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UP Board महादेवी वर्मा – परिचय – गीत
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य-महादेवी वर्मा – परिचय – गीत
Chapter 8
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

संक्षिप्त परिचय महादेवी वर्मा

नाममहादेवी वर्मा
जन्म1907 ई. में फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
पिता का नामगोविन्द प्रसाद वर्मा
माता का नामहेमरानी देवी
शिक्षाइन्होंने घर पर ही चित्रकला एवं संगीत की शिक्षा
अर्जित की। इनकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई।
कृतियाँकाव्य संग्रह निहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत
दीपशिखा। गद्य रचनाएँ अतीत के चलचित्र, स्मृति की
रेखाएँ, श्रृंखला की कड़ियाँ सम्पादन _ ‘चाँद’ पत्रिका
भाषा-शैली शुद्ध साहित्यिक, खड़ी बोली भाषा मुक्तक
गीतिकाव्य।
उपलब्धियाँहिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘सेकसरिया’ एवं मंगला प्रसाद पुरस्कार 1983 में ‘यामा’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार
1983 में ‘भारत-भारती’ पुरस्कार से सम्मानित भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित।
मृत्यु1987 ई.

महादेवी वर्मा जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित शिक्षित कायस्थ परिवार में 1907 ई. में होलिका दहन के पर्व के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम गोविन्द प्रसाद वर्मा था। इनकी माता हेमरानी हिन्दी व संस्कृत की ज्ञाता तथा साधारण कवयित्री थीं। नाना व माता के गुणों का प्रभाव ही महादेवी जी पर पड़ा। नौ वर्ष की छोटी आयु में ही इनका विवाह स्वरूपनारायण वर्मा से हो गया था। कुछ समय पश्चात् महादेवी की माता का देहान्त हो गया। इसके बावजूद इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा। महादेवी
वर्मा का दाम्पत्य जीवन सफल नहीं रहा। विवाह के बाद इन्होंने अपनी परीक्षाएँ सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। इन्होंने घर पर ही चित्रकला एवं संगीत की शिक्षा अर्जित की। इनकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद (प्रयाग) में हुई। कुछ समय तक इन्होंने ‘चाँद’ पत्रिका का सम्पादन भी किया। इन्होंने शिक्षा समाप्ति के बाद 1933 ई. से प्रयाग महिला विद्यापीठ के प्रधानाचार्या पद को सुशोभित किया। इनकी काव्यात्मक प्रतिभा के लिए इन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘सेकसरिया’ एवं ‘मंगलाप्रसाद’ पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। 1983 ई. में ‘भारत-भारती’ तथा ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ (‘यामा’ नामक कृति पर) द्वारा सम्मानित किया गया।
भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ सम्मान से सम्मानित इस महान् लेखिका का स्वर्गवास 11 सितम्बर, 1987 को हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

छायावाद की प्रमुख प्रतिनिधि कवयित्री महादेवी वर्मा का नारी के प्रति विशेष दृष्टिकोण एवं भावुकता होने के कारण उनके काव्य में रहस्यवाद, वेदना भाव, अलौकिक प्रेम आदि की अभिव्यक्ति हुई है। महादेवी वर्मा की ‘चाँद’ पत्रिका में रचनाओं के प्रकाशन के पश्चात् उन्हें विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

कृतियाँ

इनका प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह निहार है, जिसमें भावमय गीत संकलित हैं। शिम संग्रह में आत्मा-परमात्मा के मधुर सम्बन्धों पर आधारित गीत संकलित हैं। नीरजा में प्रकृति प्रधान गीत संकलित हैं। सान्ध्यगीत के गीतों में परमात्मा से मिलन का आनन्दमय चित्रण है। दीपशिखा में रहस्यभावना प्रधान गीतों को। संकलित किया गया है। यामा में इनके विशिष्ट गीतों का संग्रह प्रकाशित हआ है।इसके अतिरिक्त अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, श्रृंखला की कड़ियाँ । आदि इनकी गद्य रचनाएँ हैं।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. अलौकिक प्रेम का चित्रण महादेवी वर्मा के सम्पर्ण काव्य में अलौकिक ब्रह्म के प्रति प्रेम का चित्रण हुआ है। वही प्रेम आगे चलकर इनकी साधना बन गया। इस अलौकिक ब्रह्म के विषय में कभी तो इनके मन में मिलन की प्रबल भावना जाग्रत हुई है, तो कभी रहस्यमयी प्रबल जिज्ञासा प्रकट हुई है।
  2. रहस्यात्मकता आत्मा के परमात्मा से मिलन के लिए बेचैनी इनके काव्य में प्रकट हुई है। आत्मा से परमात्मा के मिलन के सभी सोपानों का वर्णन महादेवी वर्मा के काव्य में मिलता है। मनुष्य का प्रकृति से तादात्म्य, प्रकृति पर चेतनता का आरोप, प्रकृति में रहस्यों की अनुभूति, असीम सत्ता और उसके प्रति समर्पण तथा सार्वभौमिक करुणा आदि विशेषताएँ इनके रहस्यवाद से जड़ी हैं। इन्होंने प्रक्रति पर मानवीय भावनाओं का आरोपण करके उससे आत्मीयता स्थापित की।
  3. वेदना भाव महादेवी वर्मा के काव्य में मौजूद वेदना में साधना, संकल्प एवं लोक कल्याण की भावना निहित है। वेदना इन्हें अत्यन्त प्रिय है। इनकी इच्छा है कि इनके जीवन में सदैव अतृप्ति बनी रहे। इन्होंने कहा भी। है-“में नीर भरी द:ख की बदली।” इन्हें ‘आधुनिक मीरा’ की संज्ञा भी दी। गई है।
  4. प्रकृति का मानवीकरण महादेवी के काव्य में प्रकृति आलम्बन,
    उद्दीपन, उपदेशक, पूर्वपीठिका आदि रूपों में प्रस्तुत हुई है। इन्होंने प्रकृति में विराट की छाया देखी है। छायावादी कवियों के समान ही इन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है। सुन्दर रूपकों द्वारा प्रकृति के सुन्दर चित्र खींचने में महादेवी जी की समानता कोई नहीं कर सकता।
  5. रस महादेवी जी के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्षों वियोग और संयोग के साथ करुण एवं शान्त रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है।

