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khand-kh sanskrt • kaavy saundary ke tattv . sanskrt vyaakaran

UP board Master महर्षि दयानन्द महर्षि दयानन्द

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी खण्ड-ख संस्कृतमहर्षि दयानन्दः (महर्षि दयानन्द)
Chapter 7
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

गद्यांशों का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद

प्रश्न-पत्र में संस्कृत के पाठों (गद्य व पद्य) से दो गद्यांश व दो श्लोक दिए जाएँगे, जिनमें से एक गद्यांश व एक श्लोक का सन्दर्भ
सहित हिन्दी में अनुवाद करना होगा, दोनों के लिए 5-5 अंक निर्धारित हैं।

1.सौराष्ट्रप्रान्ते टङ्कारानाम्नि ग्रामे श्रीकर्षणतिवारीनाम्नो धनाढ्यस्य औदीच्यविप्रवंशीयस्य धर्मपत्नी शिवस्य पार्वतीव भाद्रपदमासे नवम्यां तिथौ गुरुवासरे मूलनक्षत्रे एकाशीत्युत्तराष्टादशशततमे (1881) वैक्रमाब्दे पुत्ररत्नमजनयत्।। जन्मतः दशमे दिने ‘शिवं भजेदयम्’ इति बुद्धया पिता स्वसुतस्य मूलशङ्कर इति नाम अकरोत् अष्टमे वर्षे चास्योपनयनमकरोत्। त्रयोदशवर्ष प्राप्तवतेऽस्मै मूलशङ्कराय पिता शिवरात्रिव्रतमाचरितुम् अकथयत्। पितुराज्ञानुसारं मूलशङ्करः
सर्वमपि व्रतविधानमकरोत्। रात्रौ शिवालये स्वपित्रा समं सर्वान् निद्रितान् विलोक्य स्वयं जागरितोऽतिष्ठत् शिवलिङ्गस्य चोपरि
मूषिकमेकमितस्तत: विचरन्तं दृष्ट्वा शङ्कितमानस: सत्यं शिवं सुन्दरं लोकशङ्करं शङ्करं साक्षात्कर्तुं हृदि निश्चितवान्। ततः
प्रभृत्येव शिवरात्रे: उत्सव: ‘ऋषिबोधोत्सवः’ इति नाम्ना श्रीमद्दयानन्दानुयायिनाम् आर्यसमाजिनां मध्ये प्रसिद्धोऽभूत्।।

शब्दार्थ सौराष्ट्रमान्-सौराष्ट्र प्रान्त में प्राग्रे गाँव में धनाढ्यस्म-धनिक की; औदीच्यविप्रवंशीयस्म् औदीच्य ब्राह्मण वंश के;
पार्वतीव-पार्वती की तरह; गुरुवास-गुरुवार को अजनय-जन्म दिया; जन्मत-जन्म से; दशमे दिने-दशवें दिन; इति-ऐसा;
बुद्धय-विचार कर, उपनय-यज्ञोपवीत; रात्र-रात्रि में विलोक्य-देखकर; मूषिकर-चूहा; इतस्तत-इधर-उधर; विवर-
घूमता हुआ; दृष्ट्वम्-देखकर; ह-िहृदय में ततः प्रभृत्येक-तब से लेकर ही; शिवरात्रे-शिव रात्रि का; नाम्ना-नाम से; मध्ये
बीच में।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के ‘महर्षिर्दयानन्दः’ नामक पाठ से उद्धृत है।

अनुवाद सौराष्ट्र-प्रान्त के टंकारा नामक ग्राम में उत्तरी ब्राह्मणवंश के श्रीकर्षण तिवारी नामक धनसेठ की पत्नी ने, (भगवान) शिव की पत्नी पार्वती की भाँति विक्रम सम्वत् 1881 के भाद्रपद मास की नवमी तिथि, गुरुवार को मूल नक्षत्र में पुत्ररत्न को जन्म दिया। ‘यह (भगवान) शिव को भजे’ ऐसा विचार कर पिता ने जन्म के दसवें दिन अपने पुत्र का नाम ‘मूलशंकर’ रखा तथा आठवें वर्ष में इनका यज्ञोपवीत संस्कार किया। तेरह वर्ष पूर्ण होने पर मूलशंकर को पिता ने शिवरात्रि का व्रत रखने के लिए कहा। पिता की आज्ञा के अनुसार मूलशंकर ने व्रत के समस्त विधान (पूर्ण) किए।
रात्रि में शिवालय में अपने पिता संग सबको सोया देख ये स्वयं जागे बैठे रहे तथा शिवलिंग पर एक चूहे को इधर-उधर घूमता देख इनका मन सशंकित हो उठा। (इन्होंने) सत्यम् शिवम्-सुन्दरम् लोक मंगलकारी (भगवान) शंकर का साक्षात्कार करने का हृदय में निश्चय किया। तभी से लेकर श्रीमान दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाजियों में शिवरात्रि का उत्सव ‘ऋषिबोधोत्सव’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विशेष महर्षि दयानन्द को ज्ञान प्राप्त होने को ‘ऋषिबोधोत्सव’ नाम से जाना जाता है।

