उत्तर उद्धव को ब्रज प्रस्थान के समय राधा, नन्द, यशोदा, अन्य गोपियों और समस्त ब्रजवासियों ने विदाई दी थी। इसी प्रेम-भाव को देखकर उद्धव अत्यन्त भावुक हो उठे थे।

(iv) ‘मानो सुधियात कोऊ भावना भुलाई है।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर ‘मानो सुधियात कोऊ भावना भुलाई है’ पंक्ति में उत्प्रेक्षा अंलकार है। यहाँ ‘मानो’ वाचक शब्द के प्रयोग होने के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(v) ‘अधिकाई’ शब्द में से प्रत्यय और मूल-शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर अधिकाई = अधिक (मूल-शब्द) + आइ (प्रत्यय)

  • 7 ब्रज-रज-रंजित सरीर सुभ ऊधव को ।
    धाइ बलबीर हूँ अधीर लपटाए लेत।।
    कहै ‘रतनाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
    थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।
    कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
    छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
    परन न देत एक बूंद पुहुमी की कोछि
    पोछि-पोंछि पट निज नैननि लगाए लेत।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गोपियों की भक्ति भावना से विह्वल उद्धव जी के मथुरा लौट आने के पश्चात् उनकी दशा को देखकर कृष्ण जी की भाव विह्वलता की स्थिति का वर्णन किया है।

(ii) श्रीकृष्ण के मन में गोपियों की मधुर-स्मृति कैसे जागृत हुई?
उत्तर जब उद्धव ब्रज से लौटकर मथुरा आए तब उनका शरीर धूल से भरा हुआ था। ब्रज की पवित्र मिट्टी में लिप्त उद्धव को देख श्रीकृष्ण भाव-विह्वल हो उठे और उन्होंने उद्धव को अपनी बाँहों में ले लिया। उद्धव का धूल भरा शरीर तथा गोपियों के प्रति उनका प्रेम-भाव देखकर ही श्रीकृष्ण के मन में गोपियों एवं ब्रजवासियों की मधुर-स्मृति जागृत हुई।

(iii) कहै ‘रत्नाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत काव्य पंक्तियों से आशय है कि उद्धव को प्रेम-मद में लीन देखकर श्रीकृष्ण उनकी काँपती भुजा को थाम लेते हैं और अपने मन में गोपियों के उस पवित्र प्रेम को याद करके वे काँपते हुए हाथों से उद्धव को स्थिर करने का प्रयास करते हैं।

(iv) श्रीकृष्ण को उद्धव के आँसुओं का स्वरूप कैसा लगता है?
उत्तर श्रीकृष्ण को उद्धव के आँसुओं का स्वरूप राधा के समान दिखाई पड़ता है। राधा के दर्शन से पवित्र हई उद्धव की आँखों से जब गोपियों के वियोग में। ऑसू निकल आते हैं तो श्रीकृष्ण उन आँसुओं को पृथ्वी पर गिरने से पूर्व ही एक-एक बूंद को अपने दुपटटे से पोंछकर अपनी आँखों से लगा लेते है। क्योंकि ये आँस जिन आँखों से निकले थे वे आँखें राधा के दर्शन करके आई।
थीं।

(v) पोंछि-पोंछि पट निज नैननि लगाए लेत’ प्रस्तुत पंक्ति में कौन-सा अलंकार
उत्तर पोंछि-पोंछि में पॉछि शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्ति प्रकाश तथा ‘निज नैननि लगाए लेत’ में ‘न’ और ‘ल’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

  • 8 छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कै तीर
    गौन रौन-रेती सों कदापि करते नहीं।
    कहै ‘रतनाकर’ बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
    स्रौन रसना मैं रस और भरते नहीं।।।
    गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
    लेखि प्रलयागत हूँ नैंकु डरते नहीं।
    होतो चित्त चाब जौ न रावरे चितावन को
    तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने क्या वर्णित किया है?
उत्तर कवि ने उद्धव के माध्यम से ब्रजभूमि के प्रति अपने अनुराग भाव को अभिव्यक्त करते हुए उद्धव के ऊपर गोपियों एवं ब्रजवासियों के प्रभाव तथा उनके प्रति असीम प्रेम भाव का वर्णन किया है।

(ii) मथरा लौटने के पश्चात उद्धव की स्थिति कैसी हो गई है।
उत्तर मथुरा लौटने के पश्चात् उद्धव प्रत्येक क्षण ब्रज की गोपियों और ब्रजवासियों का ही स्मरण करते रहना चाहते हैं। सम्पूर्ण ब्रजमण्डल मानो उनके हृदय में वास कर गया हो। वे एक क्षण के लिए भी ब्रजमण्डल की चर्चा किए बिना नहीं रह सकते।