कला पक्ष

  1. भाषा महादेवी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। इनकी भाषा के स्निग्ध एवं प्रांजल प्रवाह अन्यत्र देखने को नहीं मिलते हैं।
    कोमलकान्त पदावली ने भाषा को अपूर्व सरसता प्रदान की है।
  2. शैली इनकी शैली मक्तक गीतिकाव्य की प्रवाहमयी सुव्यवस्थित शैली है। ये शब्दों को पंक्तियों में पिरोकर कुछ ऐसे ढंग से प्रस्तुत करती हैं कि उनकी मौक्तिक आभा एवं संगीतात्मक गूंज सहज ही पाठकों को आकर्षित कर लेती है।
  3. सूक्ष्म प्रतीक एवं उपमान महादेवी जी के काव्य में मौजद प्रतीकों, रूपकों एवं उपमानों की गहराई तक पहुँचने के लिए आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं अद्वैत दर्शन की एक डुबकी अपेक्षित होगी, अन्यथा हम इनकी अभिव्यंजना के बाह्य रूप को तो देख पाएँगे, किन्तु इनकी सूक्ष्म आकर्षण शक्ति तक पहुँच पाना कठिन होगा।
  4. लाक्षणिकता लाक्षणिकता की दृष्टि से महादेवी जी का काव्य बहुत प्रभावशाली है। इन्होंने अपने गीतों के सुन्दर चित्र अंकित किए हैं। कुशल चित्रकार की भाँति इन्होंने थोड़े शब्दों से ही सुन्दर चित्र प्रस्तुत किए हैं।
  5. अलंकार एवं छन्द महादेवी जी ने अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है। इनके यहाँ उपमा, रूपक, श्लेष, मानवीकरण, सांगरूपक, रूपकातिशयोक्ति, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विरोधाभास, विशेषण-विपर्यय आदि अलंकारों का सहज रूप में प्रयोग हुआ है। इन्होंने मात्रिक छन्दों में अपनी कुछ कविताएँ लिखी हैं, परन्तु सामान्यतया विविध गीत-छन्दों का प्रयोग किया है, जो इनकी मौलिक देन है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
महादेवी वर्मा छायावादी युग की एक महान् कवयित्री समझी जाती हैं। इनके भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों ही अद्वितीय हैं। सरस कल्पना, भावुकता एवं वेदनापूर्ण भावों को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से इन्हें अपूर्व सफलता प्राप्त हई है। कल्पना के अलौकिक हिण्डोले पर बैठकर इन्होंने जिस काव्य का सृजन किया, वह हिन्दी साहित्याकाश में ध्रुवतारे की भाँति चमकता रहेगा।

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पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या

गीत-1

  • 1 चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
    जाग तुझको दूर जाना!
    अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
    या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
    आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
    जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
    पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
    जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ चिर सजग निरन्तर जागरूक रहना; उनींदी-नींद से भरी,
अलसाई, व्यस्त अव्यवस्थित, बाना–वेश; अचल-द्रढ़, स्थिर, हिमगिरि हिमालय; अलसित-व्योम-शून्य आकाश; आलोक-प्रकाश; तिमिर-अन्धकार; विद्युत-शिखा बिजली की चमक, निठुर-कठोर, निष्ठुर।।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘गीत-1’ शीर्षक कविता से उद्धृत है, जो उनके काव्य संग्रह ‘सान्ध्यगीत’ से लिया गया है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कवयित्री अपने साधना-पथ में तनिक भी आलस्य नहीं आने देना चाहती हैं तथा इस पथ पर निरन्तर धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहने के लिए अपने प्राणों को सम्बोधित कर रही हैं।
व्याख्या कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे प्राण! निरन्तर जागरूक रहने वाली आँखें आज नींद से भरी अर्थात् आलस्ययुक्त क्यों हैं? तुम्हारा वेश आज इतना अव्यवस्थित क्यों है? आज अलसाने का समय नहीं। आलस्य एवं प्रमाद को छोड़कर अब तुम जाग जाओ, क्योंकि तुम्हें बहुत दूर जाना है। तुम्हें अभी बहुत बड़ी साधना करनी है। चाहे आज दृढ़ हिमालय कम्पित हो जाए या फिर आकाश से प्रलयकाल की वर्षा होने लगे अथवा घोर अन्धकार प्रकाश को निगल जाए या चाहे चमकती और कड़कती हुई बिजली
में से तूफान बोलने लगे, तो उस विनाश वेला में भी तुम्हें अपने चिह्नों को छोड़ते चलना है और किसी भी परिस्थिति में साधना-पथ से विचलित नहीं होना है। महादेवी जी पुनः अपने प्राणों को उद्बोधित करती हुई कहती हैं कि हे प्राण! तुझे साधना-पथ पर चलते हुए लक्ष्य प्राप्त करना है। अब तू जाग जा, क्योंकि तुझे बहुत दूर जाना है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने साधना के मार्ग में आने वाली विविध – बाधाओं का प्रतीकात्मक शब्दावली में उल्लेख किया है।
(ii) रस वीर