  • 2 यदा अयं षोडशवर्षदेशीयः आसीत् तदास्य कनीयसी भगिनी
    विचिकया पञ्चत्वं गता। वर्षत्रयानन्तरमस्य पितृव्योऽपि दिवङ्गतः।
    द्वयोरनयोः मृत्युं दृष्ट्वा आसीदस्य मनसि-कथमहं कथंवायं लोक:
    मृत्युभयात् मुक्तः स्यादिति चिन्तयतः एवास्य हृदि सहसैव
    वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः। एकस्मिन् दिवसे अस्तङ्गते भगवति भास्वति मूलशङ्करः गृहमत्यजत्।

शब्दार्थ यदा-जब; अयं-यह षोडशवर्षदेशीयः-सोलह वर्ष के ।
आसीत्-थे; कनीयसी-छोटी; भगिनी-बहन; विचिकया-हैजे से;
द्वयोरनयो:-इन दोनों की; दृष्ट्वा -देखकर; मनसि-मन में; चिन्तयत:- सोचते हुए; हदि-हृदय में; सहसैव-अचानक ही, प्रदीप:-दीपक; प्रज्वलित:-जल उठा; एकस्मिन् दिवसे-एक दिन; भगवति भास्वति- भगवान सूर्य; गृहमत्यजत्-गृह-त्याग कर दिया। ।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद जब ये लगभग सोलह वर्ष के थे, (तब) इनकी छोटी बहन की मृत्यु हैजे से हो गई। तीन वर्षों के उपरान्त इनके चाचा भी स्वर्ग सिधार गए। इन दोनों की मृत्यु देख इनके मन में (प्रश्न) उठा कि मृत्यु के भय से कैसे मुझे और कैसे इस जग को मुक्ति मिल सकती है? ऐसा विचार करते हुए इनके हृदय में सहसा वैराग्य का दीपक जल उठा। एक दिन भगवान सूर्य के अस्त होने के उपरान्त
मूलशंकर ने घर त्याग दिया।

  • 3 सप्तदशवर्षाणि यावत् अमरत्वप्राप्त्युपायं चिन्तयन् मूलशङ्करः ग्रामाद् ग्राम, नगरान्नगरं, वनाद् वनं, पर्वतात् पर्वतमभ्रमत् परं नाविन्दतातितरां तृप्तिम्। अनेकेभ्यो विद्वद्भ्यः व्याकरण-वेदान्तादीनि शास्त्राणि योगविद्याश्च अशिक्षत्। नर्मदातटे च पूर्णानन्दसरस्वतीनाम्न: संन्यासिनः सकाशात् संन्यासं गृहीतवान् ‘दयानन्दसरस्वती’ इति नाम च अङ्गीकृतवान्।

शालार्थ सप्तदशवर्षाणि-सत्रह वर्ष:यावत-तक: अमरत्व-अमरता
प्राप्त्युपायं-प्राप्ति के उपाय; चिन्तयन्-विचार करते हुए; अतितरां-
अधिक; विद्वद्भ्यः-विद्वानों से; अशिक्षत्-सीखी।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद मूलशंकर सत्रह वर्ष तक अमरता प्राप्ति के उपाय पर विचार करते हुए गाँव-गाँव, शहर-शहर, वन-वन, पर्वत-पर्वत घूमते रहे, किन्तु अधिक सन्तुष्टि नहीं पा सके। अनेक विद्वानों से व्याकरण, वेदान्त आदि शास्त्र तथा योग-विद्या सीखी। (इन्होंने) नर्मदा नदी के तट पर ‘पूर्णानन्द सरस्वती’ नाम के संन्यासी से
संन्यास ग्रहण कर ‘दयानन्द सरस्वती’ नाम अंगीकार किया।

