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UP board Syllabus सत्य की जीत – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी खण्डकाव्यसत्य की जीत – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
Chapter 2
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

(झाँसी, बदायूँ , प्रतापगढ़, रामपुर, पीलीभीत जिलों के लिए)

प्रश्न-उत्तर

प्रश्न-पत्र में पठित खण्डकाव्य से चरित्र-चित्रण, खण्डकाव्य के तत्वों व तथ्यों पर आधारित दो लघ उत्तरीय प्रश्न दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक का उत्तर लिखना होगा, इसके लिए 4 अंक निर्धारित है।

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।

अथवा सत्य की जीत खण्डकाव्य की किसी प्रमुख घटना का परिचय दीजिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा महाभारत के द्रौपदी के चीर-हरण की संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है।
सिद्ध कीजिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए)

उत्तर प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा ‘महाभारत’ के द्रौपदी चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघु काव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। दुर्योधन पाण्डवों को द्यूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है और छल प्रपंच से उनका सबकुछ छीन लेता है। युधिष्ठिर जुए में स्वयं को हार जाते हैं। अन्त में वह द्रौपदी को भी दाँव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं।
दुःशासन द्रौपदी के केश खींचते हुए उसे सभा में लाता है। द्रौपदी के लिए यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सभा में प्रश्न उठाती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया है, उसे अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का क्या अधिकार है? अत: मैं कौरवों द्वारा विजित नहीं हूँ। दु:शासन उसका चीर-हरण करना चाहता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है।
“अरे-ओ! दुःशासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान
कराऊँगी मैं इसका बोध।।”
तब भयभीत दुःशासन दुर्योधन के आदेश पर भी उसके चीर-हरण का साहस नहीं कर पाता। दुर्योधन का छोटा भाई विकर्ण द्रौपदी का पक्ष लेता है। उसके समर्थन से अन्य सभासद भी दुर्योधन और दुःशासन की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि आज पाण्डवों के प्रति होते हुए अन्याय को रोका नहीं गया, तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। अन्ततः धृतराष्ट्र पाण्डवों के राज्य को लौटाकर उन्हें मुक्त करने की घोषणा करते हैं।

खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण की घटना में श्रीकृष्ण द्वारा चीर नाए जाने की अलौकिकता को प्रस्तुत नहीं किया है। द्रौपदी का पक्ष सत्य, न्याय का पक्ष है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास सत्य और न्याय का बल हो, असत्यरूपी दुःशासन उसका चीर-हरण नहीं कर सकता। द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी और यग के अनुकूल सृजित किया है और नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दोहराया है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है।
कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया है। इस प्रकार ‘सत्य की जीत को एक सफल ‘खण्ड काव्य’ कहना सर्वथा उचित होगा।

प्रश्न 2. सत्य की जीत खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावात्मक एवं कलात्मक विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है भावपक्षीय विशेषताएँ
सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावपक्षीय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं |

(i) आधुनिक युग आधुनिक युग नारी-जागरण का युग है। द्रौपदी के माध्यम से इस काव्य में पग-पग पर आज की जागृत नारी ही बोल रही है। यद्यपि इस खण्डकाव्य की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसमें वर्तमान नारी की दशा को आरोपित किया है। साथ ही कुछ मौलिक परिवर्तन भी किए हैं। कवि का विचार है कि शक्ति का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, अपितु शान्ति एवं विकास कार्यों के लिए होना चाहिए। जीवन में सत्य, न्याय, प्रेम, करुणा, क्षमा, सहानुभूति,। सेवा आदि मल्यों का विकास आवश्यक है।

(ii) उदात्त आदर्शों का स्वर सम्पूर्ण भावात्मक क्षेत्रों से भारतीय नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण एवं शस्त्रों के अंगीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदर्शों तथा सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदशों की भावधारा प्रवाहित की गई है। ।

