कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी गद्य गरिमा अध्याय 1 वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र का स्वरूप हिंदी में

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कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी गद्य गरिमा अध्याय 1 वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र का स्वरूप हिंदी में

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UP Board Class 12 वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र का स्वरूप
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी गद्य-वासुदेव शरण अग्रवाल // राष्ट्र का स्वरूप
Chapter 1
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com
संक्षिप्त परिचय
नामडॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल
जन्म1904 ई.
जन्म स्थान उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का खेड़ा
नामक ग्राम
शिक्षाएम.ए., पी.एच.डी., डी.लिट की उपाधि
लेखन विधा निबन्ध, शोध और सम्पादन कार्य
भाषा-शैलीशुद्ध और परिष्कृत खड़ी बोली।
शैली विचार प्रधान, गवेषणात्मक,
व्याख्यात्मक तथा उद्धरण।
साहित्यिक पहचान निबन्धकार, शोधकर्ता, सम्पादक
साहित्य में स्थान डॉ. अग्रवाल हिन्दी-साहित्य में
पाण्डित्यपूर्ण एवं सुललित निबन्धकार
के रूप में प्रसिद्ध हैं।
मृत्यु1967 ई.

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व के विद्वान् वासुदेव शरण अग्रवाल का जन्म 1904 ई. में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के खेड़ा नामक ग्राम में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद एम.ए.,पी.एच.डी. तथा डी.लिट. की उपाधि इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इन्होंने पालि, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं एवं उनके साहित्य का गहन अध्ययन किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में ‘पुरातत्त्व एवं प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे वासुदेव शरण अग्रवाल दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के भी अध्यक्ष रहे। हिन्दी की इस महान् विभूति का 1967 ई. में स्वर्गवास हो गया। .

साहित्यिक सेवाएँ

इन्होंने कई ग्रन्थों का सम्पादन व पाठ शोधन भी किया। जायसी के ‘पदमावत’ की संजीवनी व्याख्या और बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ का सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तत करके इन्होंने हिन्दी-साहित्य को गौरवान्वित किया। इन्होंने प्राचीन महापरुषों–श्रीकृष्ण, वाल्मीकि, मनु आदि का आधुनिक दृष्टिकोण से बुद्धिसंगत चरित्र-चित्रण प्रस्तुत किया।

कृतियाँ

डॉ. अग्रवाल ने निबन्ध-रचना, शोध और सम्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं निबन्ध-संग्रह पृथिवी पुत्र, कल्पलता, कला और संस्कृति, कल्पवृक्ष, भारत की एकता, माता भूमि, वाग्धारा आदि। शोध पाणिनिकालीन भारत। सम्पादन जायसीकृत पद्मावत की संजीवनी व्याख्या, बाणभट्ट के हर्षचरित का सांस्कृतिक अध्ययन। इसके अतिरिक्त इन्होंने पालि, प्राकृत और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों का भी सम्पादन किया।

भाषा-शैली

डॉ. अग्रवाल की भाषा-शैली उत्कृष्ट एवं पाण्डित्यपूर्ण है। इनकी भाषा शुद्ध तथा परिष्कृत खड़ी बोली है। इन्होंने अपनी भाषा में अनेक प्रकार के देशज शब्दों का प्रयोग किया है, जिसके कारण इनकी भाषा सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक लगती है। इन्होंने प्राय: उर्दू, अंग्रेजी आदि की शब्दावली, मुहावरों, लोकोक्तियों का प्रयोग नहीं किया है। इनकी भाषा विषय के अनुकूल है। संस्कृतनिष्ठ होने के कारण भाषा में कहीं-कहीं अवरोध आ गया है, किन्तु इससे भाव प्रवाह में कोई कमी नहीं आई है। अग्रवाल जी की शैली में उनके व्यक्तित्व तथा विद्वता की सहज अभिव्यक्ति हुई है। इसलिए इनकी शैली विचार प्रधान है। इन्होंने गवेषणात्मक, व्याख्यात्मक तथा उद्धरण शैलियों का प्रयोग भी किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

पुरातत्त्व-विशेषज्ञ डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हिन्दी साहित्य में पाण्डित्यपूर्ण एवं सुललित निबन्धकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। पुरातत्त्व व अनुसन्धान के क्षेत्र में, उनकी समता कर पाना अत्यन्त कठिन है। उन्हें एक विद्वान् टीकाकार एवं साहित्यिक ग्रन्थों के कुशल सम्पादक के रूप में भी जाना जाता है। अपनी विवेचना पति की मौलिकता एवं विचारशीलता के कारण वे सदैव स्मरणीय रहेंगे।

पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध राष्ट्र का स्वरूप डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के निबन्ध-संग्रह पृथिवी पुत्र’ से लिया गया है। इस निबन्ध में लेखक बताते हैं कि राष्ट्र का स्वरूप जिन तत्त्वों से मिलकर बना है, वे तीन तत्व हैं-पृथ्वी (भूमि), जन और संस्कृति।।

पृथ्वी (भूमि) को समृद्ध बनाने पर बल
लेखक का मानना है कि भूमि का निर्माण देवताओं द्वारा किया गया है तथा इसका अस्तित्व अनन्तकाल से विद्यमान है। इसलिए मानव जाति का यह कर्तव्य है कि वह इस भूमि के प्रति सचेत रहे, इसके रूप को विकृत न होने दे तथा इसे समृद्ध बनाने की दिशा में सजग रहे। लेखक का कहना है कि भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितना अधिक जागरूक रहेंगे, हमारीnराष्ट्रीयता उतनी ही बलवती होगी, क्योंकि हमारी समस्त विचारधाराओं की
जननी वस्तुत: यह पृथ्वी ही है। जो राष्ट्रीय विचारधारा पृथ्वी से सम्बद्ध नहीं होती, वह आधारविहीन होती है और उसका अस्तित्व थोड़े समय में ही नष्ट हो जाता है। राष्ट्रीयता का आधार जितना सशक्त होगा, राष्ट्रीयता की भावनाएँ भी उतनी ही अधिक विकसित होंगी। इसलिए प्रारम्भ से अन्त तक पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की जानकारी रखना तथा इसके रूप-सौन्दर्य, उपयोगिता एवं महिमा को पहचानना प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक धर्म है। .

पृथ्वी : हमारी धरती माता
लेखक का मानना है कि यह पृथ्वी (भूमि) वास्तव में हमारे लिए माँ है, क्योंकि इसके द्वारा दिए गए अन्न-जल से ही हमारा भरण-पोषण होता है।इसी से हमारा जीवन अर्थात् अस्तित्व बना हुआ है। धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हुई हैं, उनसे हमारा आर्थिक विकास सम्भव हुआ है और आगे भी होगा। पृथ्वी एवं आकाश के अन्तराल में जो सामग्री भरी हुई
है, पृथ्वी के चारों ओर फैले गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियां हैं, उन सबका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। अत: हमें इन सबके प्रति आत्मीय चेतना रखने की आवश्यकता है। इससे हमारी राष्ट्रीयता की भावना को विकसित होने में सहायता मिलती है। ..

राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग : मनुष्य
लेखक का मानना है कि पृथ्वी अर्थात् भूमि तब तक हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकती, जब तक इस भूमि पर निवास करने वाले मनुष्य को साथ में जोड़कर न देखा जाए। जो भूमि जनविहीन हो, उसे राष्ट्र नहीं माना जा सकता। राष्ट्र के स्वरूप का निर्माण पृथ्वी और जन (मनुष्य) दोनों की विद्यमानता की स्थिति से ही सम्भव है।’पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका आज्ञाकारी पुत्र हूँ’, इस भावना के साथ तथा माता-पुत्र के सम्बन्ध की मर्यादा को स्वीकार करके प्रत्येक देशवासी अपने राष्ट्र एवं देश के लिए कार्य करते हुए अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सजग हो सकता है। पृथ्वी पर रहने वाले जनों का विस्तार व्यापक है और इनकी विशेषताएँ भी विविध हैं। वस्तुतः जन का महत्त्व सर्वाधिक है। जन के बिना राष्ट्र की कल्पना करना भी असम्भव है।

