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UP board syllabus गजानन माधव मुक्तिबोध – परिचय – मुझे कदम-कदम पर
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य-विविधा गजानन माधव मुक्तिबोध – मुझे कदम-कदम पर
Chapter 11
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

संक्षिप्त परिचय

नामगजानन माधव मुक्तिबोध’
जन्म1917 ई. में श्योपुर, जिला ग्वालियर
पिता का नामश्री माधव मुक्तिबोध’
माता का नामश्रीमति पार्वती बाई
शिक्षाएम.ए
कृतियाँकाव्य-संग्रह चाँद का मुँह टेढ़ा है,
भूरी-भूरी खाक धूल, तार-सप्तक।
कहानी संग्रह काठ का सपना। उपन्यास
विपात्र, आत्माख्यान एक साहित्यिक की
डायरी आदि।
उपलब्धियाँकवि, कथाकार, समीक्षक, विचारक,
श्रेष्ठ पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
मृत्यु1964 ई.

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

नई कविता के प्रतिनिधि कवि गजानन माधव मुक्तिबोध’ का जन्म 13 नवम्बर, 1917 को श्योपर, जिला ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हआ था। इनके पिता माधव मुक्तिबोध पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर थे। इनकी माता का नाम पार्वती बाई था। इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी.ए. करने के बाद इन्होंने मित्रों के सहयोग से एम.ए. किया और राजनान्दगाँव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हो गए। इन्होंने शान्ताबाई नामक एक विपन्न लड़की से प्रेम विवाह किया। विभिन्न परिस्थितियों से जझते हुए मुक्तिबोध को अपना सम्पूर्ण जीवन अभाव, संघर्ष और विपन्नता में ही व्यतीत करना पड़ा। सितम्बर, 1964 में इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

आधुनिक जीवन-मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए इन्होंने नए विषयों को नवीन सन्दर्भो से युक्त करके प्रस्तुत किया। जन-जीवन के यान्त्रिक स्वरूप को पहचानकर उसकी व्याख्या करने वाले
आधुनिक हिन्दी कविता में मुक्तिबोध सम्भवत: पहले कवि हैं।
मक्तिबोध बहमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। वे आम आदमी की वकालत करने वाले कवि थे। उनका व्यक्तित्व अपनी पूरी पीढ़ी में विशिष्ट रहा है। इन्होंने ‘हल’ तथा ‘नया खून’ पत्रिकाओं का
सम्पादन किया।

कृतियाँ

काव्य-रचनाएँ चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल तथा तार-सप्तक में प्रकाशित रचनाएँ।
कहानी संग्रह काठ का सपना। उपन्यास विपात्र।
आत्माख्यान एक साहित्यिक की डायरी।
निबन्ध संग्रह नई कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबन्धा
पुस्तक समीक्षा उर्वशी: दर्शन और काव्य, कामायनी: एक पुनर्विचार।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. यायावरी वृति मुक्तिबोध की कविता में यायावरी वृति के दर्शन होते हैं। ये जीवन की सच्चाई की खोज के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे।
  2. आधुनिक जीवन की विभीषिकाओं का चित्रण गजानन जी की
    कविता में आधुनिक जीवन की विभीषिकाओं को जितनी सूक्ष्म दृष्टि से चित्रित किया गया है, उतनी किसी अन्य कवि के काव्य में प्राप्त नहीं होती
  3. सन्त्रास और कुण्ठा इनकी कविता में सन्त्रास एवं कुण्ठा की भी व्यंजना हुई है।
  4. विद्रोह या क्रान्ति सामाजिक अव्यवस्था, कुरीतियों के प्रति विद्रोह या क्रान्ति का स्वर इनकी कविता का प्राण है।
  5. सत्-चित् वेदना मुक्तिबोध जी सत्-चित्-वेदना के कवि हैं। इनका दु:ख का बोध जितना गहरा है उतना ही व्यापक है।