  • 4 क्रमेण च मथुरानगरादागतेभ्य: जनेभ्यः दण्डिविरजानन्दस्वामिनः पुण्यं यशः श्रावं-श्रावं सप्तदशैकोन-विंशतिशततमे वैक्रमाब्दे असौ भगवत: श्रीकृष्णस्य जन्मभुवं मथुरानगरीमगच्छत्। तत्र गुरुकल्पवृक्षं, वेदवेदाङ्गप्रवीणं, विलोचनमपि आगमलोचनं, साधुस्वभावं गुरुं विरजानन्दमभ्यगच्छत् भक्त्या प्रणम्य च विद्याध्ययनस्य औत्सुक्यं. न्यवेदयत्।

शब्दार्थ क्रमेण-क्रमशः; च-और; जनेभ्य:-मनुष्यों से; पुण्यं-पवित्र;
आवं-श्रावं-बार-बार सुनकर; जन्मभुवं-जन्मभूमि; अगच्छत्-गए;
तंत्र-वहाँ; गुरुकल्पवृक्षं-गुरुरूपी कल्पवृक्ष; विलोचनम-नेत्रहीन;
आगमलोचनम् -शास्त्र या ज्ञान रूपी नेत्रों वाले भक्त्या-भक्तिपूर्वक; प्रणम्य-प्रणाम करके, विद्याध्ययनस्य-विद्याध्ययन की; औत्सुक्यम्- उत्सुकता।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद और एक के बाद एक मथुरा नगर से आने वाले मनुष्यों से दण्डी विरजानन्द स्वामी की पावन कीर्ति को बार-बार सुनकर ये 1916 विक्रम संवत् में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नगरी गए। वहाँ गुरुरूपी कल्पवृक्ष, वेद-वेदाङ्ग में प्रवीण आँखों से अन्धे होते हुए भी, ज्ञानरूपी आँखों वाले, साधु
स्वभाव वाले गुरु विरजानन्द के पास गए और भक्तिपूर्वक प्रणाम करके विद्याध्ययन की इच्छा व्यक्त की।

  • 5 गुरु: विरजानन्दोऽपि कुशाग्रबुद्धिमिमं दयानन्दं त्रीणि वर्षाणि यावत् पाणिनेः अष्टाध्यायीमन्यानि च शास्त्राणि अध्यापयामास। समाप्तविद्यः दयानन्दः परमया श्रद्धया गुरुमवदत्-भगवन् ! अहम् अकिञ्चनतया तनुमनोभ्यां समं केवलं लवङ्गजातमेव समानीतवानस्मि। अनुगृहणातु भवान् अङ्गीकृत्य मदीयामिमां गुरुदक्षिणाम्। ।

शब्दार्थ कुशाग्रबुद्धिमिमं-तीव्र बुद्धिवाले; त्रीणि-तीन; वर्षाणि-वर्ष,
यावत-तक; अन्यानि च-और दूसरे; शास्त्राणि-शास्त्र; अध्यापयामास- अध्ययन कराया; श्रद्धया-श्रद्धा से; गुरुमवदत्-गुरु से कहा; । अकिञ्चनतया-धनहीन होने के कारण; तनमनोभ्यां-शरीर और मन; सम-साथ; लवङ्ग-लौग; समानीतवानस्मि-लाया हूँ: अनुग्रहणातु- अनुगृहीत करें; भवान् -आप; अङ्गीकृत्य-स्वीकार करके; मदीयाम-मेरी:
इमां-इस; गुरुदक्षिणाम्-गुरु-दक्षिणा को।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद गुरु विरजानन्द ने भी इस कुशाग्रबुद्धि वाले दयानन्द को तीन वर्षों तक पाणिनी की अष्टाध्यायी एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन कराया। विद्योपार्जन पूर्ण कर दयानन्द ने (अपने) परम श्रद्धेय गुरु से कहा, “भगवन! मैं दरिद्र होने के कारण (आपके लिए) तन-मन से मात्र कुछ लौंग लाया हूँ। आप मेरी इस गुरुदक्षिणा को स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत (कृतज्ञ) करें।”