(iii) रस योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में ओज गुण की प्रधानता भी दिखाई देती है। इस खण्डकाव्य का विषय एवं भाव नारी के शक्ति-रूप को चित्रित करना है। अत: उसके अनुरूप वीर एवं रौद्र रस की योजना की गई है। कलापक्षीय विशेषताएँ

प्रश्न अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कलापक्षीय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) भाषा-शैली प्रस्तुत खण्डकाव्य न घटनाप्रधान है, न भावप्रधान एवं यह एक विचारशील रचना है। इस कारण कवि ने इसे अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रसादगण सम्पन्न खड़ीबोली हिन्दी में लिखा है। इसकी भाषा में न तो अलंकारों की प्रधानता है और न ही कृत्रिमता की।

“सह सका भरी सभा के बीच नहीं वह अपना यों अपमान।
देख नर पर नारी का वार एकदम गरज उठा अभिमान।।”

इस काव्य की भाषा बड़ी ओजपूर्ण है। द्रौपदी इसकी प्रमुख स्त्री पात्र है। वह सिंहनी सी निर्भीक, दुर्गा सी तेजस्विनी और दीपशिखा सी आलोकमयी है। दूसरी ओर पुरुष पात्रों में दुःशासन प्रमुख है, उसमें पौरुष का अहं है और भौतिक शक्ति का दम्भ भी। अत: दोनों पात्रों के व्यक्तित्व एवं विचारों के अनुरूप ही इस काव्य की भाषा को अत्यन्त वेगपूर्ण एवं ओजस्वी रूप प्रदान । किया गया है।

(ii) संवाद योजना एवं नाटकीयता ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने। कथोपकथनों द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण ‘सत्य की जीत’ काव्य । अधिक आकर्षक बन गया है

“द्रौपदी बढ़-बढ़ कर मत बोल”, कहा उसने तत्क्षण तत्काल।।
“पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल।।”।

(iii) अलंकार योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में उत्प्रेक्षा, उपमा, रूपक अलंकारों का प्रयोग किया गया है। अनुभावों की चित्रोपमता की सजीव योजना की गई है ।
“और वह मुख! प्रज्वलित प्रचण्ड
अग्नि का खण्ड, स्फुलिंग का कोष।”

इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है। कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया है। द्रौपदी का चरित्र आदर्शमय है। इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ को एक सफल खण्डकाव्य कहना सर्वथा उपयुक्त है।

(iii) उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय दिखाना है। इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य मानवीय सद्गुणों एवं उदात्त भावनाओं को चित्रित करके समाज में इनकी स्थापना करना और समाज के उत्थान में नर-नारी का समान रूप से सहयोग देना है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 3. ‘सत्य की जीत के आधार पर सिद्ध कीजिए कि नारी अबला नहीं शक्ति स्वरूपा है।

अथवा सत्य की जीत खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर किसी स्त्री पात्र का चरित्रांकन कीजिए।

अथवा “सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा ” “सत्य की जीत’ में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।

उत्तर द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी कृत खण्डकाव्य ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी है। कवि ने उसे महाभारत की द्रौपदी के समान सुकुमार, निरीह रूप में प्रस्तुत न करके आत्मसम्मान से युक्त, ओजस्वी, सशक्त एवं वाकपटु वीरांगना के रूप में चित्रित किया है। द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

(i) स्वाभिमानिनी द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपमान सहन नहीं कर सकती। वह अपना अपमान नारी जाति का अपमान समझती है। वह नारी के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाली किसी भी बात को स्वीकार नहीं कर सकती। ‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी ‘महाभारत’ की द्रौपदी से बिलकुल अलग है। वह असहाय और अबला नहीं है। वह अन्यायी और अधर्मी पुरुषों से संघर्ष करने वाली है।

(ii) निर्भीक एवं साहसी द्रौपदी निर्भीक एवं साहसी है। दःशासन द्रौपदी के बाल खींचकर भरी सभा में ले आता है और उसे अपमानित करना चाहता है। तब द्रौपदी बड़े साहस एवं निर्भीकता के साथ दुःशासन को निर्लज्ज और पापी कहकर पुकारती है।