कला पक्ष

  1. भाषा मुक्तिबोध के काव्य की भाषा कत्रिमता के आडम्बर से मुक्त है। इनकी भाषा इनके विचारों का सफल प्रतिनिधित्व करने में समर्थ है। इन्होंने अपनी भाषा को सरल, सहज एवं सम्प्रेषणीय बनाने के लिए उर्दू, अंग्रेजी और देशज भाषा के शब्दों को अपनाया है।
  2. शैली गजानन जी ने अपनी लम्बी कविताओं में फैन्टेसी शैली का
    आश्रय लिया है।
  3. बिम्ब एवं प्रतीक मुक्तिबोध जी ने काल्पनिक एवं जादुई प्रतीकों के माध्यम से बिम्बों का निर्माण किया है, जो संवेदनात्मक अनुभूति की तीव्रता को तो प्रदर्शित करते हैं, परन्त मस्तिष्क में किसी स्पष्ट चित्र का निर्माण नहीं करते। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी कविताओं में प्रतीकों के माध्यम से मिथिकों की भी सृष्टि की है।

हिन्दी साहित्य में स्थान,

गजानन माधव मुक्तिबोध कवि, कथाकार, समीक्षक, विचारक एवं श्रेष्ठ पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। अनेक विद्वान् सच्चे अर्थों में उन्हें ही ‘प्रयोगवादी कविता का अग्रण्य कवि मानते हैं।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या

मुझे कदम-कदम पर

  • 1 मुझे कदम-कदम पर, चौराहे मिलते हैं
  • बाँहें फैलाए। एक पैर रखता हूँ।
  • कि सौ राहें फूटतीं व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ;
  • बहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपने….
  • सब सच्चे लगते हैं; अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
  • मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ, जाने क्या मिल जाए।
    शब्दार्थ राहें-मार्ग: तजुर्वे अनुभव; अकुलाहट-व्याकुलता।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में ‘मुझे कदम-कदम पर’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।

प्रसंग कवि को बहिर्जगत् में इतने मनोरम, प्रभावपूर्ण और इतने सुन्दर दृश्य अपने चारों ओर देखने को मिलते हैं, वह उससे प्रेरणा ग्रहण करने का सन्देश देता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मुझे कदम-कदम पर अपनी बाँहें फैलाए हए। असंख्य चौराहे मिलते हैं। उन चौराहों पर जैसे ही मैं कदम बढ़ाता है वैसे ही मुझे उनमें से अन्य दसरे मार्ग दिखाई देने लगते हैं और मैं उन सभी मार्गों से होकर जाना चाहता हूँ। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में सफलता को प्राप्त करने के अनेक मार्ग हैं और ये मार्ग व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित भी करते हैं यदि
व्यक्ति किसी मार्ग का चयन कर लेता है, तो उस चयनित मार्ग से अनेक। अनगिनत विकल्प अर्थात् मार्ग प्रकट होने लगते हैं।
कवि आगे कहते हैं कि इन मार्गों का अनुभव एवं अपने स्वप्न मुझे अच्छे लगते हैं। इन स्वप्नों में मझे सच्चाई का अनुभव होता है। इन अनुभवों और स्वप्नों। के कारण मेरे हृदय में एक विचित्र-सी व्याकुलता पैदा होने लगती है। कवि कहता। है कि मैं उन अनुभवों से शिक्षा पाकर और भी अधिक गहराई में जाना चाहता हूँ
यह सोचकर कि शायद कुछ अच्छा प्राप्त हो जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे मन में यह जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि अनुभवों से अलग कोई और विचित्र अनुभव भी मुझे कभी न कभी प्राप्त हो सकता है। अतः में सदैव इस ओर प्रयत्नशील अवस्था में विद्यमान हूँ।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i) कवि का मानना है कि जीवन विकल्पों से परिपूर्ण है। किसी भी खोज के समय व्यक्ति के सामने अनन्त मार्ग खुल जाते हैं और व्यक्ति इन सबका आनन्द प्राप्त करना चाहता है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा सरल, सहज खड़ी बोली तथापि उर्दू शब्दों की प्रधानता है।
शैली लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार उपमा व पुनरुक्तिप्रकाश
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 2 मझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है,
    हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
    प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है,
    मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य-पीड़ा है,
    पल-भर मैं सब में से गुजरना चाहता हूँ,
    प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
    इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ, अजीब है जिन्दगी!!

