Home » Sahityik Hindi Class 12th » UP Board Syllabus बहादुर – अमरकान्त – परिचय

UP Board Syllabus बहादुर – अमरकान्त – परिचय

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी कहानी-बहादुर – अमरकान्त
Chapter 4
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

कहानी का सारांश

हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कथाकार अमरकान्त’ द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ वस्तुतः एक मध्यवर्गीय परिवार में नौकर के साथ
परिवारजनों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक कठोर एवं असभ्य व्यवहार पर आधारित कहानी है। अमरकान्त हिन्दी के उन कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों में मध्य एवं निम्न वर्ग के प्रति सामाजिक जीवन की अमानवीय स्थितियों को एक यातनागार के रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र-परिचय

लेखककहानी का वक्ता
निर्मलालेखक की पत्नी
साले साहबलेखक के साले साहब
दिलबहादुरएक नेपाली लड़का तथा लेखक के घर का नौकर, जिसका नाम दिलबहादुर से केवल बहादुर कर दिया जाता है।
किशोरलेखक का बड़ा लड़का

बहादुर को देख लेखक के मन में नौकर रखने की
आवश्यकता का अनुभव करना

एक दिन लेखक के साले साहब एक नेपाली लड़के को लेकर लेखक के घर आते हैं। उसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष के लगभग थी, ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने खड़ा था। उसे देखते ही लेखक को स्मरण हुआ कि उसके सभी भाई और रिश्तेदारों के यहाँ नौकर हैं। दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती रहती हैं, जबकि उसकी पत्नी निर्मला सुबह से शाम तक घर के कामों में व्यस्त रहती है। यह सोच लेखक का मन ईर्ष्या से जल उठा तथा निर्मला भी हर वक्त नौकर रखने की रट लगाए रहती थी। यही स्मृति बहादुर को देखकर लेखक
को नौकर रखने की आवश्यकता का अनुभव कराती है।

साले साहब द्वारा लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देना

साले साहब लेखक व उसके परिवार को बहादुर का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह एक नेपाली बालक है, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था तथा इसके पिता युद्ध में मारे जा चुके हैं। घर परिवार का भरण-पोषण इसकी माँ करती थी। वह चाहती थी कि लड़का घर के काम-काज में हाथ बटाए, परन्तु शरारती प्रवृत्ति के कारण इसने एक बार उसी भैंस को बहुत मारा जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी। इसलिए माँ ने इसे बहुत मारा, जिसकी वजह से इसका मन माँ से कट गया और एक दिन यह माँ के रखे रुपयों में से दो रुपए निकाल कर वहाँ से भाग आया।

लेखक तथा उसकी पत्नी निर्मला द्वारा ‘दिलबहादुर’ को नौकर ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया समझाना

लेखक द्वारा लड़के का नाम पूछने पर वह अपना नाम ‘दिलबहादुर’ बताता है। लेखक उसे अपने घर में नौकर बनकर रहने के फायदे बताते हुए कहता है कि तुम अपनी सभी शरारतें छोड़कर ढंग से काम करना और इस घर को अपना ही घर समझना। हमारे घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है, जो सब खाते-पहनते हैं, वही नौकर-चाकर खाते-पहनते हैं। यदि तुम हमारे घर में रह गए तो सभ्य बन जाओगे, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाओगे और तुम्हारी जिन्दगी सुधर जाएगी। निर्मला भी उसे नौकर बनने से पहले घर के कुछ व्यावहारिक उपदेश देती। हर्ड कहती है कि इस मोहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं न तो तुम्हें किसी के । घर जाना है और न ही किसी का कोई काम करना है। कोई बाजार से कुछ । लाने को कहे तो ‘अभी आता हूँ’ कहकर खिसक आना। तुम्हें घर के सभी सदस्यों से आदर व सम्मान से बोलना होगा तथा अपनी हिदायतें समाप्त करते हुए बड़ी ही उदारता के साथ वह उस लड़के के नाम में से ‘दिल’ हटा देती है। अब उसका नाम केवल ‘बहादुर’ ही बचता है।