राष्ट्र की प्रगति समानता के भाव द्वारा ही सम्भव
प्रत्येक माता अपने सभी पुत्रों को समान भाव से प्रेम करती है। इसी प्रकार पृथ्वी भी उस पर रहने वाले सभी मनुष्यों को समान भाव से चाहती है, उसके लिए सभी मनुष्य समान हैं। इसलिए धरती माता अपने सभी पुत्रों को समान रूप से समस्त सुविधाएँ प्रदान करती है। धरती पर रहने वाले मनुष्य भले ही अनेक जातियों, धर्मों, समुदायों से सम्बन्ध रखते हों, किन्तु फिर भी ये सभी मातृभूमि के पुत्र हैं, मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है, उसमें कोई भेदभाव उत्पन्न नहीं हो सकता। धरती पर सब जातियों के लिए एक समान क्षेत्र है। इसलिए सभी मनुष्यों को देश की प्रगति और उन्नति करने का एक समान अधिकार है। किसी एक जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। अत: सभी को एक समान रूप से प्रगति और उन्नति करने का अवसर मिलना चाहिए उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
समस्त देशवासियों का यह कर्त्तव्य है कि वे अपने निजी स्वार्थों को त्यागकर तथा संकुचित दायरे से निकलकर उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण अपनाएँ। इस प्रकार समानता के भाव द्वारा ही राष्ट्र की प्रगति सम्भव है।

संस्कृति : मनुष्य के मस्तिष्क का प्रतीक
लेखक का मानना है कि यह संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है और संस्कृति के विकास एवं अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अगर भूमि और जन को संस्कृति से अलग कर दिया जाए तो राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। किसी भी राष्ट्र के लिए संस्कृति उसकी जीवनधारा है। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ संस्कृति का विकास करती है। इस प्रकार प्रत्येक जन अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग संस्कृतियों को राष्ट्र के रूप में विकसित करता है। अनेक संस्कृतियों के एक साथ रहने के बावजूद सभी संस्कृतियों का मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता एवं समन्वय की भावना है। यही हमारे बीच पारस्परिक प्रेम एवं भाईचारे का स्रोत है तथा इसी से राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है। लेखक का मानना है कि सहृदय व्यक्ति प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है

गद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

  • भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनन्त काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कत्र्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरूक होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है, जो राष्ट्रीयता पृथ्वी के साथ नहीं जुड़ी, वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथ्वी में जितनी गहरी होंगी, उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की आद्योपान्त जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता,
    उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश ‘राष्ट्र का स्वरूप पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक ‘वासुदेव शरण अग्रवाल’ हैं।

(ii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस बात पर बल दिया है?
उत्तर प्रस्तत गद्यांश में लेखक ने राष्ट्र या देश के प्रथम महत्त्वपर्ण तत्त्व ‘भमि’ या ‘धरती’ के रूप, उपयोगिता एवं महिमा के प्रति सर्तक रहने तथा उसे समृद्ध बनाने की बात पर बल दिया है।

(iii) लेखक ने हमारे कर्त्तव्य के प्रति क्या विचार प्रस्तुत किए हैं?
उत्तर लेखक के अनुसार यह धरती या भूमि अनन्तकाल से है, जिसका निर्माण देवताओं ने किया है। इस भूमि के भौतिक स्वरूप, उसके सौन्दर्य एवं उसकी समृद्धि के प्रति सतर्क एवं जागरूक रहना हमारा परम कर्तव्य है।

(iv) राष्ट्रीयता की भावना कब निर्मूल मानी जाती है?
उत्तर लेखक के अनुसार हमारी समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी वस्तुतः पथ्वी या धरती है। कोई भी राष्ट्रीयता यदि अपनी धरती से नहीं जुड़ी हो, तो उस राष्ट्रीयता की भावना को निर्मूल एवं निराधार माना जाता है।

(v) ‘निर्मूल’ और ‘पल्लवित’ शब्दों में क्रमशः उपसर्ग और प्रत्यय अँटकर लिखिए।
उतर निर्मूल /निर् (उपसर्ग), पल्लवित – इत (प्रत्यय)।

  • धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं, जिनके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है उनसे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों-करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथ्वी के गर्भ में पोषण मिला है। . दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीस कर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथ्वी की देह को सजाया है। हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच-पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है। पृथ्वी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों से सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं। नाना भाँति के अनगढ़ नगनग विन्ध्य की नदियों के प्रवाह में सूर्य की धूप से चिलकते रहते हैं, उनको जब चतुर कारीगर पहलदार कटाव पर लाते हैं तब उनके प्रत्येक घाट से नई शोभा और सुन्दरता फूट पड़ती है। वे अनमोल हो जाते हैं। देश के नर-नारियों के रूप-मण्डन और सौन्दर्य प्रसाधन में इन छोटे पत्थरों का भी सदा से कितना भाग रहा है; अतएव हमें उनका ज्ञान होना भी आवश्यक है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक यह सन्देश देना चाहता है कि हमें पृथ्वी अर्थात् भूमि के महत्त्व को समझते हुए उसके विविध पक्षों से । परिचित होना चाहिए, जिससे कि हमारे हृदय में राष्ट्रीयता की भावना . उजागर हो सके।