शब्दार्थ भ्रम-सन्देह, अधीर बेचैन; सुस्मित-हँसती हुई; विमल-निर्मल: सदानीरसदैव जल से युक्तः उर-हृदय; तिर आनतैरकर।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग इसमें कवि बाह्य जगत् को देखकर लोगों से प्रेरणा ग्रहण करने का । सन्देश देता है।

व्याख्या प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ‘मुक्तिबोध’ कहते हैं कि मुझे प्रत्येक पत्थर में हीरे का भ्रम होने लगता है। ऐसा लगता है कि प्रत्येक पत्थर । हीरे के समान है और प्रत्येक वक्षस्थल के भीतर एक व्याकुल आत्मा मौजूद है। कवि को यह लगने लगता है कि प्रत्येक मन्द हँसी सदैव जल से भरी रहने वाली नदी के प्रवाह के समान है। कवि को यह भी भ्रम होता है कि प्रत्येक मनुष्य की
वाणी में महाकाव्य की अथाह वेदना छिपी हुई है। वह कुछ क्षण के लिए इन सबसे गुजरना चाहता है, वह उन सबका अनुभव करना चाहता है, वह उन्हें स्वयं के द्वारा महसूस करना चाहता है। वह प्रत्येक मनुष्य के हृदय की अतल गहराइयों में तैरकर पुनः ऊपर आना चाहता है। वह स्वयं को अर्पित किया हुआ घूमता-फिरता
है। वह सभी की निजी व्यथा को स्वयं झेलना चाहता है। वह स्वयं को दूसरों को दुःख बाँटने के लिए समर्पित करना चाहता है। इस तरह, कवि कहता है कि वास्तव में यह जीवन भी बहुत ही विचित्र है, जिसमें खोज के अनगिनत विकल्प तथा अनन्त मार्ग मौजूद हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i) कवि इस बात पर जोर देता है कि वह जीवन में प्राप्त होने वाले विभिन्न अनुभवों को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त कर लेना चाहता है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मव छन्द मुक्त
अलंकार रूपक व पुनरुक्तिप्रकाश गुण प्रसाद । शब्द शक्ति लक्षणा

  • 3 कहानियाँ लेकर और
    मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
    जहाँ ज़रा खड़ा होकर बातें कुछ करता हूँ
    उपन्यास मिल जाते।
    दु:ख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतें,
    अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
    जमाने के जानदान सूरे व आयतें सुनने को मिलती हैं।

शब्दार्थ अहंकार विश्लेषण-दर्प का विवरण: आख्यान-कहानियाँ आयते- कुरान के पवित्र वाक्य।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन में समस्या केवल अभावों की ही नहीं है वरन् उपयुक्त चुनाव की भी है।

व्याख्या कवि कहता है कि हमारा यह जीवन विविधता पूर्ण है। जीवन में व्यक्ति के समक्ष कदम-कदम पर उपयुक्त और औचित्यपूर्ण का चयन करने की समस्याएँ अपनी बाहें फैलाए खड़ी रहती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवनरूपी मार्ग में कदम-कदम पर अनेक चौराहे मिलते हैं। इन चौराहों के
प्रत्येक कोण में अनेकानेक कहानियों के कथानक छिपे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप मेरे सामने उचित चयन की समस्या उत्पन्न हो जाती है कि मैं किस कथानक का उपयुक्त चयन करके अपने जीवन की गति को विस्तार दें। मेरी चयन की समस्या का समाधान ये चौराहे नहीं करते वरन ये तो अनेक कथानक व कहानियाँ मुझे देकर आगे और अधिक विस्तृत रूप धारण कर लेते हैं। कवि आगे कहता है कि मैं इन चौराहों पर खड़ा होकर अपना ध्यान केन्द्रित कर जब ज़रा-सा विचार करता हूँ कि मुझे किस ओर जाना है। तब मुझे प्रत्येक चौराहे में अनेक उपन्यासों की कथा सन्निहित मिलती है, जब मैं चौराहे का चयन करता हूँ तो मुझे अपने द्वारा किए गए प्रत्येक चयन में कुछ दुःख की कथाएँ, जीवन से विभिन्न तरह की शिकायतें, अहंकार-विश्लेषण