कला पक्ष
भाषा शुद्ध खड़ीबोली शैली गीतात्मक, प्रतीकात्मक छन्द मुक्त
अलंकार मानवीकरण गुण ओज एवं प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 2 बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
    पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?…
    विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
    क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
    तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
    जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ मोम के बन्धन-मोम के समान शीघ्र नष्ट हो जाने वाले अस्थिर बन्धन; सजीले-सुन्दर; पर-पंख; क्रन्दन-रूदन; मधप-भौरा; कारा-जेल।।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में महादेवी वर्मा ने साधना मार्ग में उत्पन्न होने वाली विभिन्न बाधाओं व कठिनाइयों का उल्लेख किया है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि हे प्राण! क्या मोम के समान शीघ्र नष्ट (पिघलना) हो जाने वाले अस्थिर, परन्तु सुन्दर सांसारिक बन्धन तुम्हें बाँधकर साधना मार्ग में बाधा उत्पन्न कर देंगे? क्या तितलियों के पंखों के समान यह रंगीन संसार का आकर्षण तुम्हारे मार्ग में बाधा बन जाएगा? क्या सांसारिक क्रन्दन या रूदन की ध्वनि भौरे की मधुर [जार को सुनने में बाधा उत्पन्न करेगी अर्थात् तुम्हारे साधना मार्ग को अवरुद्ध करेगी? क्या पुष्पों (फूलों) की पंखुड़ियों पर पड़ी हुई मोतीरूपी ओस की बूदों का सौन्दर्य तुम्हें स्वयं में लिप्त करके या डुबोकर साधना-पथ से विचलित कर देगा? कवयित्री अपने प्राण (प्रिय) को प्रेरित करते हुए कहती है, तुम इन बातों से विमख रहो। यह सभी बातें निरर्थक हैं, इनमें से कुछ भी तुम्हारे साधना मार्ग को अवरुद्ध नहीं कर सकते। तुम अपनी प्रतिछाया को अपना बन्धन मत बनाना अर्थात संसार के विविध आकर्षण तो तुम्हारे छाया मात्र हैं। अतः उन आकर्षणों के माया-जाल के बन्धन में बँधकर तुम अपने वास्तविक लक्ष्य (साधना मार्ग) को भूल न जाना। महादेवी जी पुनः अपने प्राणों को उद्बोधित । करती हई कहती हैं कि हे प्राण! आलस्य त्याग कर अब तू जाग जा, क्योंकि तझे बहत दर जाना है तथा साधना मार्ग के अनेक चरणों (सोपानों) को पार। करके अपने लक्ष्य (ईश्वर प्राप्ति) को प्राप्त करना है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने अपने प्रिय को उद्बोधित करते हुए लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ने के लिए अभिप्रेरित किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा शुद्ध एवं साहित्यिक खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त अलंकार रूपक एवं अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 वज्र का उर एक छोटे अश्रुकण में धो गलाया,
    दे किसे जीवन-सुधा दो घूट मदिरा माँग लाया?
    सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
    विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?
    अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
    जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ वज्र-कठोर; उर-हृदय; अश्रुकण-आँसू की बूंद; जीवन-सुधा-जीवन का अमृत; मलय की बात-मलय (चन्दन) पर्वत से आने वाली शीत और सुगन्धित वायु; उपधान-तकिया; अमरता-सुत-अमृत पुत्र

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री साधना मार्ग पर चलने वाले साधक का। उदबोधित करती हुई कह रही हैं कि हे साधक! तू इस सांसारिक मोह में पड़कर। अपनी साधना से कभी विचलित नहीं होना।

व्याख्या महादेवी वर्मा साधक को उद्बोधित करते हुए कहती हैं कि हे साधक . तेरा हृदय जो वज्र के समान कठोर अर्थात् दृढ़-निश्चयी था, वह आज प्रियजनों के जरा-से रोने भर से पिघल गया है अर्थात् तू अपने साधना-मार्ग पर आगे बढ़ने के। निश्चय से विचलित हो गया है। तेरे अन्तर्मन में अपार शक्ति व साहस विद्यमान था,
किन्तु तूने भावनाओं के आवेग में उठे आँसुओं में गलाकर उसको नष्ट कर दिया है। तूने अपने जीवन की अमृतरूपी शक्ति और साहस को त्यागकर तथा साधनामय जीवन को छोड़कर मदिरापान करने वाले व्यक्ति के समान तुच्छ और आलस्य का जीवन जीना कहाँ से सीख लिया है? ये सब कार्य निरर्थक थे, जो तेरे योग्य नहीं थे।
मलय पर्वत से आने वाली हवा का तकिया लगाकर तेरे उत्साह की आँधी क्यों विश्राम करने लगी है, तू सांसारिक आकर्षण में पड़कर अपनी साधना के उत्साह को क्यों शिथिल (कमजोर) बना रहा है? क्या सांसारिकता के सभी आकर्षण तुझे आलस्य की नींद सुलाने तो नहीं आ गए हैं? तेरा आलस्य तेरी साधना-जीवन के लिए अभिशाप बनकर उसे नष्ट कर देगा। हे साधक! तू अविनाशी, परमात्मा का अंश है, तू अमर पुत्र है, इसके पश्चात् भी तू सांसारिकता के जीवन-मृत्यु के चक्र में स्वयं को क्यों बन्धक बनाना चाहता है? इसलिए अपने पतन के सभी कारकों को
इस संसार से त्यागकर अपने उत्थान की ओर अग्रसित होते हुए साधना पथ पर आगे बढ़ता चल। अतः हे साधक! तू अपनी अज्ञानतारूपी नींद से जाग, क्योंकि तुझे अभी बहुत दूर जाना है। तुझे साधना मार्ग पर चलते हुए बहुत लम्बा मार्ग तय
करना है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) कवयित्री ने साधक को सांसारिक मोह-माया आदि को त्यागते हुए, साधना पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया है।
(ii) रस वीर

कला पक्ष
भाषा शुद्ध खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त
अलंकार रूपक एवं अनुप्रास गुण ओज शब्द शक्ति लक्षणा

4 कह न ठण्डी सॉस में अब भूल वह जलती कहानी.
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ ठण्डी साँस दुःख की साँसें; जलती कहानी-कष्टों की कहानी; मानिनी सम्मान से युक्त; पताक्-झण्डा, ध्वज; क्षणिक क्षण भर की; । अंगार-शय्या-कष्टमय परिस्थितियाँ।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग कवयित्री ने मनुष्य की आत्मा को साधना-पथ पर बढ़ते रहने की प्रेरणा देते हुए आत्मबल को जगाने का आह्वान किया है।