बहादुर का परिश्रमी व हँसमुख स्वभाव

बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ-सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कामचोर व आलसी बन जाते हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हँसता रहता है। हँसना और हँसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

बहादुर के प्रति किशोर का दुर्व्यवहार

निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का है, जो शान-शौकत तथा रोब से रहना पसन्द करता है। वह अपने सारे काम बहादर को सौंप देता है। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता तथा छोटी-छोटी गलती पर बहादुर को पीटता भी है। बहादुर पिटकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद फिर घर के
कामों में पूर्ववत् जुट जाता। एक दिन किशोर बहादुर को सुअर का बच्चा’ कह देता है, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है और वह किशोर का काम करने से मना कर देता है। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए बताया कि-“बाबूजी, भैया ने मेरे मरे हुए बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ता है।

बहादुर के प्रति निर्मला का बदलता व्यवहार

निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती है, इसलिए वह रोटी बनाने का। काम बहादुर से न करवाकर स्वयं करती है, परन्तु मोहल्ले की किसी औरत ने उसे भड़का दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे। तुम यदि नौकरों को पतली-पतली रोटी बनाकर खिलाओगी तो उनकी आदतें खराब हो जाती हैं। निर्मला के दिमाग में उस औरत की बात घर कर जाती है। अब वह बहादर के लिए रोटियाँ सेंकना बन्द कर देती है, लेकिन बहादुर भी अपने लिए रोटियाँ नहीं सेंकता। निर्मला कई बार उसे रोटियाँ सेंकने के लिए कहती है, परन्तु बहादुर रोटियाँ बनाने के लिए मना कर देता
है। निर्मला का गुस्सा बढ़ जाता है और वह लपककर उसके माथे पर तीन थप्पड़ जड़ देती है। निर्मला, बहादुर से चिढ़ जाती है। अब वह हर छोटी गलती पर उसे मारती व गालियाँ देने लगती है।

निर्मला के रिश्तेदार द्वारा बहादुर पर चोरी का आरोप लगाना

एक दिन निर्मला के रिश्तेदार अपने पूरे परिवार के साथ उसके घर आते हैं। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी अपने ग्यारह रुपए खो जाने की बात कहती है। सभी बहादुर पर सन्देह करते हैं। बहादुर लगातार मना करता है कि मैंने रुपए नहीं लिए फिर भी उसे डराया-धमकाया जाता है तथा
लेखक द्वारा पीटा भी जाता है। इसके बाद निर्मला भी उसे डराती-धमकाती है तथा दो-चार तमाचे भी जड़ देती है। तब भी बहादुर अपने निर्दोष होने की बात कहता है, परन्तु उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता।

घर के सभी लोगों का बहादुर के प्रति कटुतापूर्ण व्यवहार

चोरी की घटना के बाद घर के सभी सदस्य बहादुर को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगते हैं। बहादुर भी अब उदास रहने लगता है, अब उसके मन में घरवालों के प्रति कोई अपनापन व लगाव न रहा।
बहादुर को अब पहले की अपेक्षा अधिक डाँटा व मारा जाता है। उससे अब गलतियाँ व भूलें भी अधिक होने लगती हैं, जिस कारण अब वह काम में भी लापरवाही करने लगता है।

बहादुर का घर से भाग जाना

एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला जाता है। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपए उसने
नहीं चराए थे। अन्त में सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए। पश्चाताप करने लगते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

निर्देश नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार, कहानी सम्बन्धी प्रश्न के अन्तर्गत पठित कहानी से चरित्र-चित्रण, कहानी के तत्व एवं तथ्यों पर आधारित दो प्रश्न दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक प्रश्न का उत्तर देना होगा. इसके लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

1 कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा कीजिए।

अथवा ‘बहादुर’ कहानी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

अथवा ‘बहादुर’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

अथवा बहादुर’ कहानी का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर प्रसिद्ध नए कहानीकार अमरकान्त रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित कहानी है। इसमें एक बेसहारा पहाड़ी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार है