6 प्रीत: गुरुस्तमभाषत-सौम्य! विदितवेदितव्योऽसि, नास्ति किमपि
अविदितं तव। अद्यत्वेऽस्माकं देश: अज्ञानान्धकारे निमग्नो वर्तते,
नार्यः अनाद्रियन्ते, शूद्राश्च तिरस्क्रियन्ते, अज्ञानिनः पाखण्डिनश्च
पूज्यन्ते। वेदसूर्योदयमन्तरा अज्ञानान्धकारं न गमिष्यति। स्वस्त्यस्तु ते, उन्नमय पतितान्, समुद्धर स्त्रीजाति, खण्डय पाखण्डम्, इत्येव
मेऽभिलाष: इयमेव च मे गुरुदक्षिणा।

शब्दार्थ प्रीत:-प्रसन्न होकर; अभाषत-कहा; अद्यत्वे-आजकल;
अस्माकं-हमारे; निमग्नो-डूबा; वर्तते-है; नार्य:-स्त्रियों का;
अनाद्रियन्ते-अपमान किया जाता है; शूद्राश्च-और शूद्रों का;
तिरस्क्रियन्ते-तिरस्कार किया जाता है; अज्ञानिन:-मूर्ख पाखण्डिनश्च- और पाखण्डी; पूज्यन्ते-पूजे जाते हैं; अन्तरा-बिना; स्वस्त्यस्तु ते-तुम्हारा कल्याण हो; उन्नमय-उठाओ; पतितान्-पतितों को।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद गुरु ने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा, “सौम्य! तुम जानने योग्य (सभी) बातें जान चुके हो, अब तुम्हें कुछ भी अज्ञात नहीं। इन दिनों हमारा राष्ट्र अज्ञानरूपी अन्धकार में डूबा हुआ है, (आज यहाँ) नारियों का अनादर किया जाता है, शूद्र तिरस्कृत किए जाते हैं और अज्ञानी व पाखण्डी पूजे जाते हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार बिना वेदरूपी सूर्य के उदित हुए दूर नहीं होगा। तुम्हारा कल्याण हो, पतितों को (ऊँचा) उठाओ, स्त्री-जाति का उद्धार करो, पाखण्ड का खण्डन (नाश) करो, यह मेरी अभिलाषा है और यही मेरी गुरुदक्षिणा है।” ।

7 .गुरुणा एवम् आज्ञप्त: महर्षिर्दयानन्दः एतद्देशवासिनो जनान्
उद्धर्तुं कर्मक्षेत्रेऽवतरत्। सर्वप्रथमं हरिद्वारे कुम्भपर्वणि
भागीरथीतटे पाखण्डखण्डिनीं पताकामस्थापयत्। ततश्च
हिमाद्रिं गत्वा त्रीणि वर्षाणि तप: अतप्यत्। तदनन्तरमयं
प्रतिपादितवान्- ऋग्यजुसामाथर्वाणो वेदाः नित्या ईश्वर
कृर्तृकाश्च, ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य-शूद्राणां गुण-कर्मस्वभावैः
विभागः न तु जन्मना, चत्वारः एव आश्रमाः, ईश्वरः एकः एव,
ब्रह्म-पितृ-देवातिथि-बलि-वैश्वदेवाः पञ्च महायज्ञा नित्यं
करणीयाः। ‘स्त्रीशूद्रौ वेदं नाधीयाताम्’ अस्य वाक्यस्य असारतां
प्रतिपाद्य सर्वेषां वेदाध्ययनाधिकार व्यवस्थापयत्। एवमयं
पाखण्डोन्मूलनाय वैदिक धर्मसंस्थापनाय च सर्वत्र भ्रमति स्म।
एवमार्यज्ञानमहादीपो देवो दयानन्दः यावज्जीवनं
देशजात्युद्धाराय प्रयतमानः तदर्थं स्वजीवनमपि दत्तवान्
मुक्तिञ्चाध्यगच्छत् एवमस्य महर्षेः जीवनं
नूनमनुकरणीयमस्ति।