व्याख्या प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री महादेवी जी का कहना है कि मनुष्य जब अपने उदेश्य की साधना में लगता है, तो उसके सामने अकर्मण्यता एवं आलस्य उसके शत्रु बनकर खड़े हो जाते हैं। वस्तुतः जीवन में दुःख भी आता है और परिस्थितियों का दारुण आक्रमण भी होता है, परन्तु मनुष्य को उन्हें भूलकर ऊँचे
लक्ष्य को प्राप्त करने की साधना में निरन्तर लगे रहना चाहिए। वे कहती हैं कि उन कष्टों को ठण्डी साँस लेते हुए दोहराने से कोई लाभ नहीं। जब तक हृदय में आग नहीं होती, तब तक मनुष्य की आँखों से टपकते आँसुओं का कोई मूल्य नहीं होता। हृदय की वह आग, वह तड़प ही मनुष्य को कठिन साध्य अर्थात् लक्ष्य प्राप्त
करने के लिए प्रेरित करती है और परमात्मा को पाने का साधन या माध्यम बनती है। कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि यदि उद्देश्य की प्राप्ति हेतु किए गए प्रयत्न में असफलता भी हाथ लगती है, तो वह भी किसी सफलता से, किसी विजय से कम नहीं है। पतंगा अपने उददेश्य के लिए दीपक पर जल कर राख के समान हो जाता
है फिर भी उसकी राख दीपक की लौ से मिलकर अमर हो जाती है। साधक को भी याद अपने उददेश्य की प्राप्ति के लिए मिट जाना पड़े, तो वह भी अमर हो जाएगा। महादेवी जी कहती हैं कि तझे अपनी तपस्या से संसाररूपी इस अंगार-शय्या अथात् कष्टों से भरे इस संसार में फलों की कोमल कलियों जैसी आनन्दमय
परिस्थितियों का निर्माण करना है। इसीलिए हे साधक! तू जाग, क्योंकि अभी तुझे बहुत दूर जाना है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री ने भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों अर्थों के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आत्मबल को प्रेरित करने का प्रयास किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा शुद्ध तथा साहित्यिक खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त अलंकार रूपक, अनुप्रास एवं मानवीकरण
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

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गीत-2

1.पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले वह घिरा घन;
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला!

शब्दार्थ अपरिचिव-अनजान; अमा अमावस्या कज्ज-काजल; तिल
बुझे उदास; आई-गीला; चितव-दृष्टि: दीप खेलम्दीपक से खेलना।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘गीत-2’ शीर्षक कविता से उद्धृत है, जो उनके प्रमुख काव्य-संग्रह ‘दीपशिखा’ से लिया गया है।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में महादेवी वर्मा ने साधना के अपरिचित पथ की कठिनाइयों का वर्णन किया है।

व्याख्या कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि भले ही साधना-पथ
अनजान हो, उस मार्ग पर तुम्हारा साथ देने वाला भी कोई न हो, तब भी तुम्हें घबराना नहीं चाहिए, तुम्हारी स्थिति डगमगानी नहीं चाहिए। महादेवी जी कहती हैं कि मेरी छाया भले ही आज मुझे अमावस्या के गहन अन्धकार के समान घेर ले और मेरी काजल लगी आँखें भले ही बादलों के समान आँसुओं की वर्षा करने लगें, फिर भी चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कठिनाइयों को देखकर जो आँखें सूख जाती हैं, जिन आँखों के तारे निर्जीव व धुंधले हो जाते हैं और निरन्तर, रोते रहने के कारण जिन आँखों की पलकें रूखी-सी हो जाती हैं, वे किसी और की होंगी। मैं उनमें से नहीं हूँ जो विघ्न-बाधाओं से घबरा जाऊँ। अनेक कष्टों के आने पर भी मेरी दृष्टि आर्द्र (गीली) अर्थात आँखों में आँसू रहेंगे ही, क्योंकि मेरे जीवन दीपों ने सैकड़ों विद्यतों में खेलना सीखा है। कष्टों से घबराकर पीछे हट जाना मेरे जीवन-दीप का स्वभाव नहीं है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री का वेदना-भाव भी प्रकट हआ है।
(ii) रस करुण

कला पक्ष
भाषा शुद्ध खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार अनुप्रास एवं भेदकातिशयोक्ति
गुण प्रसाद शब्द लक्षणा

2.अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शूल की संकल्प सारे;
दु:खव्रती निर्माण उन्मद
यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण बेला!

शब्दार्थ शूल-काँटे संकल्प-निश्चय; दु:खवती-दुःख का व्रत धारण
किए हुए; उन्मद-मस्त; अंक-संसृटि-संसार की गोद; तिमि-अन्धकार; स्वर्ण बेल-स्वर्णिम समय।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने प्रिय के पथ के अपरिचित और
अनेक प्रकार के कष्टों से भरे होने के पश्चात् भी निरन्तर आगे बढ़ते रहने का दृढ़ संकल्प किया है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि वे कोई अन्य ही चरण होंगे जो पराजय मानकर राह के काँटों को अपना सम्पूर्ण संकल्प समर्पित करके निराश व हताश होकर लौट आते हैं। मेरे चरण हताश व निराश नहीं हैं। मेरे चरणों ने तो दुःख सहने का व्रत धारण किया हुआ है। मेरे चरण नव निर्माण करने की इच्छा के कारण उन्मद (मस्ती) हो चुके हैं। वे स्वयं को अमर मानकर, प्रिय के पथ को निरन्तरता से नाप रहे हैं और इस प्रकार दूरी घटती चली जा रही
है, जो मेरे और मेरे लक्ष्य अर्थात आत्मा और परमात्मा के मध्य की दूरी थी।

मेरे चरण तो ऐसे हैं कि वे अपनी दृढ़ता से संसार की गोद में छाए हुए। अन्धेरे को स्वर्णिम प्रकाश में बदल देंगे अर्थात् निराशा का अन्धकार आशारूपी प्रकाश में परिवर्तित हो जाएगा। इस प्रकार लक्ष्य प्राप्ति हो सकेगी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने दृढ़ संकल्प, साधना की दृढ़ता और अडिग आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति की है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा शुद्ध खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार रूपक एवं भेदकातिशयोक्ति
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 दूसरी होगी कहानी,
    शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी,
    आज जिस पर प्रलय विस्मित,
    मैं लगाती चल रही नित,
    मोतियों की हाट औ
    चिनगारियों का एक मेला!