(i) कथावस्तु कथानक

कथावस्तु की दृष्टि से अमरकान्त की सभी कहानियाँ जीवन के अन्तर्विरोधों को वास्तविक रूप में चित्रित करती हैं। उन्हें दलित, निम्न व पिछड़े वर्ग से विशेष सहानुभूति है। ‘बहादुर’ कहानी का प्रधान चरित्र उसी पिछड़े बेसहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। बहादुर बारह-तेरह वर्ष का लड़का है, जो पिता की मृत्यु के बाद, माँ की उपेक्षा व मार से खीझकर शहर भाग आता है। उसे एक मध्यम परिवार द्वारा नौकर के रूप में अपने घर में रख लिया जाता है। वह घर के सभी काम ईमानदारी व लगन से करता है। घरवालों द्वारा डाँट-फटकार तथा मार खाकर भी वह यथास्थिति काम करता रहता है। घरवालों द्वारा चोरी का
आरोप लगाना उसे सबसे अधिक आघात पहुँचाता है, जिसके कारण वह एक दिन बिना किसी को बताए घर से चला जाता है। आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्ण कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। सहजता, स्वाभाविकता, मनोवैज्ञानिकता व यथार्थता की पृष्ठभूमि पर सुसंगठित कथावस्तु की दृष्टि से यह सफल कहानी है।

(ii) पात्र और चरित्र-चित्रण

‘बहादुर’ कहानी में मुख्य पात्र बहादुर है तथा लेखक, निर्मला, किशोर, रिश्तेदार, साले साहब, बहादुर के माता-पिता गौण पात्र हैं। कहानी की सम्पूर्ण कथावस्तु बहादुर के चरित्र पर टिकी हुई है तथा कहानी का शीर्षक भी चरित्र प्रधान है। कहानीकार ने निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग की आन्तरिक वास्तविकताओं को उनके स्वभावगत रूप में पात्रों का चरित्र-चित्रण किया है। सभी पात्र कहानी की कथावस्तु के अनुरूप दृष्टिगत होकर अपनी-अपनी मनोवैज्ञानिकता को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।

(iii) कथोपकथन संवाद

प्रस्तुत कहानी का आरम्भ लेखक द्वारा आत्मकथात्मक शैली से होता है, परन्तु कहानी के मध्य में कथोपकथन/संवादों का सटीक प्रयोग हुआ है। कहानीकार ने सरल संक्षिप्त रोचक व गतिशील संवादों का सटीक प्रयोग कर कहानी के विकास को निरन्तर गति दी है; जैसे
“चल बना रोटी”
“नहीं बनाऊँगा”
“जी नहीं बाबूजी!”
अतः कहा जा सकता है, कहानी के कथोपकथन/संवाद पात्रानुकूल व स्थिति के अनुकूल सजीव बन पड़े हैं।

(iv) भाषा-शैली

प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त ने सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा साथ ही चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं; जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, इज्जत आदि उर्दू शब्द हैं। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे-माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

(v) देशकाल और वातावरण

कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद समाज का मध्यम वर्ग अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं तथा घर की अव्यवस्थित स्थिति ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

(vi) उद्देश्य

‘बहादुर’ कहानी उद्देश्य प्रधान कहानी है, यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है। कहानीकार ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि वर्तमान समाज झूठे प्रदर्शन व मान प्रतिष्ठा में स्वयं को इतना फँसा चुका है कि वह अपनी मनुष्यता व संवेदना को नष्ट करता जा रहा है।

(vii) शीर्षक

कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्षक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि स ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

2 बहादुर’ कहानी के आधार पर बहादुर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा बहादुर’ कहानी के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर बहादुर कहानी का मुख्य पात्र व नायक है। वह एक नेपाली किशोर है, जो अपने गाँव से शहर भाग आता है। बहादुर की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) छल-कपट रहित भोला बालक बारह-तेरह वर्ष का नेपाली बालक बहादुर’ बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिल्कुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

(ii) परिश्रमी बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिकांश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