(iii) “लेखि प्रलयागत हूँ नैकु डरते नहीं।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर कवि का इस पंक्ति से आशय यह है कि उद्धव ने ब्रज से आते समय जिन भावातिरेक परिस्थितियों का सामना किया वे किसी भयंकर प्रलयकारी क्षण से कम नहीं थीं। उद्धव कहते हैं गोपियों का अश्रु-प्रवाह प्रलयकालीन जल से भी भयावह प्रतीत होता था। इसलिए अब उन्हें आने वाली किसी भी प्रलय का भय नहीं है।

(iv) उद्धव ने मथुरा वापस जाने के पीछे क्या कारण बताया है? ।
उत्तर उद्धव का ब्रजभूमि के प्रति इतना लगाव हो जाने के पश्चात् भी उन्हें मथुरा वापस जाना पड़ा। उद्धव स्वयं श्रीकृण को इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “यदि मेरे मन में आपको सजग करने की इच्छा नहीं होती तो मैं ब्रज से मथुरा कदापि लौट कर न आता अर्थात गोपियों के सन्देश को श्रीकृष्ण तक पहुँचाने के लिए उद्धव ने मथुरा वापसी की थी।

(v) ‘चित्त’ और ‘ग्वाल’ के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर शब्द पर्यायवाची
चित ग्वाल गोपाल

गगावतरण

  1. निकसि कमण्डल तैं उमण्डि नभ-मण्डल खण्डति।
    धाई धार अपार बेग सौं बायु बिहण्डति।।
    भयौ घोर अति शब्द धमक सौं त्रिभुवन तरजे।
    महामेघ मिलि मनहु एक संगहिं सब गरजे।।
    निज दरेर सों पौन-पटल फारति फहरावति।।
    सुर-पुर के अति सघन घोर धन घसि घहरावति।।
    चली धार धुधकारि धरा-दिसि काटति कावा।
    सगर-सुतनि के पाप-ताप पर बोलति धावा।।
    स्वाति-घटा घहराति मुक्ति-पानिप सौं पूरी।
    कैधों आवति झुकति सुभ्र आभा रुचि रूरी।।
    मीन-मकर-जलव्यालनि की चल चिलक सुहाई।
    सो जनु चपला-चमचमति चंचल छबि छाई।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से अवतरित हैं तथा इसके रचनाकार कौन
उत्तर प्रस्तुत पंक्तियाँ गंगावतरण कविता से अवतरित हैं तथा इसके रचनाकार आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ जी।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन किया गया है? ।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ब्रह्मा जी के कमण्डल से अवतरित हुई गंगा के स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आने के क्रम में उसकी स्वाभाविक दशा का वर्णन किया है। गंगावतरण स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए हुआ था। इसी भाव की अभिव्यक्ति कवि ने प्रस्तुत पद्यांश में की है।

(iii) गंगा के स्वर्गलोक से प्रथ्वीलोक तक आने के क्रम को कवि ने किस प्रकार। वर्णित किया है?

उत्तर स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक तक आने के क्रम में गंगा के तीव्र वेग से अति भयंकर शब्द ध्वनित होते हैं, जिसकी धमक से तीनों लोक काँप उठते हैं। पृथ्वी पर गंगा के अवतरण का वेग अत्यधिक प्रचण्ड है, उससे उत्पन्न ध्वनि सुनकर ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे प्रलयकाल के बादल एक साथ मिलकर गरज रहे हों।

(iv) गंगा की श्वेत धारा को देखकर कैसा प्रतीत हो रहा है?
उत्तर आकाश से धरती पर उतरती हई गंगा की श्वेत धारा को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मोतियों की कान्ति से परिपूर्ण स्वाति नक्षत्र के मेघों का समूह आकाश में उमड़ रहा हो या सुन्दर श्वेत प्रकाशमान । ज्योति पृथ्वी की ओर झुकती हुई चली आ रही हो।

(v) ‘त्रिभुवन’ शब्द का समास विग्रह करते हुए उसका भेद बताइए।
उत्तर त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार (द्विगु समास)।

  • 2 रुचिर रजतमय कै बितान तान्यौ अति बिस्तर।
    झरति बूंद सो झिलमिलाति मोतिनि की झालर।।
    ताके नीचें राग-रंग के ढंग जमाये।
    सुर-बनितनि के बृन्द करत आनन्द-बधाये।।
    कबहुँ सु-धार अपार वेग नीचे कौं धावै।
    हरहराति लहराति सहस जोजन चलि आवै।।
    मनु बिधि चतुर पौन निज मन को पावत।
    पुन्य-खेति-उत्पन्न हीर की रासि उसावत।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने किन काल्पनिक भावों की अभिव्यक्ति की हैं?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में गंगावतरण का वर्णन करने के क्रम में कवि ने कल्पना के आधार पर ब्रह्मारूपी किसान एवं हीरेरूपी फसल के अपने काल्पनिक भावों की अभिव्यक्ति की है।