शब्दार्थ शून्य-रिक्त, खाली; धूलि-धूल; प्रलय-सृष्टि का विनाश;
विस्मित-आश्चर्यचकित होना; हाट-बाजार।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है, जिससे साधक के मन में उत्साह जाग्रत हो जाए।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि वह कोई दूसरी कहानी होगी, जिसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना ही प्रिय के स्वर शान्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों के पैरों के चिह्नों को समय मिटा देता है। ऐसे लोगों का जीवन तो व्यर्थ ही होता है, मेरी कहानी तो इसके विपरीत है। मैं जब तक अपने लक्ष्य अर्थात् परमात्मा को प्राप्त न कर लूँगी, तब तक मेरा साधना स्वर शान्त नहीं होगा। साधना के इस कठिन पथ पर मेरा चलना भी अनजाना नहीं होगा। वह कहती है कि मैं अपने दृढ निश्चय अर्थात अपने संकल्प से अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा उस पथ पर ऐसे पद चिह्नों का निर्माण कर जाऊँगी, जिन्हें मिटाना समय की धूल के लिए भी दुष्कर होगा। मैं अपने संकल्प से उस
परमात्मा को प्राप्त करके ही रहूँगी। मेरे इस निश्चय से स्वयं प्रलय भी आश्चर्यचकित है। उस प्रियतम परमात्मा को प्राप्त करने के लिए मैं अपने मोतियों के समान आँसूओं के खजाने का घर अर्थात् बाजार लगा रही हूँ। इन मोती जैसे आँसूओं की चमक मेरे जैसे अन्य साधकों में भी ईश्वर प्राप्ति की चिंगारियाँ अर्थात अलख जगा देगी जिससे वे भी ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाएँगे।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) अपना सर्वस्व न्योछावर करके ईश्वर को प्राप्त करने के भाव की अभिव्यक्ति की गई है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा खडीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त
अलंकार रूपक एवं मानवीकरण गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 4 हास का मधु दूत भेजो,
    रोष की भ्र-भंगिमा पतझार को चाहे सहेजो।
    ले मिलेगा उर अंचचल,
    वेदना-जल, स्वप्न-शतदल,
    जान लो वह मिलन एकाकी
    विरह में है दुकेला!
    पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!

शब्दार्थ हास का मधु दूत-मुस्कानरूपी दूत; रोष-क्रोध; भू-भंगिमा-भौंहों की वक्रता; उर-हृदय; स्वप्न-शतदल-स्वप्नों का कमल; एकाकी-अकेला; विरह-वियोग: पंथ-मार्ग।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री द्वारा अपने प्रिय से मिलने के लिए दृढ़ संकल्प की अभिव्यक्ति की गई है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि हे प्रिय! तुम मुझे अपनी ओर आकर्षित करने के लिए चाहे मुस्कानरूपी दूत भेजो या फिर क्रोधित होकर मेरे जीवन में पतझड़-सी नीरवता का संचार कर दो अर्थात् चाहे तुम मुझ से प्रसन्न हो जाओ या अप्रसन्न, किन्तु मेरे हृदय के प्रदेश में तुम्हारे लिए कोमल भावनाएँ बनी रहेंगी। मैं अपने हृदय की मधुर और कोमल भावनाओं से सिक्त वेदना के जल और स्वप्नों का कमल पुष्प लिए तुम्हारी सेवा में सदैव उपस्थित रहूँगी। मैं तुम्हें अवश्य प्राप्त कर लूंगी। हे प्रिय तुमसे मिलने के उपरान्त मेरा स्वतन्त्र अस्तित्व । समाप्त हो जाता है, मुझे तुमसे पृथक् स्वयं की कोई स्वतन्त्र सत्ता की अनुभूति नहीं होती, किन्तु वियोग की स्थिति में यह अनुभूति और अधिक बढ़ जाती है। है। प्रियतम! यद्यपि तुम्हें प्राप्त करने का मार्ग अत्यन्त कठिन और अपरिचित है, किन्तु मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि मैं तुम्हें अपने दृढ संकल्प से अवश्य प्राप्त कर लूँगी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) अपने प्रिय को प्राप्त करने के लिए कवयित्री को दुर्गम और अपरिचित मार्ग पर चलने के लिए भी तैयार है वह उसे किसी भी स्थिति में प्राप्त करना चाहती है।
(ii) रस शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त
अलंकार रूपक एवं अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

गीत-3

  1. मैं नीरभरी दुःख की बदली!
    स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा,
    क्रन्दन में आहत विश्व हँसा,
    नयनों में दीपक से जलते
    पलकों में निर्झरिणी मचली!’

शब्दार्थ नीर-पानी; स्पन्दन-कम्पन; चिर-स्थायी; निस्पन्द-जिसमें कम्पन न हो; क्रन्दन-रुदन; आहत-दु:खी होना; निर्झरिणी-नदी।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित महादेवी वर्मा । नारा रचित ‘गीत 3’ शीर्षक गीत से उद्धृत हैं, जो उनके प्रमुख काव्य संग्रह । ‘सान्ध्यगीत’ से लिया गया है।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में महादेवी वर्मा स्वयं की तुलना बादलों से करते हुए, अपनी विरह वेदना का वर्णन करती हैं।