(ii) गद्यांश में वसुन्धरा किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर गद्यांश में धरती को वसुन्धरा कहा गया है, क्योंकि पृथ्वी के गर्भ में अमूल्य निधियों का भण्डार है, जो लाखों-करोड़ों वर्षों से मौजूद है। इन निधियों को पृथ्वी के गर्भ में पोषण प्राप्त होता है।

(iii) पृथ्वी की देह सजाने से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर पृथ्वी की देह सजाने से लेखक का आशय यह है कि यहाँ बहने वाली नदियाँ पहाड़ों की चट्टानों को तोड़कर उन्हें अत्यन्त महीन कणों में परिवर्तित कर मिट्टी का रूप देती हैं और इसी मिट्टी से पृथ्वी की या धरती माता की देह सजती है अर्थात् धरती फलती-फूलती व उपजाऊ बनती है।

(iv) छोटे-छोटे पत्थर प्रसाधन एवं सौन्दर्य हेतु किस प्रकार उपयोगी होते

उत्तर पहाड़ों से टूटे हुए छोटे पत्थर नदियों के प्रवाह के साथ बहते हुए किनारे पर लग जाते हैं, जो सूर्य की किरणों से चमकते रहते हैं। इन्हीं पत्थरों पर कुशल कारीगर द्वारा कारीगरी करते हुए उसके स्वरूप को परिवर्तित किया जाता है और इनका प्रयोग प्रसाधन एवं सौन्दर्य हेतु किया जाता है।

(v) ‘दिन-रात’ का समास विग्रह करते हुए उसका भेद लिखिए।
उत्तर दिन और रात (समास विग्रह)। यह द्वन्द्व समास का भेद है।

  • पृथ्वी और आकाश के अन्तराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबके प्रति चेतना और स्वागत के नए भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नई किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब तक हम सोए हुए के समान हैं। विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अथक परिश्रम के द्वारा नित्यं आगे बढ़ाना चाहिए। हमारा यह ध्येय हो कि राष्ट्र में जितने हाथ हैं, उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिए बिना रीता न रहे। तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और समग्र रूपमण्डम प्राप्त किया जा सकता है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) राष्ट्रीय चेतना में भौतिक ज्ञान-विज्ञान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर लेखक के अनुसार, राष्ट्रीयता की भावना केवल भावनात्मक स्तर तक ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि भौतिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति जागृति के स्तर- पर भी होनी चाहिए, क्योंकि पृथ्वी एवं आकाश के बीच विद्यमान नक्षत्र, समुद्र में स्थित जलचर, खनिजों एवं रत्नों का ज्ञान आदि भौतिक ज्ञान-विज्ञान राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ बनाने हेतु आवश्यक होते हैं।

(ii) लेखक ने राष्ट्र की सुप्त अवस्था कब तक स्वीकार की है?
उत्तर लेखक ने राष्ट्र की सुप्त अवस्था तब तक स्वीकार की है, जब तक नवयुवकों में राष्ट्रीय चेतना और भौतिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति जिज्ञासा विकसित न हो जाए। जब तक राष्ट्र के नवयुवक जिज्ञासु और जागरूक नहीं होंगे, तब तक राष्ट्र को सुप्तावस्था में ही माना जाना चाहिए।

(iii) विज्ञान और श्रम के संयोग से राष्ट्र प्रगति के पथ पर कैसे अग्रसर हो सकता है? उत्तर लेखक के अनुसार, विज्ञान और परिश्रम दोनों को एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना चाहिए, तभी किसी सष्ट्र का भौतिक स्वरूप उन्नत बन सकता है अर्थात् विज्ञान का विकास इस प्रकार हो कि उससे श्रमिकों को हानि न पहुँचे और उनके कार्य और कुशलता में वृद्धि हो। यह कार्य बिना किसी दबाव के हो तथा सर्वसम्मति में हो। इस प्रकार कोई भी राष्ट्र प्रगति कर सकता है। .