सम्बन्धी आलोचनाएँ, सैकड़ों चारित्रिक कथाएँ इसके साथ ही दुनिया के एक-से। बढ़कर-एक उत्तम उपदेश और पवित्र वाक्य सुनने को मिलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यहाँ कोई भी ऐसा मार्ग विद्यमान नहीं है, जिसका चयन करके मनुष्य केवल सुख की ही प्राप्ति कर सके अर्थात् जिससे मनुष्य को केवल सुख
की अनुभूति ही हो। यहाँ प्रत्येक मार्ग सुख-दुःख, हर्ष-विषाद का मिश्रित रूप है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i) यहाँ जीवन की विविधता और उसमें उचित के चयन की समस्या को जीवन की विकटतम समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार रूपक एवं पुनरुिक्तिप्रकाश
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 4 कविताएँ मुस्करा लाग-डाँट करती हैं, प्यार बात करती हैं।
    मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!
    घबराएँ प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र
    लेकर मैं घर पर जब लौटता …
    उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती है कि
    सौ बरस और तुम्हें जीना ही चाहिए।

शब्दार्थ लाग डाँट-फटकार; प्रतीक-चिह्न; रूप-चित्र-आकार।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन में समस्या केवल अभावों की ही नहीं वरन् उपयुक्त चुनाव की भी है।

व्याख्या कवि कहता है कि मुझे अपने जीवन में अनेक मुसकराती कविताएँ । दृष्टिगत होती हैं, जो मुझे मेरे उचित चयन के लिए कई बार बधाई भी देती हैं। और अनुचित चयन के लिए मुझे फटकार भी लगाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है। कि मेरे उचित चयन के लिए प्यार से मुझे आशीर्वाद देकर मेरा साहस बढ़ाती हैं। तो साथ ही गलत चयन पर मुझे दण्डवत् फटकारती भी हैं। कवि कहता है कि
संसार की गति बड़ी ही विचित्र है, क्योंकि यह किसी प्रकार की सहायता प्रदान नहीं करती उचित के चयन में सहायता व अनुचित के चयन में फटकार लगाने की अपेक्षा यह उलझन ही पैदा करती है, क्योंकि यह संसार दोनों (अनुचित का चयन करके मृत्यु का वरण करने वाले तथा उचित का चयन करके जीवन को सार्थक अथवा अमर करने वाले) के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है।
इस स्थिति में उचित अनुचित का चयन किस प्रकार होगा? आगे कवि कहता है कि मैं अपने जीवनरूपी मार्ग को आगे बढ़ाने के लिए जिस भी वस्तु को प्रतीक के रूप में ग्रहण करने के लिए आगे बढ़ता हूँ, तो मुझे वह प्रतीक पूर्ण रूप से घबराया हुआ सा प्रतीत होता है अर्थात् मुझे अपने प्रत्येक चयन में अनुचित का भय दृष्टिगत होता है। इसके विपरीत स्थिति का वर्णन करते हए कवि कहता है।
कि इसके विपरीत मैं जब उन प्रतीकों के समन्वित रूप को देखता हूँ तो मुझे उन प्रतीकों को ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। मैं दुविधा की स्थिति का सामना कर असमंजस की स्थिति के रूप में अपने विश्राम स्थल घर पर आता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए विविध उपमान, उपाय अथवा जीवन सूत्र ऐसे दिखाई पड़ते है कि जिनका चयन कर में उन्नति को प्राप्त। कर सकता था, किन्तु तब मुझे लगता है कि वे उपमाएँ कह रही हैं, कि हमा अपनाकर अपना औचित्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए तम्हें अभी सौ साल तक और जीना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में सदैव पनिन मार्ग का चयन करने में असमर्थ रहता है यदि उसे सौ साल जीवित रहन का भी अवसर मिल जाए तब भी उसके हित में समि- प्रश्न विद्यमान ही रहेगा।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