व्याख्या कवयित्री स्वयं की तुलना बादलों से करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार बादल पानी से भरे रहते हैं, उसी प्रकार उसकी आँखों में भी सदैव आँसू भरे रहते हैं अर्थात् उसका जीवन दुःखों से घिरा हुआ है। वह कहती हैं जिस प्रकार बादलों में सदैव कम्पन अर्थात् गतिशीलता विद्यमान रहती है, उसी प्रकार विरह से उत्पन्न दुःख ने भी उसके जीवन में स्थायित्व गृहण कर लिया है। वह कहती हैं, जिस प्रकार बादलों के गर्जन से सम्पूर्ण विश्व में प्रसन्नता छा
जाती है, उसी प्रकार उसके प्रियतम की विरह वेदना में दुःखी होने से लोगों को प्रसन्नता की अनुभूति होती है। वह आगे कहती है कि उसकी आँखों से प्रियतम की विरह वेदना के कारण ही सदैव आँसुओं की नदी बहती रहती है, किन्तु फिर भी उसके आँखों में प्रियतम से मिलने की आशा विद्यमान है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) इस पद्यांश का भावार्थ यह है कि कवयित्री अपने प्रियतम के विरह में अत्यन्त दुःखी हैं, किन्तु फिर भी उसने अपने हृदय में उससे (प्रियतम)। मिलने की आस (आशा) बाँधी हुई है।
(ii) रस वियोग शृंगार

कला पक्ष
” शुद्ध, परिष्कृत खडीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
अलंकार उपमा, रूपक एवं मानवीकरण शब्द शक्ति लक्षणा
छन्द मुक्त गुण माधुर्य

  • 2 मेरा पग पग संगीत भरा,
    श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
    नभ के नव रँग बुनते दुकूल,
    छाया में मलय-बयार पली!

शब्दार्थ पराग-पुष्परज (वह धूल जो फूलों के बीच लम्बे केसरों पर जमी रहती है); नभ-आकाश; दुकूल-दुपट्टा; बयार-हवा।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने बादल से अपनी तुलना करते हुए, अपनी विरह वेदना का वर्णन किया है।

व्याख्या कवयित्री बादल से अपनी तुलना करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार बादल मन्द-मन्द गति से बहता है और उसके बहने और उसके गर्जन में संगीत भरा होता है, उसी प्रकार मेरा जीवन भी प्रियतम की स्मृतियों के संगीत से भरा है। कवयित्री कहती हैं कि जिस प्रकार बादलों की परिणति उनका बरसना होता है, उसी प्रकार मेरे जीवन में भी तुम्हारी मधुर स्मृतियाँ बसी हुई हैं। वह कहती है कि जैसे बादलों के बरसने के उपरान्त आकाश में निकला इन्द्रधनुष उसके आँचल के समान लगता है तथा उस समय मलय पर्वत की शीतल हवा के समान बहने वाली वायु से ऐसा प्रतीत होता है; जैसे-वह इसी आँचल की छाया में पली हो और वही उसका उद्गम स्थल हो। ठीक इसी प्रकार प्रियतम की स्मृतियाँ मेरे जीवन में इन्द्रधनुष के समान नव रंगों का और मलय पर्वत के समान शीतलता का संचार करती हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(1) प्रियतम की स्मृतियों को जीवन में खुशियों व आनन्द की अनुभूति करवाने वाला कहा गया है।
(i) रस वियोग श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा शुद्ध, परिष्कृत खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार मानवीकरण, पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 मैं क्षितिज-भृकुटी पर घिर धूमिल,
    चिन्ता का भार बनी अविरल,
    रज-कण पर जल-कण हो बरसी
    नव जीवन-अंकुर बन निकली!

शब्दार्थ क्षितिज्ञ-वह स्थान जहाँ पृथ्वी और आकाश मिलते से प्रतीत होते हैं; भृकुटी-भौंह; धूमिल-धुंधला; अविरल-निरन्तर; रज-धूल।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने अपने जीवन और बादल की स्थिति में साम्य प्रस्तुत किया है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि जिस प्रकार जल के भार से नभ में झके हए बादलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे उसकी भौहें हो और उसकी चिन्तित अवस्था को अभिव्यक्त कर रही हो। उसी प्रकार प्रिय के विरह और उससे मिलन की आस के कारण वह सदैव चिन्तित रहती है। वह कहती है, जिस प्रकार बादल पानी के अत्यधिक भार को सहन न कर पाने के कारण पृथ्वी पर
बरसते हैं और उनमें नवजीवन का संचार होता है, उसी प्रकार चिन्ताग्रस्त कवयित्री के नयनों से जब अश्रुओं की वर्षा होती है, तो वह चिन्तामुक्त हो उठती। है और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे-उसमें नव-जीवन का संचार हो गया हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) इस पद्यांश का भावार्थ यह है कि प्रिय के विरह में व्यथित कवयित्री की हृदयगत करुणा की अभिव्यक्ति हुई है।
(ii) रस वियोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा शुद्ध, परिष्कृत खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त छन्द अलंकार मानवीकरण, रूपक
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 4 पथ को न मलिन करता आना
    पद-चिह्न न दे जाता जाना,
    मेरे आगम की जग में
    सुख की सिरहन हो अन्त खिली!
    शब्दार्थ मलिन-मैला; सुधि-स्मरण, याद; आगम-आना; सिरहन-कम्पन।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने बादल और स्वयं के जीवन में साम्य स्थापित किया है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश में बादल के छाने से वह मलिन नहीं होता अर्थात उस पर किसी प्रकार का कोई कलंक नहीं लगता और न ही उसके जाने के पश्चात् अर्थात् उसके बरसने के बाद उसका कोई पद-चिह्न या निशान शेष रह जाता है, लेकिन उसके आकाश में छाने के स्मरण मात्र से ही सम्पूर्ण विश्व अर्थात् सभी लोगों में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है।
उसी प्रकार कवयित्री ने अपने सम्पूर्ण जीवन में ऐसा कोई कृत्य नहीं किया, जिससे उसके जीवनपथ पर कोई कलंक लगा हो। वह बिना कोई चिह्न छोड़े उसी प्रकार गई जैसी निष्कलंक वह आई थी। उसके इसी गुण के कारण ही जब भी उसके इस संसार में आने की स्मतियाँ लोगों के मस्तिष्क में आती हैं, वे उनमें खुशी की सिरहन (कम्पन) पैदा कर देती हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) जीवन पथ को बादल के समान ही निष्कलंक बनाना चाहिए।
(ii) रस वियोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा शुद्ध, परिष्कृत खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त अलंकार मानवीकरण और अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा।

  • 5 विस्तृत नभ का कोई कोना,
    मेरा न कभी अपना होना,
    परिचय इतना इतिहास यही
    उमड़ी कल थी मिट आज चली!
    मैं नीर भरी दुःख की बदली!