(iii) विवेकशील द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँखें बन्द करके चलने वाली नारी नहीं है वरन् विवेक से काम लेने वाली है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया हो, उसे अपनी पत्नी को दाँव। पर लगाने का अधिकार ही नहीं है। अत: वह कौरवों द्वारा विजित नहीं है।

(iv) सत्यनिष्ठ एवं न्यायप्रिय द्रौपदी सत्यनिष्ठ है, साथ ही न्यायप्रिय भी है। वह अपने प्राण देकर भी सत्य और न्याय का पालन करना चाहती है। जब दु:शासन द्रौपदी के सत्य एवं शील का हरण करना चाहता है, तब वह

उसे ललकारती हुई कहती है
“न्याय में रहा मुझे विश्वास,
सत्य में शक्ति अनन्त महान।।
मानती आई हूँ मैं सतत,
सत्य ही है ईश्वर, भगवान।”

(v) वीरांगना द्रौपदी विवश होकर पुरुष को क्षमा कर देने वाली असहाय और अबला नारी नहीं है। वह चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध वीरांगना है

“अरे ओ! दुःशासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान,
कराऊँगी मैं उसका बोध।”

(vi) नारी जाति का आदर्श द्रौपदी सम्पूर्ण नारी जाति के लिए एक आदर्श है। दुःशासन नारी को वासना एवं भोग की वस्तु कहता है, तो वह बताती है कि नारी वह शक्ति है, जो विशाल चट्टान को भी हिला देती है। पापियों के नाश के लिए वह भैरवी भी बन सकती है। वह कहती है।

“पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ,
बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व,
तभी होगा यह पूरा सर्ग।”

सार रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानिनी, आत्मगौरव सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 4. ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर युधिष्ठिर की
चारित्रिक-विशेषताओं को लिखिए।

उत्तर ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक रूप में युधिष्ठिर के चरित्र को स्थापित किया गया है। द्रौपदी एवं धृतराष्ट्र के कथनों के माध्यम से युधिष्ठिर का चरित्र उजागर हुआ है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र महान् गुणों से परिपूर्ण है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं ।

(i) सरल-हृदयी व्यक्तित्व युधिष्ठिर का व्यक्तित्व सरल हृदयी है तथा
अपने समान ही सभी अन्य व्यक्तियों को भी सरल हृदयी समझते हैं। इसी गुण के कारण वे दुर्योधन और शकुनि के कपट रूपी माया जाल में फँस जाते हैं और इसका दुष्परिणाम भोगने के लिए विवश हो जाते हैं।

(ii) धीर-गम्भीर युधिष्ठिर ने अपने जीवन काल में अत्यधिक कष्ट भोगे थे परन्तु उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं हुआ। दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीर-हरण व उसका अपमान किए जाने के पश्चात् भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी कायरता या दुर्बलता नहीं थी, बल्कि उनकी धीरता व गम्भीरता का गुण था।

(iii) अदूरदर्शी युधिष्ठिर सैद्धान्तिक रूप से अत्यधिक कुशल थे, परन्तु व्यावहारिक रूप से कुशलता का अभाव अवश्य है। वे गुणवान तो हैं, परन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा मूर्खतापूर्ण कार्य कर बैठते हैं। परिणामस्वरूप इस कर्म का दूरगामी परिणाम उनकी दृष्टि से ओझल हो जाता है और चीर-हरण जैसे कुकृत्य को जन्म देता है। इस प्रकार युधिष्ठिर अदूरदर्शी कहे जाते हैं।

(iv) विश्व-कल्याण के अग्रदूत युधिष्ठिर का व्यक्तित्व विश्व-कल्याण के प्रवर्तक के रूप में देखा गया है। इस गुण के सन्दर्भ में धृतराष्ट्र भी कहते हैं कि

“तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।”
अर्थात् धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर के साथ सम्पूर्ण विश्व को माना है, क्योंकि उनका उद्देश्य विश्व-कल्याण मात्र है।

(v) सत्य और धर्म के अवतार युधिष्ठिर को सत्य और धर्म का अवतार माना गया है। इनकी सत्य और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा है। युधिष्ठिर के इसी गुण पर मुग्ध होकर धृतराष्ट्र ने कहा कि हे युधिष्ठिर! तुम श्रेष्ठ व धर्मपरायण हो और इन्हीं गुणों को आधार बनाकर बिना किसी भय के अपना राज्य सँभालो और राज करो।
निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र व नायक हैं, जिनमें विश्व कल्याण, सत्य, धर्म, धीर, शान्त व सरल हृदयी व्यक्तित्व का समावेश है।

प्रश्न 5. ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर विकर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर विकर्ण ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का गौण पात्र है। उसकी-चारित्रिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

(i) सन्तुलित विवेक विकर्ण के पास सन्तुलित विवेक है। इसलिए अन्धी शस्त्र शक्ति के वह प्रबल विरोधी है। केवल शस्त्र-बल पर स्थापित शान्ति को वे भ्रान्ति मानते हैं, क्योंकि ऐसी शान्ति क्षणिक होती है, स्थायी नहीं।

(ii) प्रेम और शान्ति के समर्थक विकर्ण प्रेम और शान्ति के प्रबल समर्थक हैं। वे कहते हैं कि विश्व की ऐसी कौन-सी समस्या है, जिसको प्रेम, शान्ति और सहयोग के भाव से हल न किया जा सके। इसके लिए निर्मल हृदय और मस्तिष्क चाहिए और मानवता में विश्वास चाहिए।।

(iii) न्यायप्रिय विकर्ण न्यायप्रिय है। कौरव वंश के होते हुए भी कौरव पक्ष के दोषों का उल्लेख करना, उसकी छलपूर्ण नीति की आलोचना करना और द्रौपदी के सत्य पक्ष का समर्थन करना उसकी न्यायप्रियता का परिचायक (द्योतक) है।

(iv) स्पष्टवादी विकर्ण स्पष्टवादी है। वह सभा में किए गए चीरहरण के दुष्कृत्य का विरोध करता है और कहता है कि यह अधर्म है। उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कौरव पक्ष का एक व्यक्ति विकर्ण ही ऐसा है, जो स्पष्टवादिता, निर्भीकता और न्यायप्रियता का द्योतक है।

प्रश्न 6. ‘सत्य की जीत’ खण्ड के आधार पर दुःशासन का चरित्रांकन कीजिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन के चरित्र पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

अथवा ‘सत्य की जीत’ में दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है। यह दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। दुःशासन के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित ।

(i) अहंकारी एवं बुद्धिहीन दुःशासन अत्यन्त अहंकारी एवं बुद्धिहीन है। उसे अपने बल पर अत्यन्त घमण्ड है। वह बुद्धिहीन भी है, विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ एवं महत्त्वपूर्ण मानता है। वह पशबल में विश्वास करता है। वह भरी सभा में पाण्डवों का अपमान करता है। सत्य, प्रेम, अहिंसा की अपेक्षा वह पाश्विक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।

(ii) नारी के प्रति उपेक्षा भाव द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क से
दःशासन का नारी के प्रति रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। वह
नारी को भोग्या और पुरुष की दासी मानता है। वह नारी की
दुर्बलता का उपहास उड़ाता है। उसके अनुसार पुरुष ने ही विश्व
का विकास किया है। नारी की दुर्बलता का उपहास उसने इन शब्दों में किया है

“कहाँ नारी ने ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम।
जानती है वह केवल पुरुष-भुजाओं में करना विश्राम।”

(iii) शस्त्र-बल विश्वासी दुःशासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता
है। उसे धर्मशास्त्र और धर्मज्ञों में विश्वास नहीं है। वह शस्त्र के
समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है। शास्त्रज्ञाताओं को वह दुर्बल
मानता है।