शब्दार्थ गुरुण-गुरु से; एवम् इस प्रकार; आज्ञप्त:-आज्ञा ।
पाए हुए; उद्धर्तु-उद्धार करने के लिए; भागीरथीतटे-गंगा के
किनारे पर पाखण्डखण्डिनी-पाखण्ड का नाश करने वाली;
पताकाम्-ध्वजा को; हिमादि-हिमालय पर; गत्वा-जाकर;
सर्वत्र-सब जगह; भ्रमति स्म-घूमते रहे; महादीपो-महान् दीपक;
यावज्जीवन-जीवन-पर्यन्त प्रयतमानः-प्रयत्न करते हुए;
तदर्थ-उसके लिए; दत्तवान् दे दिया।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

अनुवाद गुरु से इस प्रकार आज्ञा प्राप्त करके महर्षि दयानन्द इस देश के निवासी मनुष्यों के उद्धार के लिए कर्मक्षेत्र में कूद पड़े। सर्वप्रथम हरिद्वार में कुम्भपर्व पर गंगा के किनारे पाखण्ड का नाश करने वाली पताका (ध्वजा) को स्थापित किया। उसके बाद हिमालय पर्वत पर जाकर तीन वर्ष तक तप किया।
इसके बाद उन्होंने प्रतिपादित किया कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद नित्य हैं और ईश्वर द्वारा रचित हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का विभाजन गुण, कर्म और प्रकृति के अनुरूप है, न कि जन्म से। आश्रम चार ही हैं। ईश्वर एक ही है। ब्रह्म, पितृ, देव, अतिथि तथा बलिवैश्वदेव ये पाँच महायज्ञ प्रतिदिन ही करने चाहिए। “स्त्री और शूद्र को वेद नहीं पढ़ने चाहिए”-इस वाक्य की सारहीनता का प्रतिपादन करके सभी के लिए वेद को पढ़ने के अधिकार की व्यवस्था की। इस तरह ये पाखण्ड की समाप्ति के लिए और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए सब जगह घूमते रहे। इस प्रकार आर्य-ज्ञान के महान् दीप देव दयानन्द ने सम्पूर्ण जीवन देश और जाति के उद्धार के लिए कोशिश करते हुए उसके लिए अपना जीवन भी अर्पित कर दिया और मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार इन महर्षि का जीवन निश्चित रूप से अनुकरणीय है।

अति लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-पत्र में संस्कृत के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अति लघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएँगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