शब्दार्थ विस्तृत -फैला हुआ, चारों ओर व्याप्त,नीर -आँसू।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री बादल से स्वयं की तुलना करती हुई अपने । जीवन की व्याख्या प्रस्तुत करती है।

व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश के अत्यधिक विस्तृत भाग में फैले हुए होने के उपरान्त भी बादल को वहाँ पर स्थायित्व प्राप्त नहीं होता और अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में इधर-उधर घूमता रहता है, उसी प्रकार मुझे भी इस विशाल भू-भाग अर्थात् संसार में स्थायित्व प्राप्त नहीं हुआ। वह आगे कहती हैं कि जैसे बादल का अस्तित्व केवल उसके निर्मित होने और बरसने तक
ही होता है और वही उसकी पहचान एवं उसका इतिहास बन जाता है, उसी प्रकार कवयित्री की पहचान एवं इतिहास केवल इतना ही है कि वह कल आई थी और आज जा रही है, यही उसका सम्पूर्ण जीवन है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) बादल के जीवन के माध्यम से जीवन की क्षण भंगुरता को वर्णित किया है।।
(ii) रस वियोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा शुद्ध, परिष्कृत खड़ीबोली शैली गीतात्मक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार मानवीकरण एवं अनुप्रास
गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएंगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

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गीत-1

  1. चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
    जाग तुझको दूर जाना!
    अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
    या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
    आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
    जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
    पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
    जाग तुझको दूर जाना!
    बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
    पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?.
    विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
    क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
    तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
    जाग तुझको दूर जाना!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) पद्यांश की कवयित्री व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर पद्यांश की कवयित्री छायावादी रचनाकार महादेवी वर्मा हैं तथा काव्यांश का शीर्षक ‘गीत’ है।

(ii) कवयित्री आँखों से क्या प्रश्न करती हैं?
उत्तर कवयित्री आँखों से प्रश्न करती हैं कि हे! निरन्तर जागरूक रहने वाली आँखें आज नींद से भरी अर्थात् आलस्ययुक्त क्यों हो? तुम्हारा वेश आज इतना अव्यवस्थित क्यों है? आज अलसाने का समय नहीं है, इसलिए आलस्य एवं प्रमाद को छोड़कर अब तुम जाग जाओ, क्योंकि तुम्हें बहुत दूर जाना है।

(iii) कवयित्री साधना पथ पर चलते हुए कौन-कौन सी कठिनाइयों के आने की बात कहती हैं?
उत्तर कवयित्री कहती हैं कि साधना-पथ पर चलते हुए दृढ़ हिमालय कम्पित हो जाए, आकाश से प्रलयकारी वर्षा होने लगे, घोर अन्धकार प्रकाश को निगल जाए या चाहे चमकती और कड़कती हुई बिजली से तूफान आने लगे, लेकिन तुम अपने पथ से विचलित मत होना और आगे बढ़ते रहना।

(iv) बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तत पंक्ति के माध्यम से कवयित्री अपने प्रिय से प्रश्न करती हैं कि क्या मोम के समान शीघ्र नष्ट हो जाने वाले अस्थिर, अस्थायी, परन्तु सुन्दर एवं अपनी ओर आकर्षित करने वाले ये सांसारिक बन्धन तुम्हें तुम्हारे पथ से विचलित कर देंगे?

(v) कवयित्री अपने प्रिय को प्रेरित करते हए क्या कहती हैं?
उत्तर कवयित्री अपने प्रिय को साधना-पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने के लिए कहती हैं कि तुम्हारे मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ आएँगी, विभिन्न सांसारिक आकर्षण तुम्हें अपनी ओर आकर्षित करेंगे, तुम्हें भावनात्मक रूप से कमजोर करेंगे, लेकिन इनसे विचलित न होना और आगे बढ़ते रहना।

2 कह न ठण्डी साँस में अब भल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) मनुष्य को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर कवायत्री कहती हैं कि मनष्य के समक्ष अकर्मण्यता एवं आलस्य जैसे अवगुण शत्रु बनकर खड़े हो जाते हैं। वस्तुतः मनुष्य को जीवन में आने वाल दुखों एवं कठिन परिस्थितियों आदि को भूलकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

(ii) लक्ष्य या परमात्मा को प्राप्त करने का साधन क्या बनता है? ।
उत्तर कवयित्री का मानना है कि जब तक हृदय में किसी लक्ष्य को पाने की इच्छा नहीं होती, तब तक मनुष्य की आँखों से टपकते आँसुओं का कोई मूल्य नहीं होता। लक्ष्य को प्राप्त करने की तड़प ही मनुष्य को प्रेरित करती है और परमात्मा को पाने का साधन या माध्यम बनती है।

(iii) कवयित्री ने पतंगे का उदाहरण क्यों दिया है?
उत्तर पतंगा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास करता है और उसे प्राप्त करने के क्रम में समाप्त हो जाता है। कवयत्री पतंगे के इसी गुण से मनुष्य को अवगत कराने के लिए उसका उदाहरण देती हैं, ताकि मनुष्य भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास करें।

(iv) कवयित्री ‘अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाने के माध्यम से क्या कहना चाहती हैं?
उत्तर अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाने’ के माध्यम से कवयित्री यह कहना चाहती हैं कि साधक तुझे अपनी तपस्या से संसार रूपी इस अंगार-शय्या अर्थात कष्टों से भरे इस संसार में फूलों की कोमल कलियों जैसी आनन्दमय परिस्थितियों का निर्माण करना है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत काव्यांश की भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है, जो भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। भाषा सहज, सरल, प्रवाहमयी एवं प्रभावमयी है। इस पद्यांश में लयात्मकता एवं तुकान्तता का गुण विद्यमान है, जिसके कारण इसकी शैली गेयात्मक हो गई है।