(iv) लेखक के अनुसार, राष्ट्र समृद्धि का उद्देश्य कब पूर्ण नहीं हो
पाएगा? . उत्तर लेखक के अनुसार, राष्ट्र समृद्धि का उद्देश्य तब तक पूर्ण नहीं हो पाएगा, जब तक देश का कोई भी नागरिक बेरोजगार होगा, क्योंकि राष्ट्र का निर्माण एक-एक व्यक्ति से होता है। यदि एक भी व्यक्ति को रोजगार नहीं मिलेगा, तो राष्ट्र की प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी।

(v) “स्वागत’ का सन्धि विच्छेद करते हुए उसका भेद बताइए।
उत्तर सु + आगत = स्वागत (यण् सन्धि

  • माता-पृथ्वी को प्रणाम है। माता पृथ्वी को प्रणाम है। यह
    प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़-बन्धन है। इसी
    दृढ़भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जाता है। इसी दृढ़
    चटटान पर राष्ट्र का चिरजीवन आश्रित रहता है। इसी मर्यादा
    को मानकर राष्ट्र के प्रति मनुष्यों के कर्तव्यों और अधिकारों
    का उदय होता है। जो जन पृथ्वी के साथ माता और पुत्र के
    सम्बन्ध को स्वीकार करता है, उसे ही पृथ्वी के वरदानों में
    भाग पाने का अधिकार है। माता के प्रति अनुराग और सेवाभाव
    पुत्र का स्वाभाविक कर्तव्य है। वह एक निष्कारण धर्म है।
    स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अध:पतन को
    सूचित करता है। जो जन मातृभूमि के साथ अपना सम्बन्ध ।
    जोड़ना चाहता है, उसे अपने कर्तव्यों के प्रति पहले ध्यान देना।
    चाहिए।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या उददेश्य दिया है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक का उद्देश्य है किसी शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण तभी सम्भव है, जब प्रत्येक व्यक्ति देश की भूमि और प्रत्येक वस्तु को माता के समान आदर प्रदान करे।

(ii) ‘यह प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़-बन्धन है।’ इस पंक्ति से । लेखक का क्या आशय है?
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति से लेखक का आशय यह है कि अपनी मातृभूमि के प्रति आदर व सम्मान का भाव ही व्यक्ति और भूमि (धरती) के सम्बन्ध को प्रगाद और दृढ़ बनाता है। यही दृढ़ता राष्ट्र या देश के विकास में सहायक होती है।

(iii) पृथ्वी के रत्नों को कौन प्राप्त कर सकता है?
उत्तर जो व्यक्ति पृथ्वी (भूमि/धरती) के प्रति आदर भाव रखता हो तथा जो पृथ्वी के साथ माता और पत्र के सम्बन्ध को स्वीकारे अथोत् जो यह मानता हो कि “पथ्वी मेरी माता है और मैं उसका आज्ञाकारी पुत्र हूँ,” वही व्यक्ति पृथ्वी के रत्नों को प्राप्त कर सकता है।

(iv) कैसे व्यक्ति राष्ट्र का उत्थान नहीं कर सकते?
उत्तर जो व्यक्ति स्वार्थवश होकर अपने राष्ट्र से प्रेम करता है और उसकी सम्पत्ति को प्राप्त करना चाहता है, वह स्वयं अपनी अवनति का कारण बनता है। इस प्रकार के स्वार्थी व्यक्ति कदापि राष्ट्र का उत्थान नहीं कर
सकते।

(v) ‘अधिकार’ और ‘अनुराग’ शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर अधिकार – अधि (उपसर्ग), अनुराग – अनु (उपसर्ग)।

  • माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथ्वी पर बसने वाले जन बराबर हैं। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है, वह समान अधिकार का भागी है। पृथ्वी पर निवास करने वाले जनों का विस्तार अनन्त है-नगर और जनपद,पर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलने वाले और अनेक धर्मों के मानने वाले हैं, फिर भी ये मातृभूमि के पुत्र हैं और इस कारण उनका सौहार्द्र भाव
    अखण्ड है। सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक-दूसरे से
    आगे-पीछे हो सकते हैं, किन्तु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है उसमें कोई भेद-भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। पृथ्वी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र है। समन्वय के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है। उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में माता और पृथ्वी की समानता किस आधार पर की गई है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में स्पष्ट है कि जिस प्रकार प्रत्येक माता अपने सभी पुत्रों को समान भाव से स्नेह करती है तथा सबके दुःख और सुख में साथ रहती है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपने सभी पुत्रों अर्थात पृथ्वीवासियों को जिसमें सभी छोटे-बड़े प्राणी शामिल हैं, प्यार देती है तथा उनकी जरूरतों को पूरा करने में सहयोग देती है।

(ii) “प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है”-से लेखक का क्या आशय है? .