कवि ने जीवन की विविधता और उसमें उचित के चयन की समस्या के प्रश्न को विकटतम समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है।
(i) रस शान्त

कला पक्ष

भाषा खड़ीबोली
शैली लाक्षणिक व प्रतीकात्मक
छन्द मुक्त अलंकार उपमा, रूपक एवं पुनरुक्तिप्रकाश
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 5 घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,
    बाँहें फैलाए रोज मिलती हैं सौं राहें,
    शाख-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,
    नव-जीवन रूप-दृश्य वाले सौ-सौ विषय
    रोज-रोज मिलते हैं और मैं सोच रहा कि
    जीवन में आज के लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
    कमी है विषयों की वरन् यह कि आधिक्य उनका है
    उसको सताता है, और वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है!! |

शब्दार्थ पग-पग-कदम-कदम, प्रशाखाएँ-शाखाएँ से निकली हुई शाखाएँ। आधिक्य-अधिकता; चुनाव-चयन।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्य में कवि कहता है प्रतिदिन उसे नए-नए विषय मिलते रहते है जिन पर साहित्य का निर्माण किया जा सकता है परन्तु कवि की समस्या यह । है कि वह इन दिवालों में सही विषय का चुनाव नहीं कर पाता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मुझे घर पर भी कदम-कदम पर चौराहे मिल जाते हैं और उन पर बाँहें फैलाए हुए सैकड़ों राहें मिल जाती हैं अर्थात् मुझे न केवल घर से बाहर ही अपित घर के भीतर भी साहित्य सृजन के लिए विषय मिल जाते हैं। कवि कहता है कि जिस प्रकार मूल वृक्ष से हजारों शाखाएँ। निकलकर बहुमुखी रूप में चारों ओर फैल जाती हैं उसी प्रकार प्रतिदिन मुझे भी नए-नए रूप दृश्य वाले विषय मिलते रहते हैं और मैं बार-बार इस पर विचार
करने के लिए विवश हो जाता हैं कि आज के लेखक के समक्ष उत्पन्न समस्या किस से सम्बन्धित है। कवि कहता है आज के लेखक के समक्ष विषय ढूँढने की कठिनाई नहीं है वरन् विषयों की अधिकता एवं विविधता ही उसकी वास्तविक कठिनाई का कारण है, जिसके परिणामस्वरूप लेखक उपयुक्त विषय का चयन नहीं कर पाता। कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक के समक्ष विषयों की अधिकता ही चयन की समस्या के रूप में उभर कर सामने आती है। अतः लेखक जिसके फलस्वरूप विविध प्रकार के विषयों में से उपयुक्त विषय का चयन नहीं कर पाता।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i) प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ यह है कि लेखक को विषय खोजने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते हैं।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष

भाषा खड़ीबोली
शैली लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक छन्द मुक्त
अलंकार पुनरुक्तिप्रकाश गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

मुझे कदम-कदम पर

  1. मुझे कदम-कदम पर, चौराहे मिलते हैं बाँहें फैलाए।
    एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं व मैं उन सब पर से
    गुजरना चाहता हूँ; बहुत अच्छे लगते हैं
    उनके तजुर्बे और अपने सपने….. सब सच्चे लगते हैं।
    अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
    मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ, जाने क्या मिल जाए।