गीत-2

  • 1 पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! ।
  • घेर ले छाया अमा बन, आज कज्जल-अश्रुओं में
  • रिमझिमा ले वह घिरा घन; और होंगे नयन सूखे,
  • तिल बुझे औ पलक रूखे, आर्द्र चितवन में यहाँ शत
  • विद्युतों में दीप खेला! अन्य होंगे चरण हारे,
  • और हैं जो लौटते, दे शूल की संकल्प सारे;
  • दुःखव्रती निर्माण उन्मद यह अमरता नापते पद,
  • बाँध देंगे अंब सृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!
UP Board Syllabus
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस काव्य संग्रह में संकलित है एवं उसके रचनाकार का नाम लिखिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश गीत-2 कविता से लिया गया है, जो दीपशिखा काव्य संग्रह में संकलित है। इसकी रचनाकार महादेवी वर्मा हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका किस पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान करती है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका साधना के अपरिचित पथ पर बिना घबराहट एवं डगमगाहट के आगे बढ़ने का आह्वान करती है।

(iii) महादेवी के जीवन रूपी दीप का स्वभाव कैसा नहीं है? ।
उत्तर महादेवी वर्मा के जीवन रूपी दीप का स्वभाव कष्टों एवं कठिनाइयों से घबराकर साधनों पथ से पीछे हट जाना नहीं है, क्योंकि उनके जीवन रूपी दीप ने सैकड़ों विद्युतों रूपी कठिनाइयों को झेलते हुए आगे बढ़ना सीखा है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका का क्या उददेश्य है?
उत्तर निराश व हताश न होने का संकल्प करके आत्मा परमात्मा के मिलन के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ना ही लेखिका का उद्देश्य है।

(v) अंक संसृति एवं ‘तिमिर’ शब्द का अर्थ लिखिए।
उत्तर अंक संसृति = संसार की गोद तिमिर = अन्धकार

  • 2 दूसरी होगी कहानी, शून्य में जिसके मिटे स्वर,
    धूलि में खोई निशानी, आज जिस पर प्रलय विस्मित,
    मैं लगाती चल रही नित,
    मोतियों की हाट औ चिनगारियों का एक मेला!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखिका के अनुसार दूसरी कहानी क्या है?
उत्तर लेखिका के अनुसार जिसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना ही जिस साधक के स्वर क्षीण हो जाते हैं तथा जिनके पद-चिह्नों को समय मिटा देता है वह कोई दूसरी कहानी होगी।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में किस भाव की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में साधक द्वारा अपना सर्वस्व न्योछावर करके ईश्वर को प्राप्त करने के भाव की अभिव्यक्ति हुई है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका ने क्या दृढ़ संकल्प लिया है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका ने आध्यात्मिक शक्ति द्वारा मार्ग की विभिन्न बाधाओं को पार करके ईश्वर रूपी प्रिय को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प लिया है।

(iv) लेखिका परमात्मा रूपी प्रियतम की प्राप्ति के लिए किसका बाजार लगा रही
उत्तर लेखिका परमात्मा रूपी प्रियतम की प्राप्ति के लिए मोतियों रूपी आँसुओं का बाजार लगा रही है, जिसमें वह इन आँसुओं की चमक से अन्य साधकों में भी ईश्वर प्राप्ति की चिंगारियाँ जगाने में सफल रही है।

(v) ‘शून्य एवं आज’ शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर शून्य = अनन्त
आज = कल।

गीत-3

  • 1 पथ को न मलिन करता आना
  • पद-चिह्न न दे जाता जाना,
  • मेरे आगम की जग में
  • सुख की सिरहन हो अन्त खिली!
  • विस्तृत नभ का कोई कोना,
  • मेरा न कभी अपना होना,
  • परिचय इतना इतिहास यही
  • उमड़ी कल थी मिट आज चली!
  • मैं नीर भरी दुःख की बदली!
उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवयित्री अपने जीवन की तुलना किससे व क्यों करती हैं?
उत्तर कवयित्री आकाश में छाए बादलों से तुलना करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश में बादलों के छाने से वह मलिन नहीं होता और न ही बरसने के पश्चात्। उसका कोई पद चिह्न शेष रहता है, उसी प्रकार कवयित्री का जीवन भी निष्कलंक है। वह जैसे आई थी वैसे ही लौट रही है।

(ii) कवयित्री का स्मरण लोगों में खुशियाँ क्यों बिखेर देता है?
उत्तर कवयित्री अपने व्यक्तित्व की तुलना आकाश में छाने वाले बादलों से करते हुए स्वयं को निष्कलंक मानती हैं। अपने इसी गुण के कारण जब भी उसका स्मरण लोगों के मस्तिष्क में होता है, तो वह उसमें खुशी की सिहरन पैदा कर देता है।

(iii) ‘विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति से कवयित्री का आशय यह है कि जिस प्रकार इस विशाल आकाश में बादल घूमता रहता है, वहाँ पर उसे कोई स्थायित्व प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार स्वयं कवयित्री का जीवन भी है, जिसे इस विशाल जगत् में स्थायित्व प्राप्त नहीं हुआ।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर प्रस्तुत काव्यांश में कवयित्री ने बादल से ही जीवन की साम्यता प्रस्तुत करके उसी क्षणक भंगुरता को उजागर करने का प्रयास किया है, साथ ही वह यह सन्देश देना चाहती हैं कि मनुष्य जीवन निष्कलंक होना चाहिए, ताकि उसका स्मरण होने पर लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाए।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर कवयित्री ने सम्पूर्ण पद्यांश में बादल को मनुष्य के रूप में प्रकट करके उसका मानवीकरण कर दिया है, जिस कारण सम्पूर्ण पद्यांश में। मानवीकरण अलंकार है। इसके अतिरिक्त पद-चिह्न न दे जाता जाना, में। ‘ज’ वर्ण की आवृत्ति, ‘सुख की सिहरन हो’ में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति, व ‘परिचय इतना इतिहास यही’ में ‘इ’ वर्ण की आवृत्ति के कारण पद्यांश म अनुप्रास अलंकार भी विद्यमान है।

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