(ii) रुचिर रजतमय के बितान तान्यो अति बिस्तर।
झरति बूंद सो झिलमिलाति मोतिनि की झालर।।
प्रस्तुत काव्य पंक्तियों से कवि का क्या आशय है।
उत्तर कवि का इन पंक्तियों से आशय है कि गंगा जब आकाश से पृथ्वी पर अवतरित हो रही थी, तब उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने सुन्दर रूपहला श्वेत रंग का विस्तृत चँदोवा (तम्बू) टाँग दिया हो। गंगा की धारा से जल बूंदें तम्बू में लटकी हुई मोतियों की झालर के समान शोभा पा रही थीं।

(iii) गंगा की धारा, जल की बूँदों को पृथ्वी पर गिरते देख कैसा प्रतीत होता है?
उत्तर गंगा की धारा, जल की बूंदों को पृथ्वी पर गिरते हुए देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे ब्रह्मारूपी चतुर किसान ने अपने मन के अनुकूल पवन गति को देखकर अपने पुण्यरूपी खेत से उत्पन्न हीरे की फसल उड़ाकर ।अर्थात उसकी प्रचुर राशि की वर्षा पृथ्वी पर कर दी हो।

(iv) कवि ने गंगा की धारा के जल की बूंदों तथा उसकी फुहारों की तुलना किससे की है?
उत्तर कवि के अनुसार ब्रह्मारूपी किसान ने अपने पुण्यरूपी कृषि से उत्पन्न हीरे को। अर्थात गंगा की धारा के जल की बँदों को हवा में उड़ाया, तो उसका भूसा फुहार के रूप में इधर-उधर फैल गया। कवि ने गंगा की धारा के जल की बूंदों को हीरा एवं उसकी फुहारों की तुलना भूसे से की है।

(v) ‘मनु बिधि चतुर पौन निज मन को पावता पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर प्रस्तुत काव्य पंक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार है। उत्प्रेक्षा अलंकार में जनु, मनु, जानो, मानो आदि योजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

  • 3 भई थकित छबि चकित हेरि हर-रूप मनोहर।
    है आनहि के प्रान रहे तन धरे धरोहर।।
    भयो कोप को लोप चोप औरै उमगाई।।
    चित चिकनाई चढ़ी कढ़ी सब रोष रुखाई।।
    कृपानिधान सुजान सम्भु हिय की गति जानी।
    दियौ सीस पर ठाम बाम करि कै मनमानी।।
    सकुचति ऐंचति अंग गंग सुख संग लजानी।
    जटा-जूट हिम कूट सघन बन सिमटि समानी।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया है?

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ब्रह्मा के लोक से स्वर्गलोक पर उतरी गंगा द्वारा शिव के अनुपम रूप का दर्शन पाकर उन पर मुग्ध हो जाने का मनोहारी वर्णन किया है।

(ii) गंगा का क्रोध किस प्रकार शान्त हुआ?
उत्तर शिव का मनोरम रूप देखते ही गंगा स्थिर हो गई। गंगा के शरीर में स्थित उसके प्राण अब पराए हो गए। गंगा ने अपना हृदय शिव को समर्पित कर दिया व शिव के समीप्य उसका क्रोध शान्त हो गया।

(iii) ‘सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी। पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर जब शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया तब मानो गंगा ने लज्जावश अपने अंगों को सिकोड़ लिया। कहने का आशय यह है कि शिवजी ने गंगा के मन में निहित भाव को जान लिया था और उसे अपनी प्रियतमा के रूप में स्वीकार लिया था। शिवजी के इस प्रेममयी रूप को देख गंगा लज्जाशील हो गई थी।

(iv) शिवजी की जटाओं में स्थान पाकर गंगा की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर शिवजी की जटाओं में स्थान पाकर गंगा के प्रवाह में तीव्रता कम हो गई थी। स्वर्ग की ऊँचाई से धरती पर उतरते समय उसका प्रवाह अत्यन्त तीव्र था, परन्तु। शिवजी की जटाओं में स्थान मिलने पर गंगा सन्तुलित हो गई।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस निहित है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में गंगा और शिव के पारस्परिक प्रेम के भाव का अति सुन्दर चित्रण किया गया है। अतः यहाँ शृंगार रस है।.

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