उत्तर प्रस्तुत पंक्ति से लेखक का आशय यह है कि व्यक्ति अमीर हो या गरीब, प्रगतिशील हो या पिछड़ा, सभी में मातृभूमि के लिए समान प्रेम-भाव होता है। संसार के समस्त प्राणियों को प्रगति व उन्नति करने के लिए मातृभूमि समान अवसर प्रदान करती है तथा इनकी समन्वय की भावना ही राष्ट्र की उन्नति व प्रगति का आधार होती है।

(iii) गद्यांश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त क्यों कहा गया है?
उत्तर गद्यांश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त इसलिए कहा गया है क्योंकि इसके निवासी अनेक नगरों, शहरों, जनपदों, गाँवों, जंगलों एवं पर्वतों में बसे हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहने वाले व्यक्ति अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं तथा विभिन्न धर्मों को मानने वाले हैं, परन्तु वे सभी एक ही धरती माता के पुत्र हैं।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से क्या सन्देश मिलता है?
उत्तर प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने राष्ट्र के विभिन्न महत्त्वपूर्ण अंगों का विवेचन करते हुए हमें सन्देश दिया है कि समानता का व्यवहार करते हुए हमें अपनी धरती माता की निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। ..

(v) ‘मातृभूमि’ शब्द का समास विग्रह करते हुए उसका भेद लिखें। उत्तर मातृभूमि – माता की भूमि (तत्पुरुष समास)।

  • किसी जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। अतएव राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी होगी। राष्ट्र के शरीर के एक भाग में यदि अन्धकार और निर्बलता का निवास है तो समग्र राष्ट्र का स्वास्थ्य उतने अंश में असमर्थ रहेगा। इस प्रकार समग्र राष्ट्र का जागरण और प्रगति की एक-जैसी उदार भावना से संचालित हाना चाहिए। जन का प्रवाह अनन्त होता है। सहस्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रा रश्मियाँ नित्य प्रात:काल भुवन को अमृत से भर ददेती हैं तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र-निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर हैं। जन का सततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक ने सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति के लिए क्या आवश्यक माना है?
उत्तर लेखक ने सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ एवं संकुचित दायरों को त्यागकर उदार दृष्टिकोण अपनाने तथा प्रत्येक व्यक्ति की उन्नति को ध्यान में रखना आवश्यक माना है।.

(ii) एक राष्ट्र कब तक प्रगति एवं उन्नति के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता?

उत्तर एक राष्ट्र तक तब प्रगति एवं उन्नति के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता. जब तक उसके प्रत्येक क्षेत्र, वर्ग, सम्प्रदाय, जाति के प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त नहीं होंगे तथा उनकी उन्नति का ध्यान नहीं रखा जाएगा।

(iii) राष्ट्र का महत्त्वपूर्ण अंग क्या है?

उत्तर राष्ट्र का महत्त्वपूर्ण अंग व्यक्ति होता है, क्योंकि इसके बिना किसी राष्ट की कल्पना भी नहीं की जा सकती। व्यक्ति निरन्तर अपने श्रम एवं कर्म के नाम पर राष्ट्र की उन्नति में अपना योगदान देता है।

(iv) लेखक ने जन जीवन की तुलना नदी के प्रवाह से क्यों की है?
उत्तर लेखक ने जन जीवन की तुलना नदी के प्रवाह से की है, क्योंकि जिस प्रकार एक नदी निरन्तर गतिशील रहकर बीच-बीच में डेल्टा का निर्माण करती जाती है, उसी प्रकार राष्ट्र के लोग अपने कार्य एवं श्रम के माध्यम से प्रगति .व उन्नति के अनेक पड़ावों का निर्माण करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहते

(v) ‘अजर-अमर’ का समास विग्रह करते हुए उसका भेद लिखिए।
उत्तर अजर और अमर (समास विग्रह)। यह द्वन्द्व समास का भेद है।

  • राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में
    जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की
    श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबन्धमात्र है;
    संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जाएँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है। ज्ञान और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है। भूमि पर बस्ने वाले जन ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा है और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, दोनों के रूप में हमें राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते हैं। जीवन के विकास की युक्ति ही संस्कृति के रूप में प्रकट होती है। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ इस युक्ति को निश्चित करती है और उससे प्रेरित संस्कृति का विकास करती है। इस दृष्टि से प्रत्येक जन की अपनी-अपनी भावना के अनुसार पृथक्-पृथक् संस्कृतियाँ राष्ट्र में विकसित होती हैं, परन्तु उन सबका मूल-आधार पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय पर निर्भर है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार राष्ट्र का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग क्या है?
उत्तर लेखक ने भूमि एवं जन के बाद राष्ट्र का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग जन की संस्कृति को बताया है। मनुष्य ने युगों-युगों से जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वह राष्ट्र के लोगों के लिए जीवन की श्वास के समान महत्त्वपूर्ण है क्योंकि संस्कृति के अभाव में राष्ट्र के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिहन लग सकता

(ii) संस्कृति से क्या अभिप्राय है? ।
उत्तर संस्कृति मनुष्य के मस्तिष्क से निर्मित वह व्यवस्था है, जिसके आधार पर परस्पर सह-अस्तित्व रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों में विचारों, भावनाओं संवेदनाओं, मूल्यों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं का एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान होता है तथा सामूहिक जीवन सम्भव हो पाता है।

(iii) राष्ट्र की उन्नति में संस्कृति का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर राष्ट्र की उन्नति एवं विकास में संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि संस्कृति के विकास एवं अभ्युदय के फलस्वरूप राष्ट्र के लोगों के मस्तिष्क का विकास होता है, जिससे राष्ट्र की उन्नति एवं वृद्धि सम्भव हो पाती है।

(iv) जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है’ से लेखक का क्या अभिप्राय है?
उत्तर जिस प्रकार वृक्ष का सम्पूर्ण सौन्दर्य, महिमा उसके पुष्प में ही निहित होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के जीवनरूपी वृक्ष का सम्पूर्ण सौन्दर्य, महिमा, सौरभ संस्कृति रूपी पुष्प में निहित होता है। जीवन के गौरव, चिन्तन, मनन और सौन्दर्य बोध में संस्कृति ही प्रतिबिम्बित होती है।

(v) ‘विटप’ तथा ‘पुष्प’ शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर विटप – वृक्ष, पेड़, वट पुष्प – फूल, कुसम. सममा

  • जंगल में जिस प्रकार अनेक लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य भाव से उठते हुए पारस्परिक सम्मिलन से अविरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन अपनी संस्कृतियों के द्वारा
    एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र में रहते हैं। जिस प्रकार जल के
    अनेक प्रवाह नदियों के रूप में मिलकर समुद्र में एकरूपता प्राप्त
    करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवन की अनेक विधियाँ राष्ट्रीय
    संस्कृति में समन्वय प्राप्त करती हैं। समन्वययुक्त जीवन ही राष्ट्र का सुखदायी रूप है। साहित्य, कला, नृत्य, गीत, अमोद-प्रमोद अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विश्वव्यापी आनन्द भाव है, वह इन विविध रूपों में साकार होता है। यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखाई पड़ते हैं, किन्तु आन्तरिक आनन्द की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता है। जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनन्द-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनन्दित होता है। इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।

दिए गए गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार किसी राष्ट्र का सुखद जीवन किस भावना पर निर्भर करता है? उत्तर लेखक के अनुसार किसी राष्ट्र का सुखद जीवन पारस्परिक सौहार्द्र एवं एकता की भावना पर निर्भर करता है। जिस प्रकार जंगल में अनेक लताएँ, पेड़-पौधे तथा वनस्पतियाँ सामूहिक रूप से रहते हैं, उसी प्रकार एक देश में अनेक संस्कृतियाँ हो सकती हैं, परन्तु उन सबका अस्तित्व परस्पर मेल-जोल एवं एकता की भावना में निहित होता है।