(iii) हँसमुख एवं मृदुभाषी बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह । किसी भी बात को कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने-सुनने वालों के हृदय को झंकृत कर देती है। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

(iv) व्यवहार कुशल बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक है। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

(v) स्नेही, सहनशील एवं स्वाभिमानी बालक वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ख्याल रखता है। । बहादुर बड़ा सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की डाँट खाता रहता है। किशोर भी बहादुर के साथ कई बार दुर्व्यवहार करता था। जिन्हें थोड़ी देर में ही वह भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

(vi) मातृ-पितृभक्त बालक बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन माता-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है।
इसलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया। ।

(vii) ईमानदार एवं सच्चा व्यक्तित्व गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी छु तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित
कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

3 बहादुर कहानी के उददेश्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अमरकान्त जी ने बहादुर कहानी में सामाजिक ढाँचे के भीतर आर्थिक विषमताओं के बीच जीवन जीने वाले दो भिन्न वर्गों के यथार्थ को चित्रित करने के साथ-साथ बाधित बचपन की कहानी को भी गति प्रदान की है।

बारह-तेरह वर्ष की उम्र के बहादुर का बचपन जीवन में लगातार आने वाली बाधाओं से रीता (खाली) ही रह गया। पहले माँ की ओर फिर। निर्मला की हृदयहीनता उसके बचपन व किशोरावस्था के सन्धिकाल के स्वाभाविक विकास में बाधा बनती है। जानवरों की भाँति क्रियाकलाप करते हुए, उसका अलमस्त रहना और हर पीड़ा के बाद सकारात्मक दृष्टिकोण से अपने लिए खुशी ढूँढ लेना बहादुर द्वारा बचपन को बचाए रखने का प्रमाण है। इसके साथ ही कहानीकार ने उस विसंगति को उजागर क्रिया है, जहाँ मध्य वर्ग की मानसिकता अपने ही वर्ग के विरोध में खड़े होकर उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा को दिखाकर, मानवीय संवेदना को जागृत करना ही कहानी का मुख्य उद्देश्य है।

4 अमरकान्त की कहानियों का वातावरण पात्रों की मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्बन है।” कथन के आधार पर ‘बहादुर’ कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर अमरकान्त ने ‘बहादुर’ कहानी में बहादुर के जीवन की निरन्तर तीव्र होती त्रासदी को एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए अत्यन्त सशक्त रूप में चित्रित किया है। जीवन तथा समाज के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले कथाकार अमरकान्त की कहानी ‘बहादुर’ के सभी चरित्र यथार्थवादी भूमि पर ही खड़े हैं। निर्मला, किशोर और गृहस्वामी जैसे पात्र केवल निर्मला के घर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे मध्यवर्ग के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। ये सभी पात्र परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव के कारण मानवीयता और संवेदनहीनता के अन्तर्द्वन्द्व में निरन्तर झूलते रहते हैं।
अपने घर में मातृप्रेम को तरसता बहादुर, निर्मला में माँ की और
गृहस्वामी में पिता की छवि देखता है, परन्तु काँच की इन छवियों के टूटकर बिखरने और इनकी पीड़ा अनुभव करने वाला बहादुर, अन्ततः। अपने भीतर के बच्चे को निर्मला के घर ही छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के पश्चात् घर में एक अजीब-सी उदासी छा जाती है; जैसे-अँगीठी न जलना, आँगन का गन्दा होना, बर्तन गन्दे होना कहानी का त्रासद वातावरण समूचे घर की निष्क्रियता का प्रतीक बनकर सामने आता है। बहादुर की उपस्थिति जहाँ कहानी के भीतर घर के वातावरण को ऊर्जा से भर देती थी तथा व्यवस्था बनाए रखती थी, वहीं उसकी अनुपस्थिति। में सखमय घर की तस्वीर के स्थान पर घर काटने लगता है। अतः कहा।
जा सकता है कि कथाकार अमरकान्त की कहानियों में चित्रित वातावरण कहीं-न-कहीं पात्रों की मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्बन भी है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

+ 50 = 57

Share via
Copy link
Powered by Social Snap