(iv) दुराचारी दुःशासन हमारे सम्मुख एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आता है। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने अभद्र व्यवहार
करने में भी संकोच नहीं करता। द्रौपदी को सम्बोधित करते हुए
दु:शासन कहता है

“विश्व की बात द्रौपदी छोड़,
शक्ति इन हाथों की ही तोल।
खींचता हूँ मैं तेरा वस्त्र,
पीट मत न्याय धर्म का ढोल।”

(v) सत्य एवं सतीत्व से पराजित दु:शासन के चीर-हरण से
असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि हमेशा सत्य की ही जीत
होती है। वह जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे।
बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो।
जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ.
ओंकारप्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं, “लोकतन्त्रीय चेतना के इस युग
में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दुःशासन हैं, जो
दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की
भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाए हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।

प्रश्न 7. ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्रों का संक्षेप में परिचय दीजिए।

उत्तर इस खण्ड काव्य के प्रमुख पात्र द्रौपदी और दुःशासन हैं। अन्य पात्रों में युधिष्ठिर, दुर्योधन, विकर्ण, विदुर और धृतराष्ट्र उल्लेखनीय हैं। जिनका संक्षेप में परिचय निम्नलिखित है

(i) दुःशासन दुःशासन, दुर्योधन का छोटा भाई व धृतराष्ट्र का पुत्र है। यह अहंकारी एवं बुद्धिहीन है। सत्य, प्रेम, अहिंसा के स्थान पर वह पाश्विक शक्तियों को महत्त्व देता है। दुःशासन का नारी के प्रति उपेक्षित भाव है। वह दराचारी व शस्त्र-बल विश्वासी है। वह शस्त्र के समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है तथा शास्त्रज्ञाताओं को दुर्बल
मानता है।

(ii) द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका द्रौपदी स्वाभिमानी, ओजस्वी, सशक्त एवं वाकपटु वीरांगना के रूप में मुखरित हुई है। द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, सत्यनिष्ठ प्रिय, विवेकशील, निर्भीक एव साहसी तथा न्याय की पक्षधर, सती साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

(iii) दुर्योधन दुर्योधन, धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र है। इस खण्डकाव्य में दुर्योधन को भी दुःशासन के समान ही असत्य, अन्याय और अनैतिकता का समर्थक माना गया है। वह
भी शस्त्रबल का पुजारी है। ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के कारण ही वह पाण्डवों की समृद्धि और मान-सम्मान से जलता रहा और इसी कारण उसने छल-कपट करके पाण्डवों के राज्य हड़प लिए। सत्ता लोलुपता दुर्योधन के चरित्र की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

(iv) युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर हैं। वह सरल हृदयी व्यक्तित्व के हैं। धीर, गम्भीर, अदूरदर्शी; विश्व-कल्याण के अग्रदूत व सत्य और धर्म के अवतार आदि गुणों का समन्वय युधिष्ठिर के चरित्र में है। कवि ने युधिष्ठिर को आदर्श राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया है।

(v) धृतराष्ट्र इस खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र उदारता और विवेकपूर्णता के गण से अभिभूत हैं। खण्डकाव्य के अन्तिम अंश में धृतराष्ट्र का उल्लेख हआ है। वे दोनों पक्षों (पाण्डवों और कौरवों) के सबल तर्कों को सुनते हैं और सत्य को सत्य तथा असत्य को असत्य घोषित कर उचित न्याय की प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं।

(vi) विकर्ण एवं विदुर विकर्ण और विदुर दोनों अस्त्र-शस्त्र शक्ति के घोर विरोधी हैं। वे शान्तिप्रिय हैं तथा शस्त्र-बल पर स्थापित शन्ति को प्रान्ति मानते हैं। दोनों पात्र स्पष्टवादी और निर्भीक हैं।
कौरव-कुल के होने के पश्चात् भी द्रौपदी के समर्थन में हैं।

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