(ii) राष्ट्र के अस्तित्व का आधार क्या है?
उत्तर राष्ट्र के अस्तित्व के लिए भाषा, धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग आदि के भेदभावों को भुलाकर अनेकता में एकता की भावना का परिचय देना चाहिए। यही राष्ट्र के अस्तित्व का मुख्य आधार है।

(iii) संस्कृति किस प्रकार जीवन को आनन्द प्रदान करती है?
उत्तर संस्कृति जीवन को आनन्द प्रदान करती है और उस आनन्द को मनुष्य अपने मानसिक भावों के रूप में साहित्य, कला, नृत्य, गीत आदि माध्यमों से व्यक्त करते हैं। अर्थात् इन संस्कृतियों का स्तर अनेक रूपों में मुखरित होता है।

(iv) विविध संस्कृतियों वाले राष्ट्र की एकसूत्रता के स्वरूप पर प्रकाश डालिए। उत्तर विविध संस्कृतियों वाले राष्ट्र की सभी संस्कृतियाँ बाहरी दृष्टि से देखने पर अलग अलग दिखाई देती हैं, किन्तु इनके अन्दर मूल रूप में एक ही सूत्र अर्थात् आत्मा होती है, जो सम्पूर्ण राष्ट्र की मिली-जुली संस्कृति को मुखरित करती है। इस प्रकार किसी राष्ट्र के सबल अस्तित्व के लिए इस प्रकार की एकसूत्रता आवश्यक है।

(v) राष्ट्रीय, आनन्दित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय छाँटकर लिखिए।
उत्तर राष्ट्रीय – (ईय) (प्रत्यय) आनन्दित – इत (प्रत्यय)

  • गाँवों और जंगलों में स्वच्छन्द जन्म लेने वाले लोकगीतों में, तारों के नीचे विकसित लोक-कथाओं में संस्कृति का अमिट भण्डार भरा हुआ है, जहाँ से आनन्द की भरपूर मात्रा प्राप्त हो सकती है। राष्ट्रीय संस्कृति के परिचयकाल में उन सबका स्वागत करने की आवश्यकता है। पर्वजों ने चरित्र और धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के
  • क्षेत्र में जो कुछ भी पराक्रम किया है. उस सारे विस्तार को हम .
  • गौरव के साथ धारण करते हैं और उसके तेज को अपने भावी …
  • जीवन में साक्षात् देखना चाहते हैं। यही राष्ट्र-संवर्धन का ,
  • स्वाभाविक प्रकार है। जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भार रूप नहीं है, . जहाँ भूत वर्तमान को जकड़कर नहीं रखना चाहता वरन् अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढ़ाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) संस्कृति के वाहक एवं संरक्षक के रूप में लेखक ने किसे प्रस्तुत किया है?
उत्तर लोकगीतों और लोक कथाओं को लेखक ने संस्कृति का वाहक एवं संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है, क्योंकि ये लोकगीतों एवं लोक कथाओं में उनके आचार-विचार, सभ्यता, रीति-रिवाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा यही हमारी संस्कृति का भण्डार होती है। .

(ii) लेखक के अनुसार राष्ट्र की धरोहर क्या है?
उत्तर लेखक के अनुसार हमारे पूर्वजों ने चरित्र, धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लगन, परिश्रम एवं बुद्धि के बल पर जो कुछ भी प्राप्त किया, वही राष्ट्र की धरोहर है।

(iii) एक राष्ट्र की उन्नति कब सम्भव हो सकती है?
उत्तर एक राष्ट्र की स्वाभाविक उन्नति तभी सम्भव है. जब राष्ट्र के लोग प्राचीन इतिहास से जुड़कर भावी उन्नति की दिशा में प्रयास करें। ऐसा राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उनकी उन्नति की दिशा को प्रशस्त करता है।

(iv) हम किस भावना के माध्यम से अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं?
उत्तर हम अपनी प्राचीनता के प्रति गौरव की भावना के माध्यम से अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं, क्योंकि यह भावना हमारे अन्तर्मन में प्रगति हेत एक प्रबल आकांक्षा उत्पन्न करती है कि हम इस गौरव को अपने जीवन में उतारकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए प्रयासरत् रहें।

(v) संवर्धन’ शब्द का सन्धि विच्छेद करते हुए इसमें प्रयुक्त सन्धि का नाम भी लिखिए।
उत्तर ‘सम् + वर्धन’= संवर्धन। यहाँ व्यंजन सन्धि प्रयुक्त हुई है।

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