  1. महर्षेः दयानन्दस्य जन्मः कस्मिन् स्थाने/ग्रामे अभवत?
    अथवा महर्षेः दयानन्दस्य जन्मभूमिः कुत्र आसीतो.
    अथवा मूलशङ्करस्य जन्म कुत्र अभव?
    उत्तर महर्षेः दयानन्दस्य जन्म सौराष्ट्रप्रान्ते टङ्कारानाम्नि ग्रामे अभवत्।
  2. महर्षेः दयानन्दस्य पितुः नाम किम् आसीत्?
    उत्तर महर्षेः दयानन्दस्य पितुः नाम श्रीकर्षणतिवारी आसीत्।
  3. मूलशङ्करस्य जन्म कस्मिन् मासे अभवत्?
    उत्तर मूलशङ्करस्य जन्म भाद्रपदमासे अभवत्।
  4. मूलशङ्करस्य जन्म कस्मिन् दिने नक्षत्रे च अभवत्?
    उत्तर मूलशङ्करस्य जन्म गुरुवासरे मूलनक्षत्रे च अभवत्।
  5. दयानन्दस्य जनकः ‘मूलशङ्करः’ इति नाम कथं कृतवान्?
    उत्तर ‘शिवं भजेत अयं’ इति विचार्यं दयानन्दस्य जनक: ‘मूलशङ्करः’ इति नाम कृतवान्।
  6. महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं किं नाम आसीत्?
    उत्तर महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं मूलशङ्करः इति नाम आसीत्।
  7. अष्टमे वर्षे कस्य उपनयनम् अभवत्?
    उत्तर अष्टमे वर्षे दयानन्दस्य उपनयनम् अभवत्।
  8. कस्मै पिता शिवरात्रिव्रतमाचरितुम् अकथयत्?
    उत्तर मूलशङ्कराय पिता शिवरात्रिव्रतमाचरितुम् अकथयत्।
  9. शिवरात्रेः व्रतं क: अकरोत्?
    उत्तर शिवरात्रेः व्रतं मूलशङ्करः अकरोत्।
  10. कस्य आज्ञानुसारं मूलशङ्करः सर्वमपि व्रतविधानमकरोत्?
    उत्तर पितुः आज्ञानुसारं मूलयशङ्करः सर्वमपि व्रतविधानमकरोत्।
  11. मूलशङ्करः कान् निद्रितान् विलोक्य स्वयं जागरितोऽतिष्ठत्?
    उत्तर मूलशङ्करः सर्वान् निद्रितान् विलोक्य स्वयं जागरितोऽतिष्ठत्।
  12. शिवलिङ्गे मूषकं विचरन्तं दृष्ट्वा मूलशङ्करः किम् अचिन्तयत्?
    उत्तर शिवलिङ्गे मूषकं विचरन्तं दृष्ट्वा मूलशङ्करः लोकशङ्करं शङ्करं प्राप्तुम् अचिन्तयत्।
  13. शिवरात्रेः उत्सव: केन नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्?
    उत्तर शिवरात्रेः उत्सवः ‘ऋषिबोधोत्सवः’ इति नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्।
  14. दयानन्दस्य भगिनी कथं पञ्चत्वं गता?
    उत्तर दयानन्दस्य भगिनी विषूचिकया पञ्चत्वं गता।
  15. वर्षत्रयानन्तरं कस्य पितृव्यः अपि दिवङ्गत:?
    उत्तर वर्षत्रयानन्तरं मूलशङ्करस्य पितृव्यः अपि दिवङ्गतः।
  16. लोकः कस्मात् मुक्तः स्यात्?
    उत्तर लोकः मृत्युभयात् मुक्तः स्यात्।
  17. मूलशङ्करस्य हृदये वैराग्यं कथम् उत्पन्नम्?
    उत्तर स्वभगिन्याः पितृव्यस्य च मृत्युं दृष्ट्वा मूलशङ्करस्य हृदयो
    वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः।
  18. कस्य हृदये वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः?
    उत्तर दयानन्दस्य हृदये वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः।
  19. मूलशङ्करः गृहं कदा अत्यजत्?
    उत्तर मूलशङ्करः अस्तङ्गते भगवति भास्वति गृहम् अत्यजत्।
  20. मूलशङ्करः कति वर्षाणि पर्वतादिकम् अभ्रम?
    उत्तर मूलशङ्करः सप्तदशवर्षाणि पर्वतादिकम् अभ्रमत्।
  21. मूलशङ्कर: मथुरानगरं किमर्थम् अगच्छत्?
    उत्तर मूलशङ्करः विरजानन्दस्य यशं श्रुत्वा मथुरानगरम् अगच्छत्।
  22. महर्षेः दयानन्दस्य गुरुः कः आसीत्?
    अथवा विरजानन्दः कस्य गुरुः आसीत्?
    ‘उत्तर विरजानन्दः महर्षेः दयानन्दस्य गुरुः आसीत्।।
  23. कः गुरुः दयानन्दं व्याकरणम् अध्यापयामास?
    उत्तर विरजानन्दः गुरुः दयानन्दं व्याकरणम् अध्यापयामास।
  24. विरजानन्दः कं महानुभावं शास्त्राणि अध्यापयामास?
    उत्तर विरजानन्दः दयानन्दं महानुभावं शास्त्राणि अध्यापयामास।
  25. समाप्तविद्यः दयानन्दः कस्मै लवङ्जातं गुरुदक्षिणाम् अददात्?
    उत्तर समाप्तविद्यः दयानन्दः गुरवे लवङ्जातं गुरुदक्षिणाम् अददात्।
  26. दयानन्दः कीदृशः प्रदीपः प्रज्वलितः? ।
    उत्तर दयानन्दः ज्ञानमयप्रदीपः प्रज्वलितः।
  27. कतयः आश्रमाः सन्ति?
    उत्तर चत्वारः आश्रमाः सन्ति।
  28. कः एकः एव अस्ति?
    उत्तर ईश्वरः एकः एव अस्ति।
  29. कतयः महायज्ञाः नित्यं करणीया?
    उत्तर पञ्च महायज्ञाः नित्यं करणीया।
  30. महर्षिर्दयानन्दः कस्मै भ्रमति स्म?
    ‘उत्तर महर्षिर्दयानन्दः वैदिक-धर्म संस्थापनाय भ्रमति स्म।

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