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस रचना से अवतरित हैं तथा उसके कवि कौन हैं?
उत्तर प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ हिन्दी पाठ्यपुस्क में संकलित कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’ से अवतरित हैं तथा इसके कवि गजानन माधव मुक्तिबोध’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश का भाव यह है कि जीवन विकल्पों से परिपूर्ण है। किसी भी खोज के समय व्यक्ति के सामने अनन्त मार्ग खुल जाते हैं और व्यक्ति हुन । सबका आनन्द प्राप्त करना चाहता है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने क्या सन्देश दिया है।
उत्तर कवि को बहिर्जगत में इतने मनोरम, प्रभावपूर्ण और इतने सुन्दर दृश्य अपने चारों ओर देखने को मिलते हैं, वह उससे प्रेरणा ग्रहण करने का सन्देश इस पद्यांश के माध्यम से देता है।

(iv) कवि सदैव प्रयत्नशील अवस्था में विद्यमान क्यों रहता है?
उत्तर कवि के मन में सदैव जिज्ञासा बनी रहती है कि अनुभवों से अलग कोई और विचित्र अनुभव भी उसे कभी-न-कभी किसी-न-किसी रूप में प्राप्त हो सकता है। इन अनुभवों की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील होना अति आवश्यक है, इसलिए कवि सदैव प्रयत्नशील अवस्था में विद्यमान रहता है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में प्रयुक्त अलंकारों के नाम बताइए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में उपमा व पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार हैं।

  • 2 कहानियाँ लेकर और मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
    जहाँ ज़रा खड़ा होकर बातें कुछ करता हँ…… उपन्यास मिल
    जाते। दु:ख की कथाएँ,
    तरह-तरह की शिकायतें, अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
    जमाने के जानदान सूरे व आयतें सुनने को मिलती हैं।
    कविताएँ मुस्करा लाग-डाँट करती हैं, प्यार बात करती हैं।
  • मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!
  • घबराएँ प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र
  • लेकर मैं घर पर जब लौटता …..
  • उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती है कि
  • सौ बरस और तुम्हें जीना ही चाहिए।

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवि के सामने उचित चयन की समस्या कब उत्पन्न हो जाती है?
उत्तर कवि के अनुसार हमारा जीवन विविधतापूर्ण है। जीवनरूपी मार्ग में कवि को कदम-कदम पर अनेक चौराहे मिलते हैं। इन चौराहों के प्रत्येक कोण में अनेकानेक कहानियों के कथानक छिपे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप कवि के सम्मुख उचित चयन की समस्या उत्पन्न हो जाती है कि मैं किस कथानक का चुनाव करके अपने जीवन को गति प्रदान करूँ।।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने संसार की गति को विचित्र क्यों कहा है?
उत्तर कवि ने संसार की गति को विचित्र इसलिए कहा है, क्योंकि वह किसी प्रकार की सहायता प्रदान नहीं करती, अपितु उचित के चयन में प्रोत्साहित तथा अनुचित के चयन में फटकार लगाने की अपेक्षा यह उलझन ही पैदा करती

है, क्योंकि यह संसार अनुचित का चयन करके मृत्यु का वरण करने वाले तथा उचित का चयन करके जीवन को सार्थक बनाने वाले के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करती है।

(iii) व्यक्ति के जीवन में सदैव कैसी समस्या का प्रश्न विद्यमान रहेगा?
उत्तर व्यक्ति अपने जीवन में सदैव उचित मार्ग का चयन करने में असमर्थ रहता है, यदि उसे सौ साल जीवित रहने का भी अवसर मिल जाए तब भी उसके हित में उचित चयन का प्रश्न विद्यमान रहेगा।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्याांश के माध्यम से कवि ने यह भाव स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन में समस्या केवल अभावों की ही नहीं है, वरन् उपयुक्त चुनाव की भी है। यहाँ जीवन की विविधता और उसमें उचित के चयन की समस्या को जीवन की विकटतम समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(v) अहंकार का सन्धि विच्छेद कीजिए। ।
उत्तर अहंकार – अहम् + कार (अनुस्वार सन्धि)

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